यादों की सहेलगाह - रंजन कुमार देसाई Ramesh Desai द्वारा फिक्शन कहानी में हिंदी पीडीएफ

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यादों की सहेलगाह - रंजन कुमार देसाई

                      प्रकरण - 4 :

एक दिन मैं बाहर चोल में आराम खुर्शी डालकर बैठा था. उस वक़्त किसी छोटे लड़केने आकर मुझे बताया था.

" गली के नुक्कड़ पर कुछ लोग अपूर्व भैया की धुलाई कर रहे हैं. "

वह मेरा दोस्त था उस को बचाना मेरा फ़र्ज था.

मैं तुरंत दौड़कर नुक्कड़ पहुंच गया था.

कौन उसे मार रहा था?. यह देखकर मैं चौंक सा गया था.

मेरे तीन क्लास मेट्स, नजदीकी दोस्त यह हरकत कर रहे थे. उन्हें भला अपूर्व से क्या दुश्मनी हो थी?.. वह लोग उसे कैसे पहचानत थे?

क्यों अपूर्व को मार रहे थे?

एक साथ कई सवाल उठे थे.

उन्हें देखकर मुझे विश्वास हुआ था. मेरे कहने पर वह लोग उसे छोड़ देंगे. लेकिन यहाँ तो बिल्कुल उल्टा माजरा हुआ था. उन्हों तो मुझे पहचानने से भी इन्कार कर दिया था..

यह बिल्डिंग के वही लड़को की साजिश थी जिस को मेरा अनन्या के साथ बातचीत का सिलसिला शुरू होने से तकलीफ हुई थी. उन्होंने ने ही मेरे दोस्तों का संपर्क कर के अपूर्व को मारने की साजिश थी और उस में मुझे फसाया था. मुझे उस के बारे में कोई जानकारी नहीं थी.

उस वक़्त सच्चाई क्या थी? मुझे कुछ पता नहीं था.

मैंने जाकर अनन्या को बताया था.

"कुछ लोग अपूर्व को मार रहे हैं. "

यहाँ तक तो बात ठीक थी. लेकिन मैंने ' अनाड़ी ' की भूमिका निभाते हुए खुलासा किया था.

" तीनो मेरे दोस्त हैं. "

अब उस बात का क़ोई क्या मतलब निकाल सकता था?

सब की उंगलियां मेरे खिलाफ उठ सकती थी, जो मुझे समझ नहीं आया था.

मैंने ही उस को मारने का षडयंत्र रचा था. खुद मैंने अनजाने में समर्थन दिया था.

उसे बचाना मेरा कर्तव्य था. इसी लिये मैं दौड़कर नुक्कड़ पहुंच गया था. उसे मारने वाले मेरे अपने ही दोस्त ही निकले थे.

लेकिन मैंने ऐसा कुछ नहीं किया तो उसे मेरी नियत पर संदेह हुआ था. जिस के लिये मैं कसूरवार साबित हुआ था.

अनन्या ने भले मुझे कुछ नहीं कहां था.

लेकिन उस की बोडी लैंग्वेज ने मुझे ऐसा मानने के लिये प्रेरित किया था, मैंने हीं अपूर्व को मारने के लिये अपने दोस्तों को तैयार किया था..

एक हप्ते के बाद पिताजी की बुआ ने हमें अपनी बेटी की शादी के लिये मांकवा बुलाया था. उसी दौरान उन के जेठ गुजर गये थे. इस कारण शादी कुछ समय के रोकनी पड़ गईं थी.

बुआ ने इस के बारे में हमें बताया नहीं था. और कहो तो बताने का मौका ही नहीं मिला था . और हम लोग मांकवा पहुंच गये थे. और उसी समय उन की ननामी उठी थी.

दुःख की घड़ी में हमें देखकर बुआ और परिवार के सभी सदस्यों को अच्छा लगा था. बुआ के तीन लड़के और चार लड़कियां थी. उन की तीसरी बेटी की शादी होने वाली थी जो रुक गईं थी. उस के बाद उन की एक बेटी थी नीला. जो भी मेरी बुआ थी और मेरी हम उम्र थी.

घर के सभी मर्द और औरत लोग रोजाना स्नान करने के लिये नदी पर जाते थे.

यह सुनकर मुझे भी नदी में जाकर स्नान करने का मन हुआ था.

मैंने अपनी इच्छा पिताजी को बताई थी. जिसे सुनकर नीला के पिताजी ने उसे सुचना दी थी.

" जाओ! संभव भैया को नदी का रास्ता दिखाकर आओ. "

हम लोग तुरंत घर से बाहर निकल गये थे. मेरी बहन भाविका भी हमारे साथ थी.

नीला बिल्कुल मेरे साथ चल रही थी. बार बार हमारे देह आपस में टकराते थे. मैं बिंदास्त उस के कंधो पर हाथ रखकर चल रहा था.

उस पर नीलाने कोई दिक्कत नहीं थी.. मेरी कुहनी एक दो बार उस की छाती को भी छू गई थी. उस पर भी नीला ने क़ोई प्रतिभाव या एतराज जाहिर नहीं किया था.

नदी पहुंचकर उस ने मुझे आदेश दिया था.

" कपड़े उतारो और कूद पड़ो. "

" मुझे तैरना नहीं आता!! "

मेरा खुलासा सुनकर उस ने मुझे आश्वस्त किया था.

" कोई बात नहीं किनारे के पास बैठकर पानी डालकर अपनी मुराद पूरी कर लेना."

इतना कहकर वह भी अपना फ्रोक निकालकर ब्रा सहित नदी में कूद गई थी. उस की ब्रा में दो काली गोटिया सांगोपाग दिख रही थी

उस को देखकर भाविका भी नीला ने भी उस की स्थिति में आकर नदी में झंपलाया था.

15/20 मिनट पानी में रहकर हम लोग बाहर आ गये थे. ठंडा पानी मुझे माफिक नहीं आया था. मेरा बदन थर थर कांप रहा था.

हम लोग बाहर आकर रेत में बैठकर बाते करने लग गये .

उस समय एक युवान शख्स हमारे पास आया था.

नीला ने उस का परिचय करवाया था.

" यह हैं डोक्टर निलेश!! "

नीला उस से बहुत खुलकर बाते कर रही थी.

उन के बीच कुछ कनेक्शन था. जिस का मुझे कोई इल्म नहीं था.

मैं बुआ और उस के परिवार के आग्रह के कारण अकेला एक हप्ता मांकवा में रुक गया था.

उस दौरान मुझे नीला के बारे में बहुत कुछ अनापशनाप सुनने को मिला था. मैं उस के ओर करीब आ गया था. कथित डोक्टर निलेश के साथ उस का आड़ व्यवहार था..उस का भी पता लग चूका था.

उस की मौसी की बहु की बड़ी बहन ने मुझे उस के बारे सब कुछ बताया था.

उस समय मुझे सेक्स के बारे में कुछ पता नहीं था. फिर भी अनजाने में मुझ से नीला के साथ कुछ गलत हरकत हो गई थी.. इस लिये खुद नीला का व्यवहार जिम्मेदार था.

एक बात मेरे कुले पर फोडा हुआ था. बुआ ने मेरे लिये हल्दी का लेप तैयार किया था. मैं उसे लगाने दूसरी रूम में जा रहा था. उस वक़्त नीला बेधड़क मेरे पीछे आई थी. उस ने मुझे ओफर किया था.

" मैं आप को लेप लगा दूं? "

उस की बात सुनकर मैं चकित रह गया था.

युवान क्या मध्यम उम्र की औरत भी ना करे ऐसी ओफर नीला ने बेधड़क मुझ से की थी.

मैंने खुद भीतर जाकर अपने हाथो लेप लगाया था. उस से वह नाराज हो गई थी. उस ने मुझे बुद्धू होने का शिर पाव भी दिया था.

मुझे उकसाने के लिये वह कुछ ना कुछ हरकते करती रहती थी.

वह अपनी बहन के 15 वर्षीय लडके को अपनी गोद में बिठाकर उस के गालों को चूमती थी.

इस बहाने मुझे गलत करने के लिये आमंत्रित करती थी. जिस का मुझे उस वक़्त कुछ पता नहीं था.

आखिर मुंबई लौटने का समय आ गया था.

उस की अगली रात वह मेरे से डेढ़ फिट की दुरी रखकर सो गई थी. मैंने भावुक होकर उसे सवाल किया था:

" कैसी हो बहन? "

यह पूछते हुए मेरा हाथ अनायास उस के पेट पर आ गया था. लेकिन मैंने कुछ नहीं किया था.

मेरी जगह अन्य कोई होता तो?

उस ने नीला को नहीं छोड़ा होता.

मैं सुबह में तैयार होकर एक पड़ोसी युगल के साथ बस में स्टेशन पहुंचा था. वह लोग श्री नाथजी जा रहे थे. वह शादी का नया जोड़ा था. बुआ ने उन्हें मुझे ठीक से गाड़ी में बिठाने की गुजारिश की थी.

लेकिन वह दोनो तो रोमियो जुलियट की तरह गाड़ी आते हीं उस में चढ़ गये थे. और उस के पीछे मैं ज्यू त्यु भीड़ को चीरते हुए गाड़ी में चढ़ गया था.

गाड़ी में चढ़ते ही मुझे चाय की तलप लगी थी. मैंने चाय वाले से चाय का कप ख़रीदा था.

दोपहर को डेढ़ बज गये थे. और मैं दहानू रोड पहुंचा था. मैंने स्टेशन के फेरी वालों से भेल का पैकेट खरीद कर नास्ता किया था.

शाम को चार बजे मैं मुंबई सेन्ट्रल पहुंच गया था.

मुझे देखकर पिताजी को अचरज हुआ था

मैं उम्र में छोटा था. और मैं अकेला इतनी दूर से यात्रा कर के मुंबई आया था., उस बात से चकित हुए थे, साथ में प्रभावित भी हुए थे.