यादों की सहेलगाह - रंजन कुमार देसाई Ramesh Desai द्वारा फिक्शन कहानी में हिंदी पीडीएफ

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यादों की सहेलगाह - रंजन कुमार देसाई

                        : प्रकरण - 16 :


कीसी ' चिंता की गहरी खाई में घिर गई थी.

उसे पेट के अल्सर की बीमारीने जकड़ लिया था.

यह विश्व की दसवी घातक बीमारी थी.

परमेश्वर को ऊस के बारे में पता चला था.

उस का इलाज भी जारी था.

वह हर तीसरे महिने मुंबई आता था. लेकिन वोह कुछ समय से आया नहीं था. इस बात से ' कीसी ' काफ़ी परेशान हो गई थी.

परमेश्वर ऊस का सामना नहीं पाया था.

बहुत समय बाद वह मुंबई आया था, ऊस से ' कीसी' नाराज हो गई थी. ऊस ने अपने पति को बहुत कुछ सुनाया था. ऊस ने झगड़ा भी मोल लिया था.

बात आपे से बाहर हो गई थी.. परमेश्वर उसे सह नहीं पाया था. इस स्थिति में ऊस ने दोपहर के वक़्त मुझे फोन कर के घर बुलाया था.

बात गंभीर थी, मुझे इस बात का संदेह हुआ था. इस लिये मैं बिना कोई दलील ऊस के घर पहुंच गया था.

दरवाजे की घंटी बजाई थी.

अंदर से ' कीसी ' के रोने की आवाज सुनाई दी थी.

दरवाजा खुद परमेश्वर ने खोला था.

' कीसी ' सोफे पर बैठकर आँसू बहा रही थी.

मैं जल्दी से अंदर दाखिल हुआ था. औऱ ऊस के कंधे सहलाकर सवाल किया था:

" क्या हो गया मेरी लाडो बहना को?"

" तुम्हारे दोस्त को मेरी कोई फ़िक्र नहीं.. दो साल का बोल कर गया था. अब सात साल हो गये हैं..और वह वापस आने का नाम नहीं ले रहा. क्या करुं? . लगता हैं वहाँ उसे कोई दूसरी मिल गई हैं. "

यह सुनकर परमेश्वर को बड़ा झटका लगा था. ऊस ने अपनी परिस्थिति के बारे मैं अपनी पत्नी को अंधेरे में रखकर बहुत बडी गलती की थी.

ऊस की आवाज ऊँची हो गई थी. ऊस ने ' कीसी ' को पूछा था.

" तुम जानना चाहती हो, मैं क्यों नहीं आया था.? . "

ऊस की बात में कोई गहरा दर्द छिपा था. मुझे ऊस बात का एहसास हुआ था.

वह तो ' कीसी ' को सवाल कर के बेड रूम में चला गया था. ऊस ने अलमारी से एक फ़ाइल निकाली थी, जिस पर अस्पताल का नाम प्रिंट था.

ऊस ने फ़ाइल मेरे हाथो में थमा दी थी.

मैं तुरंत बाजु में रखी हुई खुर्शी पर बैठे गया था.. औऱ सारे पेपर्स को देखने लग गया था. सच्चाई जानकर मेरे होंश उड़ गये थे.

परमेश्वर को काफ़ी समय पहले कार एक्सीडेंट हुआ था. ऊस में उसे गहरी चोट लगी थी. वह शारीरिक सुख पाने के लिये असमर्थ हो गया था.

हकीकत जानकर ' कीसी ' को पछतावा हुआ था. वह बहुत गिड़गिड़ाई थी, रोइ थी सर पटक कर माफ़ी मांगी थी.

परमेश्वर ने सब कुछ भूलकर उसे अपनी बाहों में कैद कर के अपने प्यार का एहसास दिलाया था.

सब कुछ ठीक हो जाने पर मैंने भगवान का पाड माना था औऱ उन के सुखी समृद्ध जिंदगी के लिये दुआ मांगी थी.

शारीरिक सुख ऊस के लिये अभिशाप बन गया था. ' कीसी ' ने इस बात को स्वीकार लिया था औऱ अपनी तकदीर से समजोता कर लिया था. और उस के मन में साध्वी बनने का ख्याल उभर आया था.

परमेश्वर मुझे काफ़ी समय के बाद मिला था. हमारे बीच बहुत सारी बातें हुई थी.. ' कीसी ' ने मुझे खाने के लिये आग्रह किया था, मैं खाना खाकर गया था. इस लिये मना कर दिया था.

शाम छह बजे तक हमारे बीच काफ़ी बातें हुई थी.. फिर हम लोग फ़िल्म देखने गये थे औऱ होटल में खाना भी खाया था.

रात को साढ़े नौ बजे मैं घर पहुंचा था.. सुजाता मेरी राह देख रही थी. मैं उन दोनों के साथ इतना व्यस्त हो गया था की सुजाता को बताना भी दयान से निकल गया था.

ऊस ने मेरी स्पेशल डिश बनाई थी. लेकिन मैं खाना खाकर घर गया था.. यह सुनकर वह निराश हो गई थी. ऊस ने देर से आने की वजह पूछी थी औऱ मैंने सब कुछ उसे बता दिया था.

परमेश्वर के साथ हुए हादसे की बात सुनकर उसे बहुत बुरा लगा था. मैं ' कीसी ' को बहन मानता था तो परमेश्वर उसे भाभी मानता था. ऊस के लिये वो मा से भी बढ़कर थी.

वह ज़ब भी दुबई से आता था.. सब के लिये कुछ ना कुछ लेकर आता था.. बच्चो के लिये भी बहुत चीजे लाता था.

एक बार वह सुजाता के लिये रिस्ट वोच लाया था.

परमेश्वर मुंबई में था.. ऊस दौरान रक्षाबंधन का त्यौहार आया था. मैंने हर साल की तरह उन लोगो को घर में इन्वाइट किया था.

लेकिन ऊस दिन बडी तेजी से बारिश हो रही थी. गाड़िया भी ठीक से नहीं चल रही थी. पटरी पर पानी भर जाने की खबर भी टी वी समाचार में सुनी थी.

मैंने तुरंत फोन लगाया था. लेकिन दूसरी ओर घंटी बज रही थी. कोई फोन नहीं उठा रहा था.

ऊस का मतलब था वह घर से निकल चुके थे.

मैं परेशान हालत में घर की गेलेरी में खड़ा बारिश का नजारा देख रहा था. ऊस समय मैंने उन्हें अपने बिल्डिंग के कंपाउंड में दाखिल होते हुए देखा था. उन्होंने मुशलाधार बारिश ने आने का कष्ट उठाया था यह देखकर मैं काफ़ी भावुक हो गया था.

मैंने बड़े प्यार से परमेश्वर को टोका था.

" इतनी बारिश में आने की क्या जरुरत थी. मुस्कान को ठंड लग जायेगी.. "

" संभव भैया! आप फ़िक्र मत करो. भगवान सब का साथी हैं, ऐसा कुछ नहीं होगा. औऱ आज़ का दिन हमारे लिये भी काफ़ी मायना रखता हैं.. हम लोग ना आये ऐसा कैसे हो सकता हैं? "

' कीसी ' ने आते ही रक्षाबंधन की रस्मे निभाई थी. ऊस ने मेरे कपोल पर टिका लगाया था औऱ मेरी कलाई पर राखी बांधी थी . फिर अपने हाथो से मिठाई खिलाई थी

. मैंने भी ऊसे अपने हाथो मिठाई खिलाई थी. ऊस ने झुककर मेरा चरण स्पर्श किया था औऱ मैंने ऊस के सर पर हाथ रखकर आशीर्वाद दिये थे.

फिर खाने का दौर शुरू हुआ.. ' कीसी ' ने कहां था:

" मैं अपने भैया की बाजु में बैठकर खाना खाउंगी, तुम भाभी के पास बैठकर खाना खाना. "

प्यार का यह अजीबो गरीब माहौल था, जिसे देखकर मेरी आँखों में खुशी की गंगा बह निकली थी.

यह देखकर ' कीसी ' चकित सी रह गई थी. ऊस ने मुझे सवाल किया था.

. " संभव भैया! आप क्यों रो रहे हो? "

" बहना! यह खुशी के आंसू हैं. मैं बड़ा खुश किस्मत हूं. भगवान ने मुझे बहन के रूप में तेरा उपहार दिया हैं. "

सुनकर ऊस की आँखे भी गिली हो गई थी.

                   000000000 ( क्रमशः)