यादों की सहेलगाह - रंजन कुमार देसाई Ramesh Desai द्वारा फिक्शन कहानी में हिंदी पीडीएफ

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यादों की सहेलगाह - रंजन कुमार देसाई

                         : प्रकरण 1 :

उस वक़्त मैं तीन साल का था, मेरा बड़ा भाई सुखेश पांच साल का था औऱ मेरी छोटी बहन भाविका केवल छह महिने की थी. उस वक़्त मेरी मा असाध्य बीमारी का शिकार हो गई थी.

उन्हें कांदिवली स्टेशन के बाहर स्थित एक सेनेटोरियम में रखा गया था.

मेरे पिताजी रोज सुबह जोब के लिये 9-00 बजे की लोकल ट्रैन पकडकर मुंबई जाते थे. स्टेशन एकदम बाजू में था इस लिये ट्रैन आने की आवाज सुनकर ही वह बाहर निकलते थे, औऱ टी सी की केबिन में चढ़ जाते थे.

औऱ हम दोनों भाई उस वक़्त बाहर पैसेज में बैंच पर बैठकर खेलते हुए पिताजी को जाते हुए देखते थे.

मेरी मा की एक सहेली थी..उस के साथ मेरे पिताजी की सगाई हुई थी, जो खुद की क़ोई गलती से टूट गई थी..औऱ बाद में मेरी मा औऱ पिताजी की शादी हो गई थी. उस बात को पांच साल से ज्यादा समय बीत गया था..

फिर भी वह लड़की मेरे पिताजी के पीछे पड़ गई थी. उसने मेरी मा को तकलीफ देने में कोई कसर बाकी नहीं छोड़ी थी . सहेली होने का फायदा लेकर उस ने मेरी मा को नाहक में एक्सप्लॉइट किया था.

ज़ब क़ोई दाव पेच नहीं काम नहीं आया तो उस ने मेरी मा को कुछ खिला दिया था. जिस वजह से उस की हालत बिगड गई थी. उस के लिये अनेकानेक उपचार करने के बावजूद भी मेरी मा की तबियत सुधरने का नाम नहीं ले रही थी.

भाविका के जन्म बाद तुरंत उन्हें अस्पताल में दाखिल करना पड़ा था.

उपचार में पिताजी ने क़ोई कसर नहीं छोड़ी थी.

भाविका के नसीब में अपनी मा का दूध भी पर्याप्त नहीं था. उसे ऊपर का दूध पिलाना पड़ता था. उस वजह से , वह काफ़ी कमजोर पड़ गई थी ..नानी मा ने उस के लालन पालन, उछेर में क़ोई कमी नहीं छोड़ी थी..

और एक दिन सेनेटेरियम से ही मा की अर्थी उठी थी.

पिताजी तीन बच्चों की इकलौते रहते हुए देखभाल नहीं क़र सकेंगे. यह सोचकर मेरी मा की जनेता ने हमारी जिम्मेदारी संभाली थी.

पिताजीने हमें भाड़े का घर लेकर गांव में नानी मा की निगरानी में छोड़ दिया था.

चार दिन हमारे साथ रहकर पिताजी भारी दिल होकर मुंबई लौट गये थे.

औऱ चौथे ही दिन एक बड़ा हादसा हुआ था.

हमारी पड़ोस में मनु चाचा रहते थे. उन का खुद का दो मजलिय बंगला था. जमीन औऱ खेती वाड़ी के मालिक थे . उन का एक लड़का था जनक, जो बड़ा शरारती औऱ खैपानी था. उसका मस्ती तूफान में क़ोई जोड़ नहीं था.

गांव में उस की गिनती बिगड़े हुए संतान में होती थी.

उस दिन किसान लोग उन के खेत की फ़सल का नमूना लेकर घर आये थे. वह लोग टांगे में आये थे और तुरंत वापिस जाना था, तो उन्हों ने घोड़े को बांधना जरूरी नहीं समझा था.

इस बात का मनु चाचा के लडके ने फायदा उठाया था. वह खाली टांगा देखकर तुरंत उस पर चढ़ गया था . इतना नहीं हमें भी टांगे में बैठने के लिये आमंत्रित किया था.

औऱ हम लोग तैयार हो गये थे. पहले मुझे टांगे में चढ़ाकर बड़ा भाई सुखेश भी टांगे में चढ़ गया था. हमें टांगे में बैठने को मिला था. इस बात का बहुत ही आनंद महसूस हुआ था.

उस वक़्त जनक को ना जाने क्या सुझा था?

उस ने मुंह से कुछ आवाज की तो घोड़े चलने लगे थे.. उस पर जनक ने एक घोड़े की पीठ पर जोर से चाबुक फटकार दिया था और घोड़े दिशा बदलकर तेज गति से भागने लगे थे.

इस स्थिति में हम तीनो गभरा गये थे. जनक ने टांगा चला तो लिया, लेकिन उसे कैसे रोकना वह मालूम नहीं था.

हम दोनों भाई नानी मा को हमें बचाने के लिये आवाज दे रहे थे, बूमरांग मचाते रहे थे.

रास्ते में छोटे बच्चे खेल रहे थे. उस का क्या होगा?

सारे गांव में चिंता औऱ दहशत का माहौल सा छा गया था.

टांगा हमें कहाँ ले जायेंगा? उस बात की सब चिंता हो रही थी.

नसीब कुछ अच्छे थे. टांगा आगे जाकर सामने एक टेकरी पर चढ़कर उलट गया था. हम दोनों टांगे के नीचे दब गये थे. हमें भारी चोट लगी थी. मैं सीधा गिरा था. सिर के पिछले हिस्से में मुझे चोट लगी थी, सात स्टिच लगे थे. मेरा भाई उल्टा गिरा था, उसे दो स्टिच आये थे औऱ जनक उछलकर रास्ते पर गिरा था. वह बालो बाल बच गया था.

डोक्टर भी हम दोनों भाइयों को खून से लथपथ देखकर चकित रह गये थे.

हमारे घर के पिछवाड़े ही डोक्टर का क्लिनिक था.

छोटे से गांव में उस हादसे की खबर बड़ी तेजी से फैल गई थी.

मेरा मौसेरा भाई भी खबर मिलते ही दवाखाना दौड़ आया था. उस ने तुरंत मुंबई फोन किया था. औऱ मेरे पिताजी रात तक हांसोट पहुंच गये थे.

उन को अपनी संतान को दूसरों के भरोसे रखने के लिये अफ़सोस हो रहा था.

उन्हों ने नानी मा को बहुत कुछ सुनाया था.

सुनकर वह रो पड़े थे. उस में ना तो उन की कोई गलती थी ना तो हमारी. टांगे में बैठने की लालच ने हमें उकसाया था, औऱ यह हादसा हुआ था.

फिर भी हम लोग बच गये थे. इस बात पर नानी मा ने भगवान का पाड माना था.

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दो तीन साल बीत गये थे. सुखेश को स्कूल में भर्ती क़र दिया था. वह स्कूल जाने लगा था.

मुझे भी पांचवा साल लगते ही स्कूल में भर्ती कर दिया गया था.

ना जाने क्यों हमारा पढ़ाई लिखाई में दिल नहीं लग रहा था.

हमें पढ़ने लिखने से ज्यादा गाय भेंसो को चारा खिलाने औऱ उन के दूध दोहने की प्रक्रिया देखने मे ज्यादा दिलचस्पी थी.

हमारी पड़ोस में एक ब्राह्मण औरत रहती थी. वह ज्यादा समय सेवा पूजा में व्यस्त रहती थी. उस ने अपने ही घर में मंदिर बनाया था. श्री नाथजी की मूर्ति स्थापित की थी. दिन में दो बार वह पूजा आरती करती थी.

उस के पास गाय भेंसे थी. उन को दोहकर वह दूध का व्योपार करती थी.

ऐसी स्थिति में हम लोगो ने स्कूल न जाकर बाहर भटकना शुरू क़र दिया था.

दो दिन तो नानी मा को पता नहीं चला था. लेकिन तीसरे दिन हमारी पोल खुल गई थी. नानी मा ने कुंभार के लड़को की मदद से हमें ढूंढ निकाला था. औऱ दोनों भाईयों को मेथी पाक खिलाया था. औऱ पूरी रात हमें भूखा प्यासा भी रखा था...उस के बाद मैं तो बराबर स्कूल जाने लगा था!

लेकिन बड़ा भाई?

               0000000000 ( क्रमश: )