यादों की सहेलगाह - रंजन कुमार देसाई Ramesh Desai द्वारा फिक्शन कहानी में हिंदी पीडीएफ

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यादों की सहेलगाह - रंजन कुमार देसाई

                          : प्रकरण - 8 :

हम लोग जिस जगह में रहते थे. उस के बाजू में एक दूसरी रूम थी जिस में उन की हयाति में नानी मा वहाँ रहती थी.

उन के बाद वह जगह मौसी को मिली थी. उन्हें उस की कोई जरूरत नहीं थी. इस लिये उन्हों ने उस जगह को भाड़े पऱ चढ़ा दिया था.

उस में एक परिवार रहने को आया था. उस की मुख्या ललिता बहन नाम की महिला थी. उन की पांच संताने थी

मेरे पिताजी का ससुराल भी उसी रूम में ही था.

ललिता बहन बहुत ही पहुंची हुई माया थी. भलभले की उलटी पट्टी पढाने अत्यंत माहिर थी. उन को कुछ भी मालूम नहीं था, फिर भी ऐसा दिखावा करती थी , मानो उसे सब कुछ मालूम हो . वह दुनिया की एक नंबर की महिला थी, जिस के बिन जिम्मेदार रवइये से सारा परिवार अपनी दिशा भूल गया था. झूठ उन का जीवन मंत्र बन गया था.

वह पहले दूसरी जगह रहते थे. वहाँ उन का नाम हर तरफ से ख़राब हो गया था. उन की सारी संताने गलत सोच की शिकार बन गई थी.

14-15 की कच्ची आयु में उन की दूसरे नंबर की बेटी सुहानी बहुत आगे निकल गई थी. उस के दो लडके से चक्कर चालू हो गये थे. दोनों लड़को को वह अपने इशारो पर नचाया करती थी..

संजय धनवान परिवार से था. उसे पानी मांगने पर दूध मिलता था. पैसे की कोई कमी नहीं थी. इस वजह से वह संजय की मिल्कत की लालच और भौतिक सुख के लिये उस को पकडकर बैठी थी.

संजय उस के इरादों से अवगत था. वह जो चाहता सुहानी उसे देती थी. इस लिये कठपुतली की तरह नाचता रहता था. उस के इर्द गिर्द घूमता रहता था. खिलोने की तरह खेलता रहता था. उस को सुहानी के शरीर में दिलचस्पी थी..सुहानी भी सब कुछ जानती थी. वह भौतिक सुख और मौज मजा के लिये संजय के साथ रहती थी, उस की मांगे पूरी करती थी. इतना ही नहीं उस की जेब खाली करती रहती थी.

दूसरा लड़का अनिकेत था, जो संजय से कई गुना अच्छा था. दोनो एक दूसरे से प्यार करते थे. लेकिन अनिकेत की जेब खाली थी. इस लिये सुहानी ज्यादा उसे भाव नहीं देती थी.

अनिकेत के पिताजी गुजर गये थे. इस स्थिति में सारे घर की जिम्मेदारी उस के सिर आन पड़ी थी. घर में दो कंवारी, जवान बहने बैठी थी. उन की शादी के लिये पैसे जोड़ने के लिये उसे दिन रात कडी मेहनत करनी पड़ती थी.

परिवार में साथ में ललिता बहन की विधवा जेठानी पुष्पा बहन भी रहते थे.. घर हकीकत में उन की वजह से ही चल रहा था.

उस की बड़ी लड़की का नाम सुजाता था. जिस का परिचय मेरी अपनी बहन भाविका के जरिये हुआ था.

परिचय बहुत जल्द दोस्ती में तब्दील हो गया था.

उस के पहले एक दर्दनाक किस्सा हुआ था. पड़ोस में रहने वाले अनिश के पिताजी का एक असाध्य बीमारी में देहांत हुआ था, और सुहानी हमदर्दी के नाते उस के बेटे अनिश के साथ शुरू हो गई थी.

और संजय और अनिकेत बाहर हो गये थे.

अनिश की सौतेली मा आनंदी बहन के घर के साथ हमारा घर जैसा रिश्ता था, bलेकिन ललिता बहन के आगमन से सब कुछ तहस महस हो गया था..

आनंदी बहन पहले मेरे साथ अच्छा व्यवहार करते थे, मुझे अपना बेटा मानते थे. लेकिन ललिता बहन के आने से सब कुछ बदल गया था.

उन्हों ने ना जाने आनंदी बहन को क्या पट्टी पढ़ाई थी?

गरिमा से मैंने शादी करने की जिद पकड़ी थी.. उस बात को लेकर उन्हो ने ललिता बहन को मेरे बारे में बहुत भड़काया था.

वह दोनों देर रात तक बाहर चाली में बैठकर दुनिया भर की बुराई करते रहते थे. उन के सारे अवगुण मानो आनंदी बहन में उतर आये थे.

. उन्हों ने गरिमा के साथ मेरे प्रेम प्रकरण चढ़ा फिराकर ललिता बहन के सामने पेश किया था जिस की वजह से शुरू में मेरे प्रति उन के दिलो दिमाग़ में गलत फहमी पैदा हुई थी. जिस को होली के अवसर ने बढ़ावा दिया था.

उस दिन सब लोग होली खेल रहे थे जिस में मेरे सिवा हर कोई शामिल था.

भाविका और सुजाता आपस में होली खेल रहे थे.

दूसरी और सुहानी और अनिश एक दुसरो को रंग लगा रहे थे. मैं तो होली खेलता नहीं था. तो दूर खड़ा दोनों बहनो का खेल देख रहा था.

ईतने में क्या हुआ? सुहानी ने आकर मुझे रंग लगा दिया .

मैं तो होली खेलता नहीं था. इस बात से अनजान सुहानी ने मुझे रंग लगाया था, जिस से मानो सुजाता को रंग लगाने का अनिश को अधिकार मिल गया था.

उस ने सुजाता को रंग लगाने की कोशिश की तो उस ने रोक लिया था. उस पर वह उखड़ गया था. और तुरंत जाकर ललिता पवार से शिकायत दर्ज कर दी थी :

" सुजाता दीदी संभव भैया से रंग लगवाती हैं. और मुझे मना कर रही हैं. "

यह सुनकर ललिता पवार ने बिना कुछ सोचे समझे सुजाता को डांट दिया था.

उस ने आकर मुझे बताया था.

मैंने केवल अनिश को इतना ही सवाल किया था.

" क्या तुमने मुझे रंग लगाते हुए देखा था?

उस वक़्त अनिश ने सोचा नहीं था.

बात बढ़ जायेगी.

उसे ललिता बहन का साथ था. इस लिये वह मेरे साथ बदतमीज़ी से पेश आया था. उस ने मुझे चैलेंज किया था . और मेरा हाथ उस पर उठ गया था.

बात आपे से बाहर हो गई थी.

मैंने उस के भतीजे पर हाथ उठाया था. यह बात जानकर उस के बड़े पापा - पिताजी के बड़े भाई तुरंत मेरे घर दौड़े आये थे. औऱ बिना कुछ पूछे, जाने वह मुझ पर बरस पड़े थे. ललिता पवार ने भी उन्हें भड़काने में कोई कसर बाकी नहीं छोड़ी थी.

" आप क्यों उसे मुंह लगाते हो? वह तो पागल हैं.. आप क्यों उस से जीभा जोड़ी करते हो?! "

यह सुनकर उन के भीतर एक फ़िल्मी हिरो जैसा जोम आ गया था.

" तुम्हारी दादा गिरी इतनी बढ़ गई हैं.."

उन्हों ने सीधा ही मुझ पर शाब्दिक प्रहार किया था

औऱ झगड़ा बढ गया था. मैंने गुस्से में उन की कफनी फाड़ दी थी.

उन्हों ने बिना वजह गरिमा के किस्से को याद कर के बबडाट शुरू कर दिया था.

एक गलत फहमी की वजह से मैंने उस के साथ शादी करने के बारे में सोचा था, जिसे उन्हों ने दादा गिरी का रूप दे दिया था.

ललिता बहन ने भी बिना सोचे समझें आगे में तेल छिड़कर मुआमला ओर बिगाड़ दिया था.

उन्हों ने मेरे बारे में अनिश के बड़े पापा को भड़काया था..

उस के बाद हमारे बीच बातचीत का रिश्ता टूट गया था. 

                         000000000   ( क्रमशः )