हल्की धूप कमरे में फैल रही है। बाहर से नल का पानी गिरने की आवाज़ आ रही है। करन नहा रहा है, गुनगुना पानी उसके बालों से बहता है। उसके गले में वही सिमरन का दिया हुआ लकेट चमक रहा है।)
(अचानक — लकेट उसकी गर्दन से फिसलकर ज़मीन पर गिर जाता है। एक पल के लिए करन की सांस थम जाती है।)
करन (घबराकर) बोला -
ओह नहीं... ये गिर गया... मेरी परी ने कहा था इसे कभी मत उतारना...
(वो जल्दी से उठाता है, लेकिन उसके छूते ही लकेट की चमक बुझ जाती है। उसके चेहरे पर अजीब बेचैनी दिखती है।)
(सिमरन कमरे में खड़ी है। जैसे ही करन आता है, वो उसे देखती है — उसके चेहरे पर डर और चिंता दोनों हैं।)
सिमरन (तेज़ आवाज़ में) बोली -
करन! आपसे कहा था ना, ये लकेट कभी मत उतारना! आपको पता है, ये आपको संभाले रखता है!
करन(नीचे देखते हुए, सिसकते हुए) बोला -
मैं... मैंने जानबूझकर नहीं गिराया परी... सच में...
(वो पलंग पर जाकर बैठ जाता है, आंखों में आंसू भर आते हैं। जैसे कोई बच्चा डांट खाने के बाद चुपचाप रोता है। कुछ देर में वो धीरे-धीरे वहीं बैठा सो जाता है।)
(रात का समय। सन्नाटा। सिमरन टेबल के सामने खड़ी है। उसके हाथ में फोन है, शायद किसी को मैसेज कर रही है।)
(कमरे की लाइट हल्की-हल्की झिलमिला रही है।)
(अचानक — किसी की मज़बूत बाहें उसकी कमर को कसकर पकड़ लेती हैं।)
सिमरन के हाथ से फोन गिर जाता है। उसकी सांसें रुक जाती हैं।
सिमरन (डरते हुए, धीमी आवाज़ में) बोली -
क... कौन...?
(धीरे-धीरे वो पीछे मुड़ती है। उसके पीछे करन खड़ा है — लेकिन ये वो करन नहीं, जिसे वो जानती थी। उसकी आंखें लाल, चेहरे पर शिकन, और होंठों पर एक डरावनी मुस्कान।)
करन (ठंडी, गहरी आवाज़ में) बोला -
क्या सोचा तुमने... रोक लोगी मेरी प्यास को, सिमरन?
नहीं रोक सकती...क्योंकि जब तुम डरती हो...तो तुम्हारा खून और भी मीठा लगने लगता है...
(सिमरन कांपती है। वो करन की पकड़ से निकलने की कोशिश करती है, पर करन और कसकर उसे थाम लेता है। उसके दांत अब नुकीले हो चुके हैं।)
सिमरन (डरते हुए, चीखती है) -
करन! ये आप नहीं हो! होश में आओ!
करन(हँसते हुए, आँखें चमकाते हुए) बोला -
होश? अब वो करन नहीं बचा ना वो मासूम करण...ना तुम्हारा रक्षक पति करण... अब सिर्फ प्यास बची है...
(वो झुककर उसकी गर्दन के पास आता है। सिमरन की आंखों से आंसू गिरते हैं। तभी — वो पूरी ताकत लगाकर खुद को छुड़ाती है और कमरे से बाहर भागती है।)
(वो दूसरे कमरे में जाकर दरवाजा बंद कर लेती है। बाहर से करन के पैरों की आहट और उसकी आवाज़ गूंजती है।)
करन (दरवाज़े के बाहर से, गहरी आवाज़ में) बोला -
दरवाज़ा खोलो सिमरन... तुम जानती हो मैं अंदर आ सकता हूँ...
तुम्हारा डर ही मुझे ताकत देता है...
(सिमरन कोने में सिमटकर बैठ जाती है। उसके हाथ कांप रहे हैं, आंखों से आंसू बह रहे हैं।)
सिमरन(धीरे से फुसफुसाती है) -
हे भगवान... अब मैं क्या करूँ... मेरे करन... मेरे मासूम करन... कहाँ खो गए...
(कमरे के अंदर सिमरन कोने में बैठी है। उसकी सांसें तेज़ हैं, आंखें डरी हुईं। बाहर से करन की भारी आवाज़ आ रही है। हवा का शोर और करन की परछाई दरवाज़े पर पड़ रही है।)
करन (बाहर से) बोला -
सिमरन...दरवाज़ा खोलो...तुम जानती हो मैं अंदर आ सकता हूँ...
(वो धीरे-धीरे दरवाज़े को खटखटाने लगता है, फिर ठोकर मारता है। दरवाज़ा हल्का-सा हिलने लगता है।बसिमरन घबरा जाती है।)
सिमरन (रोते हुए) बोली -
नहीं करन...आप ऐसा मत करो... ये आप नहीं हो...
करन (गर्जन भरी आवाज़ में) बोला -
अब मैं “वो करन” नहीं हूँ, सिमरन... अब सिर्फ अंधेरा हूँ...
और इस अंधेरे को रोशनी से नफरत है...
(वो दरवाज़े पर ज़ोरदार धक्का मारता है। दरवाज़ा टूटकर खुल जाता है। सिमरन चीखती है। करन कमरे में आता है — उसकी आंखें लाल, सांसें भारी, और चेहरा दानवीय।)
(सिमरन पीछे हटती है, हाथ में दिया उठाकर सामने करती है।)
सिमरन (दृढ़ आवाज़ में) बोली -
रुको करन! अगर आप सच में मुझसे प्यार करते हो... तो एक कदम और मत बढ़ाओ!
(करन रुकता नहीं। वो आगे बढ़ता है। सिमरन की आंखों से आंसू गिरते हैं, पर वो हिम्मत नहीं छोड़ती।)
करन बोला -
प्यार...?
प्यार ही तो मुझे यहां तक लाया है, सिमरन...तुम्हारे लिए मेरा प्यार अब प्यास बन चुका है...
(वो उसके बहुत पास आता है, उसकी सांसें सिमरन के चेहरे से टकराती हैं।)
सिमरन (कंपकंपाती आवाज़ में) बोली -
ये प्यास नहीं...ये श्राप है करन!
जिस दिन आपने अपनी इंसानियत खोई थी, उसी दिन ये सब शुरू हुआ था!
(करन चीखता है, अपने कानों को पकड़ता है जैसे कोई अंदर से जल रहा हो।)
करन बोला -
बस्स्स्स्स!
मुझे याद मत दिलाओ वो रात... वो लहू... वो दर्द!
(उसकी आंखों से खून जैसा लाल आँसू गिरता है। वो दीवार पर हाथ मारता है, दीवार टूट जाती है। सिमरन डरकर पीछे हटती है, लेकिन तुरंत अपनी हिम्मत जोड़ती है।)
सिमरन (रोते हुए पर मजबूत आवाज़ में) बोली -
अगर आपको सच में मुझसे प्यार था...तो मुझपर वार नहीं करोगे!
(करन झुककर उसके गले के पास आता है, पर तभी सिमरन का दिया हुआ लकेट ज़मीन पर चमक उठता है। वो लोकेट का एक टुकड़ा था जो सिमरन ने बचा के रखा था। उसकी रोशनी करन के चेहरे पर पड़ती है। करन रुक जाता है, उसकी आंखें धीरे-धीरे सामान्य होने लगती हैं।)
(करन घुटनों पर गिर जाता है, जैसे भीतर दो आत्माएँ लड़ रही हों — एक इंसान, एक राक्षस।)
करन (रोते हुए) बोला -
परी... मुझे... बचा लो...मुझे फिर से वही बना दो...मुझे माफ़ कर दो...
(सिमरन उसके पास जाती है, लकेट उठाकर उसके गले में पहनाती है। लकेट की चमक पूरे कमरे में फैल जाती है। हवा शांत हो जाती है।)
सिमरन (धीरे से) बोली -
आप वापस आओगे करन...क्योंकि मैं अब डर नहीं रही...और जब डर नहीं रहेगा, तो तुम्हारी प्यास भी नहीं रहेगी...
(करन की आंखें अब पूरी तरह सामान्य हो जाती हैं। वो धीरे-धीरे सिमरन के सीने पर सिर रखता है। सिमरन उसे गले लगाती है और दोनों की आंखों से आंसू गिरते हैं।)
“कभी-कभी किसी को बचाने के लिए डर से नहीं, प्यार से लड़ना पड़ता है...
और प्यार, जब सच्चा हो — तो वो सबसे गहरे अंधेरे को भी रोशनी में बदल देता है।”
(कमरे में मोमबत्तियों की मद्धम रौशनी है। बाहर तूफ़ान चल रहा है।
सिमरन खिड़की के पास खड़ी है, आंखों में डर और लाचारी।
करन कमरे के बीचोंबीच खड़ा है — उसकी आंखें फिर से लाल हो चुकी हैं। उसके सीने पर जादुई लकेट अब नहीं है… जैसे किसी ने उसे हवा में गायब कर दिया हो।)
सिमरन (काँपती आवाज़ में) बोली -
करन… वो लकेट कहाँ गया?
कृपया होश में आओ… देखो, ये आप नहीं हो…
करन (भारी आवाज़ में) बोला -
अब कोई करन नहीं है…अब सिर्फ़ “प्यास” है… और ये प्यास तुमसे जुड़ी है, सिमरन…
(वो धीरे-धीरे सिमरन की ओर बढ़ता है। हर कदम के साथ उसकी सांसें भारी होती जाती हैं। सिमरन एक-एक कदम पीछे हटती है।)
सिमरन (आँखों में आँसू लेकर) बोली -
कृपया, मुझसे दूर रहो करन…मैं जानती हूँ आप अंदर कहीं ज़िंदा हो…
करन (गर्जना भरे स्वर में) बोला -
वो “अंदर का करन” मर चुका है, सिमरन…
अब बस उसकी रूह बाकी है — जो तुम्हारे खून से जीना चाहती है!
(वो अचानक दीवार की ओर बढ़ती सिमरन को घेर लेता है। सिमरन की पीठ ठंडी दीवार से लग जाती है। कमरा अब सिर्फ़ उनकी साँसों और तूफ़ान की आवाज़ से भर चुका है।)
(करन उसके बहुत पास आता है। उसकी आँखें लाल लपटों की तरह चमक रही हैं। सिमरन उसे देखती है — डर से नहीं, दर्द से। वो जान चुकी थी कि ये उसका अंत हो सकता है।)
सिमरन (धीरे से, टूटे शब्दों में) बोली -
अगर ये आख़िरी पल है…तो मैं तुम्हारी बाहों में रहना चाहती हूँ…
(वो खुद को उसकी बाहों में छोड़ देती है। करन के चेहरे पर दर्द और भूख — दोनों हैं। वो उसकी गर्दन की ओर झुकता है… सिमरन की पलकों से आँसू गिरते हैं। अगले ही पल — एक तीखी चीख़ कमरे में गूंज उठती है।)
सिमरन (चीखते हुए) बोली -
आह्ह्ह… करन…!
(खून की बूंदें उसके गले से टपकती हैं, ज़मीन पर गिरती हैं।
लेकिन उसी पल — करन का शरीर झटके से पीछे हटता है।
उसकी आंखें पल भर में बदल जाती हैं। वो अपना सीना पकड़कर नीचे गिरता है — ज़मीन पर बेहोष।)
(सिमरन, दर्द में कांपते हुए भी उसके पास रेंगती है।
वो उसके चेहरे को छूती है, आँसुओं से भीगती हुई बोलती है।)
सिमरन (रोते हुए) बोली -
करन… उठो ना… देखो, मैंने माफ़ कर दिया…
मुझे दर्द नहीं है… बस आप जागो…
(लेकिन करन की पलकों के नीचे से एक आँसू गिरता है —
लाल रंग का, पर चमकता हुआ जैसे कोई जादू टूट गया हो।
सिमरन उसकी हथेली पकड़कर उसे सीने से लगा लेती है।)
सिमरन (धीरे से) बोली -
आपने मुझ पर वार नहीं किया करन... आपने खुद पर किया है…
(मोमबत्तियाँ एक-एक कर बुझने लगती हैं। तूफ़ान थम जाता है।
कमरे में सन्नाटा छा जाता है। सिमरन करन को अपनी गोद में सिर रखकर झूलती रहती है, आँखों से आँसू टपकते रहते हैं।)
“कभी-कभी प्यार ज़िंदगी नहीं बचाता…
वो बस एक वादा बनकर रह जाता है —
जो मौत के बाद भी दिल की धड़कनों में गूंजता रहता है…”