(बाहर हल्की हवा चल रही है, खिड़की से चांदनी कमरे में गिर रही है। करन बिस्तर पर बैठा है, चेहरे पर दर्द झलक रहा है।)
सिमरन: (चिंतित होकर) बोली -
क्या हुआ करन? आप ऐसे क्यों बैठे हो?
करन (मासूमियत से, धीरे बोलते हुए) —
पता नहीं... मेरी पीठ में बहुत दर्द हो रहा है, जैसे किसी ने... किसी ने वहां कुछ चुभो दिया हो...
(सिमरन डर से कांप जाती है। वो धीरे-धीरे उसके पीछे जाती है और उसकी शर्ट उतारती है।)
(सिमरन की आंखें फैल जाती हैं। पीठ पर वही निशान चमक रहा था — वही जो वैम्पायर्स ने अपने पंजों से बनाया था। पर अब वो हल्का नहीं, बल्कि चमकता हुआ था, जैसे किसी रहस्य की चेतावनी दे रहा हो।)
सिमरन: (धीरे से, खुद से बुदबुदाते हुए) बोली -
हे भगवान... ये तो वही निशान है... लेकिन ये फिर से क्यों चमक रहा है?
(वो तुरंत खुद को संभालती है ताकि करन को शक न हो।)
करन (भोलेपन से मुड़कर) बोला -
क्या हुआ परी? कुछ तो बताओ ना...
सिमरन (मुस्कुराने की कोशिश करते हुए) बोली -
कुछ नहीं, बस छोटी सी चोट है... आप आराम से लेट जाओ, मैं दवा लगा दूंगी।
करन बोला -
ठीक है...
(धीरे से लेटते हुए) बोला -
पर तुम पास रहना... मुझे नींद तभी आती है जब तुम पास होती हो।
(सिमरन उसके सिर पर हाथ फेरती है। करन करवट लेकर उसकी ओर मुंह कर लेट जाता है। सिमरन उसे सुलाने की कोशिश करती है, पर उसकी आंखों में डर झलकता है।)
(घड़ी में रात के 2 बजे हैं। कमरा हल्की नीली रोशनी से भर गया है। अचानक करन की सांसें तेज़ होने लगती हैं। उसका शरीर हल्का कांपने लगता है।)
सिमरन (हिलाकर) बोली -
करन... करन... क्या हुआ आपको?
(अचानक उसकी पीठ से हल्की-हल्की लाल रोशनी निकलने लगती है। सिमरन पीछे हटती है। करन का चेहरा धीरे-धीरे बदलने लगता है। उसकी आंखें लाल हो जाती हैं।)
करन (गहरी, डरावनी आवाज़ में) बोला -
किसी ने... मुझे फिर से जगाया है...
(सिमरन भयभीत होकर दीवार से लग जाती है। उसे याद आता है — ये वही लहजा है जो "पुराने करन" का था — वो जो वैम्पायर बन गया था।)
सिमरन (धीरे से, कांपते हुए) बोली -
करन... आप... आप फिर से... वही बन गए हो?
करन (थोड़ी देर चुप रहकर, आंखें बंद करता है) -
मुझे नहीं पता... लेकिन कोई ताकत मुझे रोक नहीं रही अब...
(सिमरन डरते हुए आगे बढ़ती है, उसका हाथ थामती है।)
सिमरन बोली -
आपको कुछ नहीं होगा... मैं हूं ना... आपकी परी...
(करन उसकी आंखों में देखता है। कुछ देर के लिए उसकी लाल आंखें फिर से सामान्य हो जाती हैं।)
करन (थके हुए स्वर में) बोला -
परी... मैं थक गया हूं... मुझे बचा लो...
(सिमरन उसे अपने सीने से लगाकर पकड़ लेती है।)
सिमरन (धीरे से) बोली -
कुछ नहीं होगा मेरे करन को... जब तक मैं हूं।
(कमरा शांत हो जाता है। चांदनी अब हल्की सुनहरी हो गई है। करन उसके सीने पर सिर रखकर धीरे-धीरे सो जाता है...पर पीठ पर निशान अब सुनहरे रंग में चमक रहा था।)
“कभी-कभी जो हमें सबसे ज़्यादा दर्द देता है, वही हमारी किस्मत की डोर भी होता है…”
सूरज की हल्की किरणें पर्दों से छनकर कमरे में आ रही हैं। माहौल शांत है — पर उस सन्नाटे में भी कुछ अजीब-सा डर महसूस हो रहा है।)
(सिमरन धीरे-धीरे आंखें खोलती है। उसकी सांसें थमी हुई हैं। उसे महसूस होता है कि कोई उसे बहुत कसकर पकड़े हुए है।)
सिमरन (धीरे से फुसफुसाते हुए) बोली -
करन... छोड़ो ना...
(वो थोड़ा-सा सरकने की कोशिश करती है, पर करन की पकड़ और भी मजबूत हो जाती है। उसकी बाहें सिमरन को इस तरह जकड़े हुए हैं जैसे कोई उसे जाने ही न देना चाहता हो।)
(सिमरन ऊपर देखती है — करन उसकी ओर घूर रहा है। उसकी आंखों में लाल चमक है, और चेहरा उस पुराने “वैंपायर करन” जैसा लग रहा है।)
सिमरन (धीरे से, कांपती आवाज़ में) बोली -
करन...आप... आप ऐसे क्यों देख रहे हो मुझे?
करन (गहरी, डरावनी आवाज़ में) बोला -
जानती हो, सिमरन... जब इंसान डरता है... तो उसके खून का स्वाद... और भी मीठा हो जाता है।
(सिमरन का चेहरा सफेद पड़ जाता है। क्योंकि ये डायलॉग करन ने उससे शादी से पहले बोला था जब वो उसका खून पीना चाहता था बस। वो खुद को छुड़ाने की कोशिश करती है, पर करन की ताकत अब इंसानी नहीं रही। उसके हाथ बर्फ जैसे ठंडे और स्टील जैसे मज़बूत हैं।)
सिमरन (डरी हुई, आंखों में आंसू लेकर) बोली -
करन... ये आप नहीं हो... आप मेरे करन हो... मेरी प्यारी मासूमियत वाले करन...
(करन उसके चेहरे के बहुत करीब आता है। उसकी सांसें अब ठंडी हवा की तरह सिमरन के गालों को छू रही हैं।)
करन: (धीरे से, अजीब मुस्कान के साथ) बोला -
शायद... वही करन अब नहीं रहा, सिमरन...
(वो उसकी गर्दन के पास झुकने लगता है। सिमरन डर से आंखें बंद कर लेती है। अचानक — वो लकेट, जो पिछली रात सिमरन ने करन को दिया था, उसकी छाती पर चमकने लगता है।)
(करन का चेहरा अचानक रुक जाता है। उसकी आंखों में दर्द झलकता है। वो पीछे हटता है और अपने सिर को पकड़ लेता है।)
करन (चिल्लाते हुए) बीबीबोला में
आह्ह्ह... ये क्या हो रहा है मुझमें... ये आग क्यों जल रही है अंदर...
सिमरन (जल्दी से लकेट पकड़ते हुए) बोली -
ये वही लकेट है करन! मैंने कहा था ना — ये आपकी रक्षा करेगा! इसे मत उतारो... चाहे कुछ भी हो जाए!
(करन ज़मीन पर गिर जाता है। उसकी आंखें धीरे-धीरे सामान्य होने लगती हैं। उसके चेहरे पर वही मासूमियत लौट आती है।)
करन (थकी, कमजोर आवाज़ में) बोला -
प...परी... मैंने... फिर कुछ गलत किया क्या?
सिमरन(आंखों में आंसू लेकर, उसे सीने से लगाते हुए) बोली -
नहीं करन... कुछ नहीं... आपने कुछ नहीं किया... बस आराम करो...
(वो उसे प्यार से सुलाती है, लेकिन उसकी आंखों में डर अब भी बाकी है। वो जान चुकी थी कि करन के अंदर दो रूप हैं —एक जो उसे दुनिया से ज्यादा प्यार करता है...और दूसरा... जो उसी की जान का प्यासा है।)
“कभी-कभी प्यार और खतरा एक ही जिस्म में बस जाते हैं... फर्क बस इतना होता है कि कौन पहले जाग जाए।”