(एक महीना बीत चुका था। हवेली का वह कोना, जहाँ कभी करन की मौजूदगी से गर्माहट होती थी, अब बर्फ़ जैसा ठंडा और वीरान हो गया था।)
(सिमरन अब उस सिमरन नहीं रही थी जो रोती-बिलखती दरवाज़े पर खड़ी रहती थी। उसके चेहरे के भाव गायब हो गए थे। आँखों में नमी नहीं, बल्कि एक सूखापन था। उसने अपने लंबे बालों को एक सख्त चोटी में बांध लिया था, जैसे वह अपने अतीत को भी कसकर बांधना चाहती हो।)
(उस दिन डॉक्टर ने उसे पुष्टि की थी कि वह गर्भवती है। 'छह सप्ताह,' डॉक्टर ने कहा था। सिमरन ने बिना किसी प्रतिक्रिया के दवाइयां लीं, रिपोर्ट फाइल में रखी, और घर वापस आ गई। उसने करन को ढूंढने के लिए शहर के हर कोने में चक्कर लगाए—पुराने दोस्तों से पूछा, उन जगहों पर गई जहाँ वे कभी साथ जाते थे। लेकिन करन का कोई पता नहीं था। वह हवा में घुल गया था।)
(अब, एक महीने बाद, सिमरन अपने बेडरूम में आईने के सामने खड़ी है। वह अपने पेट को देखती है, जो अभी तक सामान्य ही लग रहा है, लेकिन उसे अंदर से एक हल्की सी हरकत महसूस होती है।)
सिमरन (आईने में अपनी परछाईं से बात करते हुए, ठंडी और सपाट आवाज़ में) बोली -
तुम अकेले हो, छोटे से।
और मैं भी।
लेकिन अब रोने का वक्त खत्म हुआ।
(वह अपनी मुट्ठी भींचती है। उसकी नाखून हथेलियों में धंस जाते हैं, लेकिन उसे दर्द नहीं होता। उसने अपना दिल पत्थर बना लिया है। पत्थर टूटता नहीं, पिघलता नहीं, और सबसे ज़रूरी—पत्थर को चोट नहीं लगती।)
(वह अलमारी से करन की कुछ चीज़ें निकालती है—उसकी घड़ी, उसका रूमाल, एक पुरानी तस्वीर। वह इन्हें देखती है, लेकिन उसकी आँखों में कोई नमी नहीं आती। वह एक बड़ा कार्डबोर्ड बॉक्स लाती है और इन सभी चीज़ों को उसमें डाल देती है।)
सिमरन (बॉक्स को टेप करते हुए) बोली -
ये यादें अब मेरी कमजोरी नहीं, मेरी ताकत बन जाएंगी।
अगर करन जी नहीं हैं, तो कोई बात नहीं।
मैं इस बच्चे को पालूंगी। इसे इंसान बनाऊंगी।
और अगर करन जी कभी वापस आए... तो उन्हें यह देखकर हैरानी होगी कि उनकी 'कमजोर' सिमरन ने कैसे दुनिया को हरा दिया।
(वह बॉक्स को अलमारी के सबसे ऊपर वाले शेल्फ पर रख देती है, जहाँ से उसे रोज़ाना दिखाई दे। यह सजा नहीं, एक चेतावनी है।)
(तभी, नीचे दरवाज़े की घंटी बजती है।
सिमरन चौंकती नहीं। वह धीरे से नीचे जाती है। दरवाज़ा खोलती है।
बाहर एक डाकिया खड़ा है, हाथ में एक लिफाफा लिए।)
डाकिया बोला -
मैडम, आपके नाम एक चिट्ठी है। कोई पता नहीं लिखा, बस आपका नाम है।
(सिमरन लिफाफा लेती है। उस पर कोई नाम नहीं, कोई पता नहीं। बस एक मोहर लगी हुई है—एक काला पंख।
सिमरन का दिल एक पल के लिए ज़ोर से धड़कता है, लेकिन वह तुरंत अपने चेहरे पर सख्ती ला लेती है।)
(वह लिफाफा खोलती है। अंदर सिर्फ एक कागज का टुकड़ा है, जिस पर लाल स्याही से लिखा है:)
*"सुरक्षित रहो। मेरे पास मत आना।"*
(सिमरन कागज को देखती है। फिर उसे धीरे-धीरे फाड़ देती है। टुकड़े-टुकड़े करके हवा में उड़ा देती है।)
सिमरन (ठंडी मुस्कान के साथ) बोली -
आपकी चिंता के लिए शुक्रिया, करन जी।
लेकिन अब मैं सुरक्षित हूँ। क्योंकि अब मेरे पास खोने के लिए कुछ नहीं बचा।
(वह दरवाज़ा बंद कर देती है।
अंदर, हवेली में सन्नाटा है। लेकिन इस बार, यह सन्नाटा डरावना नहीं, बल्कि शांत और स्थिर है।)
"सिमरन ने करन को खो दिया था।
लेकिन बदले में, उसने खुद को पा लिया था।
एक अकेली माँ, एक अनजान भविष्य, और एक पत्थर सा दिल।
अब खेल बदल चुका था।"
(दिन में सिमरन एक मजबूत औरत थी। वह ऑफिस जाती, काम करती, लोगों से बात करती, मुस्कुराती भी। सब कहते—"कितनी हिम्मत वाली औरत है, अकेले सब संभाल रही है।"
लेकिन रात... रात एक अलग दुनिया थी।)
(रात के दो बज रहे थे। हवेली का बेडरूम अंधेरे में डूबा हुआ था। सिमरन बिस्तर पर लेटी थी, लेकिन उसकी आँखें खुली थीं। वह करवट बदलती थी, तकिये को गले लगाती थी, लेकिन नींद नहीं आ रही थी।)
(उसका शरीर थका हुआ था, लेकिन उसका मन... उसका मन जाग रहा था। हर सांस में उसे करन की खुशबू महसूस होती थी। तकिये पर अभी भी उसकी याद बसी थी। वह अपने पेट पर हाथ रखती थी, जैसे बच्चे से बात कर रही हो।)
सिमरन (फुसफुसाते हुए, आँखें बंद किए) बोली -
छोटे से... तुम सो जाओ।
मम्मी भी सोने की कोशिश कर रही है।
लेकिन... मम्मी को नींद नहीं आ रही।
(वह उठती है, पानी पीती है, वापस आकर लेटती है। लेकिन जैसे ही वह आँखें बंद करती है, उसे करन की बाँहें याद आ जाती हैं—वह ठंडी लेकिन सुरक्षित बाँहें जो उसे घेर लेती थीं। वह करन के सीने की धड़कन सुनने के लिए तरस रही थी।)
(वह करवट बदलती है, लेकिन हर करवट खाली लगती थी। वह तकिये को करन समझकर गले लगाती है, लेकिन तकिया तो तकिया होता है—न उसमें गर्माहट थी, न वह धड़कन।)
सिमरन (आँसू पोंछते हुए, खुद से) बोली -
मैंने खुद से कहा था कि मैं पत्थर बन गई हूँ।
लेकिन पत्थर को भी रात में ठंड लगती है...
और मुझे... मुझे उसकी गर्माहट चाहिए।
(वह उठकर खिड़की के पास जाती है। बाहर चाँदनी फैली है। वह आसमान को देखती है, जैसे करन को ढूंढ रही हो।)
सिमरन (मन ही मन) सोचती है -
*करन जी... आप कहाँ हैं?*
*क्या आप भी रात को जागते हैं?*
*क्या आपको भी मेरी याद आती है?*
*या आप मुझे भूल गए?*
(उसका गला भर आता है। वह वापस बिस्तर पर आती है, लेकिन इस बार वह रोती नहीं। वह बस लेटी रहती है, आँखें खुली, छत को देखती हुई।)
(तभी, उसे अपने पेट में हल्की सी हरकत महसूस होती है। पहली बार। बच्चा हिल रहा था। सिमरन का हाथ अपने आप पेट पर चला जाता है।)
सिमरन (मुस्कुराते हुए, लेकिन आँखों में आंसू) बोली -
तुम जाग रहे हो, छोटे से?
तुम्हें भी नींद नहीं आ रही?
शायद... शायद तुम्हें भी अपने पापा की याद आ रही है।
(वह धीरे-धीरे एक लोरी गुनगुनाने लगती है—वही लोरी जो करन उसे सुनाया करता था। उसकी आवाज़ कांप रही थी, लेकिन वह गाती रही।)
सिमरन (गाते हुए) बोली -
*चंदा रे... चंदा रे... तू आए...*
*मेरे लाल को नींद सुलाए...*
(उसकी आवाज़ धीरे-धीरे फुसफुसाहट में बदल जाती है। वह थकान से आँखें बंद कर लेती है, लेकिन नींद अभी भी दूर थी।)
(तभी, उसे एक अजीब सा एहसास होता है—जैसे कोई उसे देख रहा हो। वह चौंककर उठती है, चारों तरफ देखती है। कमरा खाली था। लेकिन वह महसूस कर रही थी कि कोई है।)
सिमरन (डरते हुए, लेकिन हिम्मत से) बोली -
कौन है? करन जी... क्या आप आए?
(कोई जवाब नहीं। बस खिड़की से आती हवा की सरसराहट। लेकिन सिमरन को यकीन था—कोई था। शायद करन की आत्मा, शायद उसका प्यार, जो उसे ढूंढता फिर रहा था।)
(वह वापस लेट जाती है, लेकिन इस बार उसे थोड़ी शांति महसूस होती है। वह अपने पेट पर हाथ रखती है और आँखें बंद कर लेती है।)
सिमरन (फुसफुसाते हुए) बोली -
चाहे आप आएँ या न आएँ, करन जी...
मैं आपका इंतज़ार करूँगी।
हर रात... हर सांस... हर धड़कन में।
क्योंकि आप मेरी आदत नहीं... मेरी ज़रूरत हैं।
(बाहर चाँदनी फैली थी। लेकिन हवेली के अंदर, एक औरत अपने पत्थर से दिल के पीछे छिपे उस प्यार को संजोए हुए थी, जो कभी मरने वाला नहीं था।)
"सिमरन ने दुनिया को दिखा दिया था कि वह मजबूत है।
लेकिन रातें... रातें गवाह थीं कि वह कितनी टूटी हुई थी।
और कहीं दूर, शायद करन भी उसी चाँदनी को देख रहा था,
उसी याद में खोया हुआ।"