DASTAN-E-KARB - भ्रम से परे क्या है? - Chapter 5 Scene 4 Azoorey द्वारा नाटक में हिंदी पीडीएफ

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DASTAN-E-KARB - भ्रम से परे क्या है? - Chapter 5 Scene 4

"अरे संभलकर, कहीं फूलों के मोह में अपने उनको याद करते हुए गिर मत जाना।"

फुलों की टोकरियां ले जाते हुए खदिमाएं रुक्मणि से रास्ते में टकराकर उसे हंसकर चिढ़ाते हुए छेड़ने लगी

"वैसे बताइए रुक्मणि दीदी... कहां हैं आपके वो, सुबह से नज़र नही आएं?" दूसरी खादिमा ने भी छेड़ते हुए पूछा

हया भी इनके पास खड़ी मंद मुस्कुराने लगी, इसी में से दूसरी ख़ादिमा ने पहली का जवाब दिया

"क्या तुम्हें ख़बर नहीं, इनके वो तो गांव के चक्कर लगाने के लिए चले गए हैं।" उसके बाद सब ठिठोलिया लगाने लगीं। 

इनकी बातों पर रुक्मणि ने शर्माते हुए इन्हें फटकार लगाया
"अच्छा बस, चलो अब अपने अपने काम पर जाओ या बुलाऊं मैं मैथिली को।" 

"हां हां हमलोग जा रहे है लेकिन आप ध्यान से जाइएगा - उनकी याद में लड़खड़ा कर कही गिर मत जाना।" खिलखिलाते हुए हंसकर साब भाग गई।

रुक्मणि के चेहरे को गुलाब की तरह लाल देखकर हया ने भी मौक़ा पकड़ लिया

"कम से कम मुझको तो बता दो कहां हैं वो?" वो पर ख़ास ज़ोर देते हुए उसने हंसकर कहा 

"अरे! अब आप भी?" उसने मुस्कुराते हुए कहा

"तो क्या सुबह सुबह से इसलिए गुमसुम हो?"

"नहीं लेकिन वो चले जाते हैं तो सन्नाटा लगता है। पर उन्हें तो काम के लिए जान ही पड़ता है, ये सारे काम उनकी ही ज़िम्मेदारी है इस वजह से ज़्यादा व्यस्त रहते है।" 

उसकी बातें सुनते हुए हया आगे बढ़ने लगी, रुक्मिणी ने उसकी शॉल संभालकर उसे पकड़ाते हुए कहा

"कल तो किसी ज़रूरी काम से उन्हें रात में ही जाना पड़ा, और अब पता नही कबतक लौटेंगे।"

हया ने उसे देखकर कहा "कबतक लौटेंगे क्यों सोचती हो। लौटेंगे ये सोचो। इंतज़ार के दिन मुश्किल होते हैं लेकिन बहुत अच्छे होते हैं।" कुछ पल में फ़िर उसने पूछा

"क्या शेख़ बाबा से मिल पाना अभी मुमकिन है?"

"बाबा से.....?" उसने सोचकर कहा "चलिए मेरे साथ देखते हैं।" 
हया को लेकर रुक्मणि दुबारा सहन से होकर महल आने लगी

"इन फूलों की टोकरियों के बीच से गुज़र कर ये फूल कहां जा रहा है?" मुंशीजी ने हया और रूक्मणी को देखकर मसखरे अंदाज़ में कहा। रुक्मिणी उनकी तरफ़ मूड गई

"मुंशीजी आप फ़िर आ गए।" रुक्मिणी उन्हें देखकर खीझ उठी

"अरे मैं महल के ख़ास अतिथि से मिलने आया हूं।" उन्होंने कहा और हया से मुख़ातिब हो गए

"आप महल में ठीक से तो हैं न?" उन्होंने पूछा

"और ये आप क्यों पूछ रहे है मुंशीजी?" रुक्मणि मुंह बिचका कर दोनो के बीच खड़ी हो गई

"असल में बात ये है कि इन्हें मैं ही महल में लेकर आया हूं इसलिए चिंता हो रही थी। अब मुझे इतना काम रहता है कि उस दिन के बाद से हाल चाल ले ही नहीं पाया, आज देखा तो सोचा हाल चाल ले लूं।" मुंशीजी दोनो को अपनी बातों की लज़्जत में फसाने लगे

"मैं ठीक से हूं।.. आपका शुक्रिया।" हया ने नर्मी से कहा

"बस आप सबलोग ठीक से रहें यही चिंता रहती है मुझे, वरना मेरा क्या मै तो मुंशी आदमी दरबार लेख और काम कारोबार में फंसा रह जाऊं।" वो जानकार बातों की लज़्जत को और बढ़ाने लगे "ख़ैर अगर कोई भी चिंता हो तो मुझसे आप आराम से कह सकतीं हैं। मै आपको हर जगह मिल जाऊंगा।"

"हां मुंशीजी ये तो सबको पता है।" रुक्मिणी ने मज़ाकाना तंज़ किया और दबे मुंह हंस दी

"तुम सारी कन्याएं बहुत शरारती हो।" उन्होंने रुक्मिणी से कहा 

"जी मुंशीजी, सही कहा आपने।" लफ़्ज़ों पर ज़ोर देते हुए रुक्मणि उन्हें तंग कर के हंसकर आगे बढ़ गई

"अच्छा बेगम साहब तक मेरी याचना पहुंचा देना की आली जान को जल्दी से भेज दें।" 

"ठीक है कह देंगे।" रुक्मणि आगे बढ़ते हुए जवाब देकर चली गई
"खांमखां मुंशीजी वक़्त बर्बाद करते है, उनकी बातों पर ध्यान मत दिया करिए। जो एक बार उनकी बातों की लज़्जत में पड़ गया न फिर बाहर निकलने का रास्ता नहीं मिलता।"

"हम्मम, बातें तो मज़े की रहती है उनकी।" हया ने कहा और दोनों शेख़ बाबा के कमरे की तरफ़ जाने लगे। 

पास पहुंचकर रुक्मिणी ने शेख़ बाबा को उनके कमरे से बाहर निकलता देखा और अपने क़दम तेज़ कर लिए

"लगता है बाबा कहीं जाने की तैयारी में हैं।" 

"अरे इस क़दर जल्दबाजज़ी में कहां जा रही हो?" उसे तेज़ी से अपनी तरफ़ आता देखकर बाबा ने कहा

"हया आपसे मिलना चाहतीं हैं।" रुक्मिणी ने बताया

शेख़ बाबा ने हया को देखकर कहा "ठीक है। आईए।" 
और कमरे में वापस चले गए, हया उनके पीछे गई, और रुक्मिणी दरवाज़े के पास खड़ी हो गई। 

हया के अंदर पहुंचते बाबा ने उसकी तरफ़ रुख़ करके पूछा "सब ख़ैरियत?"

उसने बिना देर किए कहा "मैं आपसे इजाज़त लेना चाहती हूं।"

"इजाज़त!...किस बात की?" 

"असल में मेरे दिल पर भारी बोझ है।...
मुझे लगता है मुझे आली ख़ास से मिलकर माफ़ी तलब करना चाहिए। अगर मुझे इजाज़त हो।"

"आप ग़लत समझ रही हैं। उन्हें आपसे कोई शिकायत नहीं है।" 

"उसके बाद भी मैं उनसे मिलकर उनसे माफ़ी मांगने की रवादार हूं। कम से कम मुझे ये करना चाहिए।"

"इसपर कोई पाबंदी नहीं, अपने दिल की तसल्ली के लिए आप किसी भी वक़्त उनसे मिल सकती हैं।" उन्होंने हया को देखकर कहा "आपके ऊपर महल की कोई पाबंदियां नहीं हैं और अगर आप ख़ुद को गुनाहगार मानकर पाबंद हो रहीं है तो इसकी ज़रूरत नहीं है। आप महल में लाईं गईं है ताकि आप महफूज़ रहें।....
आपको जब उसने मिलना हो आप मिल सकतीं हैं मैं केसरी को आगाह कर दूंगा।"

"जी।"..... मुस्कुरा कर उसने कहा और इजाज़त लेकर चली गई। हया के साथ आगे बढ़कर रुक्मिणी ने ठहर कर , अपने सर पर हाथ मारकर कहा

"अरे....मुझे तो पैग़ाम पहुंचना था! आप सहन तक पहुंचिए मैं आती हूं।" उसने हया से कहा

"हम्मम।" हया सहन की तरफ़ चली गई और रुक्मिणी ऐवान ए सद्र आ गई। उसने दरवाज़ा खटखटाकर आवाज़ लगाया

"अम्मा साहब मुंशीजी ने आली जान को जल्दी बुलवाया है।" 

"क्या वो अभी तक गए नहीं?" अम्मा साहब ने सुरूर से कहा

"मैं देखती हूं।" सुरूर कमरे से बाहर आ गई और उसने रुक्मिणी से कहा "उनसे कह दो आली जान आ रहें हैं।" 

"ठीक है।" सुरूर ज़य्यान की तरफ़ चली गई और रुक्मिणी भी सहन की तरफ़। सहन में हया उसके इंतज़ार में थी ओर उसके आते ही दोनों साथ में आगे बढ़ गए।

मीरास महल की ज़मीन पर, ठंड के मौसम में धूप की हल्की तपिश के तले, मिट्टी में पड़ी ओस की बूंदों की ख़ुशबू के एहसास में खोकर चलते चलते दोनो मिलकर मैदान पार करके लाइब्रेरी की तरफ़ बढ़ने लगीं।

हया को इत्मीनान हो गया था की ये महल बाक़ी महल से जुदा है, उसे किसी भी बात की कोई रोक टोक नही है। वो सोच रही थी कि उसने मीरास महल को जैसा सोचा था वैसा नही पाया। वो ये समझने की कोशिश कर रही थी की क्या ये सबकुछ बनावटी दिखावा है, भ्रम है या हक़ीक़त है। 

तो फिर किसे समझने में चूक हो गई? वो वजह ढूंढने की कोशिश करने लगी की किस वजह से उसका भाई ऐसे हालात में पहुंच गया कि उसे इस सज़ा का सामना करना पड़ गया। उसे इस बात की जुस्तुजू लगातार हो रही थी की आख़िर कैसे उसका भाई ऊस ग़लती की सज़ा काट रहा है जो उसने कभी नहीं सोचा। आख़िर इन सब के पीछे अस्ल में है कौन?