प्रसव Sonam Brijwasi द्वारा प्रेम कथाएँ में हिंदी पीडीएफ

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प्रसव

(पांच महीने बी(पाँच महीने बीत चुके थे। सिमरन अब उस हवेली की चारदीवारी में कैद हो गई थी। करन का कोई पता नहीं था, न कोई फोन, न कोई संदेश। वह अंधेरे में कहीं खो गया था, जैसे धुएं में मिल जाए।)

सिमरन की हालत अब बहुत नाजुक हो गई थी। बच्चे के असामान्य रूप से तेज विकास ने उसके शरीर को पूरी तरह थका दिया था। उसकी हड्डियां दर्द से टूट रही थीं, मांसपेशियों में ऐंठन रहती थी, और वह बिस्तर से उठ भी नहीं पाती थी। उसे चलने के लिए सहारे की जरूरत होती थी। उसका चेहरा पीला पड़ गया था, आँखों के नीचे गहरे काले घेरे थे, लेकिन उसकी आँखों में अभी भी एक अजीब सी चमक थी—मातृत्व की जिद्द।

(एक रात, बाहर तूफान गरज रहा था। सिमरन बिस्तर पर लेटी हुई थी, उसकी सांसें भारी थीं। अचानक, उसके पेट में एक तेज झटका लगा।)

*आह्ह्ह!*

(दर्द इतना तीव्र था कि सिमरन की चीख निकल गई। यह प्रसव पीड़ा जैसा नहीं था, बल्कि ऐसा लग रहा था जैसे उसके अंदर कोई जानवर बाहर निकलने के लिए संघर्ष कर रहा हो। उसका पेट सख्त हो गया, और नसें फूल गईं।)

सिमरन (रोते हुए, दर्द से कराहते हुए) बोली - 
नहीं... अभी नहीं... अभी बहुत जल्दी है...
छोटे से, रुक जाओ... तुम्हें और समय चाहिए...

(लेकिन बच्चा नहीं रुका। दर्द की लहरें लगातार आ रही थीं, हर बार पहले से ज्यादा तेज। सिमरन का शरीर कांपने लगा। उसे लगा जैसे उसकी रीढ़ की हड्डी टूट रही हो।)

(शोर सुनकर रमा देवी दौड़ती हुई कमरे में आईं। उन्होंने सिमरन को बिस्तर पर तड़पते हुए देखा।)

रमा देवी (घबराकर) बोली - 
मालकिन! क्या हुआ?
आप ठीक तो हैं?

सिमरन (पसीने से लथपथ, दर्द से बिलखते हुए) बोली - 
रमा दीदी... दर्द... बहुत तेज दर्द हो रहा है।
बच्चा... बच्चा बाहर आना चाहता है।

रमा देवी की आँखें फैल गईं।

रमा देवी बोली - 
पर मालकिन, आपको तो अभी दो महीने बाकी हैं!
यह कैसे संभव है?

सिमरन (चीखते हुए) बोली - 
मुझे नहीं पता! बस मदद कीजिए!
डॉक्टर को बुलाइए... जल्दी कीजिए!

(रमा देवी तुरंत फोन उठाकर डॉक्टर अंजलि को कॉल करने लगीं। लेकिन सिमरन का दर्द अब असहनीय हो चुका था। उसने बिस्तर के चादर को कसकर पकड़ लिया। उसके नाखून चादर में घुस गए।)

(अचानक, कमरे की लाइटें टिमटिमाने लगीं। हवा में एक अजीब सी गंध फैल गई—जले हुए मांस और ओजोन की।)

सिमरन (हांपते हुए, आँखों में आंसू भरे) बोली - 
रमा दीदी... खिड़की बंद कीजिए।
हवा... हवा बहुत तेज है।

(लेकिन खिड़की तो बंद ही थी। यह हवा अंदर से आ रही थी—सिमरन के शरीर से निकल रही ऊर्जा की वजह से।)

(तभी, सिमरन के पेट से एक तेज नीली रोशनी फूट पड़ी। रमा देवी चौंककर पीछे हट गईं।)

रमा देवी (डरते हुए) बोली - 
हे भगवान! यह क्या है मालकिन?

सिमरन (कमजोर आवाज़ में, लेकिन दृढ़ता से) बोली - 
डरो मत, रमा दीदी।
यह मेरा बच्चा है।
वह बाहर आ रहा है।

(दर्द की एक और लहर आई। सिमरन चीख पड़ी। इस बार उसकी चीख में इंसानी आवाज़ के साथ-साथ एक जानवर जैसी गुर्राहट भी थी।)

(बाहर तूफान और तेज हो गया। बिजली कड़की। और उसी क्षण, हवेली के मुख्य दरवाजे पर जोर से धक्का लगा।)

*धड़ाम!*

(रमा देवी दरवाजे की ओर देखती हैं।)

रमा देवी बोली - 
कौन है? इतनी रात को?

(लेकिन सिमरन की नजरें दरवाजे पर टिक गईं। उसे एक परिचित ऊर्जा महसूस हुई। एक परिचित गंध।)

सिमरन (फुसफुसाते हुए, आँखों में चमक के साथ) बोली - 
करन जी...?

(दरवाजा फिर से हिला। जैसे कोई बाहर से उसे तोड़ने की कोशिश कर रहा हो।)

"प्रसव पीड़ा शुरू हो चुकी थी।
समय से पहले।
और शायद... उसी वक्त, जब सबसे ज्यादा जरूरत थी,
वह वापस आ रहा था।

(रमा देवी ने कांपते हाथों से दरवाजा खोला। बाहर तूफान की आंधी चल रही थी, बारिश की बूंदें करन के चेहरे पर पड़ रही थीं, लेकिन वह भीगा हुआ नहीं लग रहा था। उसकी आँखें लाल थीं—गुस्से या डर से नहीं, बल्कि एक अजीब सी बेचैनी और पीड़ा से। उसके कपड़े फटे हुए थे, जैसे वह किसी जंगल से होकर भागता हुआ आया हो।)

रमा देवी (हैरानी और गुस्से के मिश्रित स्वर में) बोली - 
मालिक... आप?
इतनी रात को? इतने तूफान में?

करन (सांस फूलते हुए, आँखें चौड़ी किए) बोला - 
सिमरन कहाँ है? मुझे... मुझे कुछ भी ठीक नहीं लग रहा।
एक अजीब सी खिंचाव... जैसे कोई मेरी रूह को खींच रहा हो।
वो... वो ठीक तो हैं?

(रमा देवी ने करन को ऊपर से नीचे तक देखा। उसके चेहरे पर वर्षों का गुस्सा और चिंता उबल पड़ी।)

रमा देवी (कड़वे स्वर में) बोली - 
वहाँ रे मोहब्बत... जब मालकिन को आपकी सबसे ज्यादा जरूरत थी, तब तो छोड़कर चले गए आप।
अब जब उन्हें दर्द हो रहा है, तब याद आए?

(करन का चेहरा पीला पड़ गया। उसने रमा देवी की बात सुनी, लेकिन उसका ध्यान सिर्फ ऊपर की ओर था, जहाँ से सिमरन की हल्की सी कराहने की आवाज़ आ रही थी।)

करन (घबराकर) बोला - 
कैसी है वो? क्या हुआ उसे?

रमा देवी (आँखें झुकाकर) बोली - 
लेबर पेन हो रहा है। प्रसव पीड़ा।

(करन स्तब्ध रह जाता है। उसकी आँखों में विश्वास नहीं होता।)

करन (हकलाते हुए) बोला - 
क्या? पाँच महीने में ही...?
यह असंभव है... सामान्य बच्चे नौ महीने में...

(तभी, ऊपर से सिमरन की एक तेज चीख सुनाई देती है। करन का पूरा शरीर कांप उठता है। वह बिना एक पल गंवाए सीढ़ियों की ओर दौड़ पड़ता है।)

करन (चीखते हुए) बोला - 
मुझे सिमरन के पास जाना है! अभी!

(रमा देवी उसके रास्ते में खड़ी हो जाती हैं। वे बुजुर्ग हैं, लेकिन उनकी आँखों में एक माँ जैसा आक्रामक रुख है।)

रमा देवी (सख्त आवाज़ में) बोली - 
नहीं! यह हम औरतों का मामला है।
आप बाहर रहिए।
डॉक्टर साहिबा आ रही हैं। आपकी मौजूदगी सिर्फ हड़बड़ी बढ़ाएगी।
और वैसे भी... आपने खुद ही तो कहा था कि आप खतरनाक हैं।
तो आज इस खतरे को कमरे के बाहर ही रखिए।

(करन रुक जाता है। रमा देवी की बात उसे तीर की तरह चुभती है। वह जानता है कि वे सही कह रही हैं। लेकिन उसका दिल, उसकी आत्मा, सिमरन के पास जाने के लिए चीख रही है।)

(वह सीढ़ियों के पास खड़ा हो जाता है, मुट्ठियां भींचे हुए। उसकी लाल आँखें अंधेरे में चमक रही हैं। वह सुन सकता है—सिमरन की भारी सांसें, डॉक्टर की व्यस्त आवाज़ें, और... उस बच्चे की गुर्राहट, जो अब और तेज हो गई है।)

करन (धीमे, दर्द भरे स्वर में, खुद से) बोला - 
माफ़ करना, सिमरन...
मैं यहीं हूँ।
मैं कहीं नहीं जा रहा।
चाहे तुम मुझे अंदर आने दो या न दो... मैं तुम्हारी रक्षा करूंगा।

(वह सीढ़ियों के पास जमीन पर बैठ जाता है, पीठ दीवार से लगाए। वह अपनी इंद्रियों को तेज करता है, ताकि हर आवाज़, हर बदलाव को महसूस कर सके।)

(ऊपर, कमरे में, सिमरन बेहोशी की हालत में है। डॉक्टर अंजलि और रमा देवी उसके पास हैं। सिमरन का पेट अजीब तरीके से फूल रहा है, और उसमें से नीली रोशनी निकल रही है।)

डॉक्टर अंजलि (घबराकर) बोली - 
यह सामान्य प्रसव नहीं है।
बच्चा... बच्चा बहुत ताकतवर है।
सिमरन का शरीर इसे सहन नहीं कर पा रहा।

रमा देवी (रोते हुए) बोली - 
कुछ कीजिए डॉक्टर साहिबा! बचाइए मेरी मालकिन को!

"प्रसव शुरू हो चुका था।
लेकिन यह जन्म किसी सामान्य बच्चे का नहीं था।
यह एक नई शक्ति का उदय था।
और करन... वह अब दरवाजे के बाहर नहीं रह सकता था।"