यादों की सहेलगाह - रंजन कुमार देसाई Ramesh Desai द्वारा फिक्शन कहानी में हिंदी पीडीएफ

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यादों की सहेलगाह - रंजन कुमार देसाई

                          : प्रकरण - 17 :

शेठ ब्रदर्स में पगार का धोरण काफ़ी निम्न कक्षा का था. कोई भी सदस्य अपनी तनख्वाह से संतुष्ट नहीं था. बढ़ती हुई महेंगाई में गुजरान करना काफ़ी मुश्किल प्रतीत हो रहा था.

ऊस स्थिति में सब मिलकर मैनेजमेंट से बात करने को तैयार हो गये थे, जिस का नेतृत्व मैंने औऱ एक ब्राह्मण ने संभाला था.

वह मैनेजमेंट की बिरादरी का था. ना जाने उस को कया पट्टी पढ़ा दी थी. वह उन की गोद में बैठ गया था औऱ हमारी हार का निमित्त बन गया था.

मैनेजमेंट ने बच्चों को चोकलेट खिलाने जैसा काम किया था. मामूली वेतन बढ़ाया था. ऊस पर सब ने फेंसला किया था. " नया पगार कोई नहीं लेगा. "

लेकिन रायजी ने नये पगार के वाउचर पर सही कर दी थी. पूछने पर ऊस ने बताया था. उसे मालूम नहीं था. पगार नया था या पुराना?

अब यह कैसे हो सकता हैं? किस आदमी को कितना पगार मिलता हैं ऊस की पूरी जानकारी रखने वाला शख्स अपना पगार कैसे भूल सकता हैं? .

ऊस ने अपना शानपन दिखाते हुए मुझे केशियर के सामने सवाल किया था.

" क्या मैं साइन कैंसल कर दू? "

यह तो फ़साने वाली बात थी. मैंने कुछ जवाब नहीं दिया था.

मेरे साथ एक औऱ शख्स काम करता था. वह एकाउंट्स हेड था. लोग उसे बोंड्या कहकर बुलाते थे.

मुझे जो ' शेठ ब्रदर्स ' में लाया था ऊस ने ऊस की पहचान इस शब्द से करवाई थी.

मुझे ऊस का मतलब मालूम नहीं था. पुछने पर उस ने मुझे बताया था.

' बोंड्या मा ने निःसंतान व्यक्ति..'

ऊस की साली औऱ साढ़ू भाई हमारे बिल्डिंग में दूसरी मंज़िल पर रहते थे जहाँ हम लोग रहते थे.

मैंने ' शेठ ब्रदर्स ' ज्वाइन करके स्टाफ के सभी छोटे सदस्यों का मन जीत लिया था.. इस लिये सब लोग मुझे मानते थे, अपनी बातें शेयर करते थे., औऱ बोंड्या यह बात हजम नहीं कर पाता था.

कंपनी में अन्य व्यकित था जो मैनेजर का पद संभाल रहा था. उसे काम के सिवा कोई अधिकार नहीं दिये थे. मेरी हरदम ऊस से नौक जौक होती थी..

एक बार कंपनी के सीनियर भागीदार नाथालाल ने बाहर आकर बोंड्या के सामने मुझे सलाह दी थी.

" सुशील के पास बहुत काम हैं, आप को उन्हें मदद करनी चाहिये. "

मैंने फट से कह दिया था.

" ज़ब तक वह अपना modus operandi - काम करने का तरीका नहीं बदलेंगे तब तक कोई उन्हें मदद नहीं कर सकता. "

मुझे इस तरह बातें करते हुए देखकर वह अचंबित रहा गया था. मेरा गट्स उसे चुभ गया था.

यह तो ठीक था लेकिन ' कीसी ' के जाने के बाद काजल मेरे करीब आ गई थी, यह बात भी उसे खटकती थी..

बोंड्या को फर्स्ट क्लास के पास की सहूलियत मिलती थी मैं भी ऊस लेवल का था. तो मैंने भी फर्स्ट क्लास के पास की डिमांड की थी, जो धीमन्त कुमार ने मंजूर किया था.

काजल अच्छे घर की लड़की थी. वह फर्स्ट क्लास में यात्रा करती थी. ऊस के अंकल एक नामी सांज्य दैनिक के तंत्री थे.

हम लोग फर्स्ट क्लास में बाहर दरवाजे के पास खडे यात्रा करते थे. ओफिस से स्टेशन, औऱ गाड़ी की यात्रा की वजह से हमें कम से साथ रहने का मौका मिलता था.

वह एक लडके से प्यार करती थी. वह हमारे बाजु में रहता था.

कुछ समय में ऊस की शादी हो गई थी..

कुछ साल बीत गये थे. ऊस ने एक बेटी को जन्म दिया था ऊस वक़्त इत्तेफ़ाक़ हुआ था..सुजाता ने कृष्णा को जन्म दिया था औऱ दोनों एक ही प्ले स्कूल में भर्ति हो गये थे. इस बहाने सुजाता औऱ काजल दोनों मिलते थे. उन के बीच दोस्ती हो गई थी. औऱ काजल हमारे घर भी आती थी.

शादी के पहले मैं ऊस के घर गया था.

हम लोग रोजाना साथ स्टेशन तक जाते थे.

एक बार इंडिकेटर पर BO देखकर मैंने कहां था.

" BO या ने बोंड्या.. "

सुनकर वह हस पड़ी थी.

' कीसी ' के जाने के बाद ओफिस में हम लोगो ने मिनि पिकनिक का आयोजन किया था. मैं कीसी को भी शामिल करना चाहता था, लेकिन ओफिस के नमूने को याद कर के ऊस ने मना किया था.

ऊस दौरान एक नई लड़की को ओफिस में भर्ती किया गया था. ऊस का नाम विशाखा था. वह भी मुझ से खुल कर मिलती थी, बातें करती थी.

मैं उसे मजाक में विले पारला, सांताकृज़, खार कहता था.

पिकनिक में हम लोगो ने क्रिकेट खेला था.. विशाखा बेटिंग कर रही थी औऱ वह तुरंत आउट हो गई थी. मैंने उसे बेट छोड़ने को कहां था. तो उसे बुरा लग गया था.

मैंने इस्तीफा दिया था. लेकिन दूसरा जोब नहीं मिला था तो मैंने नये जोब के इंतजार में काम चालु रखा था, जिस से बोंडये को तकलीफ हुई थी. ऊस ने मुझे ताना मारा था औऱ मुझे मजबूरन जोब छोड़ना पडा था.

ऊस वक़्त मेरा एक वरिष्ठ पत्रकार औऱ तंत्री से परिचय हुआ था. वह महात्मा गांधीजी औऱ मोरारजी देसाई जैसे सत्यवादी और निडर थे.. उन के सामायिक में मुझे लिखने का ओर मौका मिला था.

उन्होंने एक मजेदार किस्सा सुनाया था..

वड़ा प्रधान का चुनाव था. ऊस में चरण सिंह, यशवंत राव चौहान और खुद मोरारजी उमेदवार थे

मोरारजी देसाई चुस्त शिस्त पालन के आग्रही थे. वह कुछ भी हो रोजाना आठ बजे सो जाते थे.

चुनाव हो गया था. कोई उन्हें बताने घर पहुंचा था.. वह तो सोये हुए थे. कहने पर ऊस के बेटे ने उन्हें उठाया था. और ऊस शख्स ने उन्हें बताया था.

" चरण सिंह वड़ा प्रधान बन गये. "

" अच्छा! " कह कर वह सो गये थे.

और दूसरे दिन वोही वड़ा प्रधान बने थे..

मुझे एक बार अंकलेश्वर में प्रत्यक्ष सुनने का मौका मिला था.

उन्होंने स्वर्गस्थ इंदिरा गांधी का किस्सा सुनाया था.

एक बार वह सभा में अपने गोगल्स भूल गये थे. उसे लेने के लिये उन्होंने ने स्पेशल हेलीकाप्टर दौड़ाया था.

और ऐसी व्यकित को लोगो ने 18 साल वडा प्रधान की हैसियत से निभाया था. लेकिन उन का अंत 18 गोलियों से हुआ था.

                   00000000000 ( क्रमशः )