SCENE 2.
"........ तुम बाग़ीचे में उसके साथ क्या कर रही थी?.....
.......क्या तुमने जानबूझ के ऐसा किया......" उसे वजदान की आवाज़ सुनाई दी उसके बाद बाबाजान और अम्मीजान की
".........मैं उन्हें समझाती रही की बेटी को इतना शेर न करें, उनके जाते ही उनकी तरबियतों को भूल गई है ये......."
"........मेरी बेटी शेरनी है, इसे किसका खौफ़......
.......जब मैं कहता हूं बेगम तो आप मुझे टोकती है अब यही बात आप कह रही है.....
........मैं तो हक़ीक़त को क़ुबूल कर रही हूं....."
"बाबाजान आपने और अम्मीजान ने मिलकर हमें हिम्मती और मज़बूत बनाया था ना....अम्मीजान ऐसी तो नहीं थीं, अब उन्हें क्या हो गया है? वो क्यों कर रही हैं ऐसा।" पुरानी बातों को याद करके उसने सोचा
"क्या भाईजान की बात के आगे मेरी बातों की कोई अहमियत नहीं है? भाईजान ये क्या कर रहे है बाबाजान? आप तो जानते हैना...मेरी हक़ीक़त, हम कौन है...हमने तो आपकी और अम्मीजान की तरबियत पर ही अमल किया, कभी अपनी नजरों को ऊंचा नहीं किया, फिर ये लोग, मेरे अपने लोग इतनी आसानी से हमें ऐसे इल्ज़ाम दे रहे, कैसे? बबाजान क्या हमने ग़लत किया उसके साथ? ये ग़लत कैसे हुआ, आपने ही तो हमें सिखाया है ग़लत को ग़लत कहना। उसकी ज़्यादतियां कैसे सहते हम, हमने तो बस उसका जवाब दिया था, अम्मी ने तो मेरी बात सुनने से भी इंकार कर दिया, क्या हम इतने बुरे हो गए अब इनकी नजर में? भाईजान ने ये क्या कर दिया?" अपनी यादों की मुद्रा से निकलर उसने सोचा उन बातों को जिसे समझने में वो उलझ रही थी।
अपने कमरे में बिस्तर पर बैठे, सर को अपने सिमटे हुए घुटने पर रखे हवेली के रिश्तों के बदलते चेहरों के बारे में सोचते हुए अम्हेल की आंखों से आंसू छलक गए और इस वक़्त वो ख़ुद को बिल्कुल तन्हा समझने लगी, उसे वो सारे पुराने दिन वहम की तरह लगने लगे, मगर क़ुदरत ने मिबसाम को भेजकर ये उसे ये बता दिया कि इस दुनिया में कभी कोई अकेला नहीं होता, मिबसाम को देखते ही वो खड़े होकर खिड़की की तरफ़ बढ़कर मन में चल रही कुछ उलझी बातों को उसके सामने खोलने लगी
"हम ये कभी नहीं कर सकते साम, ये लोग जितनी चाहें कोशिशें कर लें उससे हम कभी शादी नही करेंगे जिसे किसी का कोई लिहाज़ नही, और हमने ऐसा कुछ नहीं किया जिसकी वजह से हमें खौफ़ज़दा होना पड़े और उसके आगे झुकना पड़े। ये लोग बस किसी भी तरह हमें हवेली से बाहर कर देना चाहते है तो बेशक कर दें, मगर हम इस तरह हरगिज़ नहीं झुकेंगे।"
"मेरी बहन आख़िर परेशानी क्या है, मुझे मालूम है कोई वजह ज़रूर है, मगर क्या तुम मुझे भी इसमें शामिल नहीं कर सकती, मैं इन्हें समझाऊंगा, तुम्हे मालूम है ना अगर तुमने इसे छुपाकर रखा तो क्या हो सकता है, इसलिए ख़ुदा का वास्ता है कम स कम मेरे सामने तो बोलो।" साम ने अम्हेल से विनती किया।
मिबसाम के सवाल पर अम्हेल सुबह की उन बीती बातों को याद करने लगी जिसकी वजह से वो ज़िद पर ठहर गई थी
"........ अपने हाथों को मुझसे दूर करो, हम कह रहे है दूर हो जाओ। तुम्हारी ये कमज़र्फी है, और तुम कहते हो बे लोस हवेली का हिस्सा बनोगे, दामाद बनोगे। मेरे बबाजान की हवेली में कमज़र्फो के लिए कोई जगह नही.....
......... ये शादी होकर रहेगी........
.......बेहतर होगा जल्द से जल्द तुम ख़ूद इस ख़ूशफहमी से बाहर आ जाओ....."
"बोलो अम्हेल।" मिबसाम ने फिर पूछा
"अम्मी जान को बता चुके हैं हम, मगर वो कहती हैं तुम झूठी तुम्हारी बातें भी झूठी इसलिए तुम्हारी बातों पर मैं यक़ीन नहीं कर सकती।"
उसने मिब्साम कि तरफ़ मुड़कर कहा
"तुम बताओ मिबसाम क्या हमने कोई ऐसा काम किया या कुछ भी ऐसा किया है जिसकी वजह से ये दोनों लोग इस क़दर रूसवा है हमसे। मेरे ऊपर इल्ज़ामो की बारिश कर दी, हमने कुछ नहीं बोला कि ये मेरे लोग है कुछ दिन में समझ जाएंगे, भाई जान क्यों ऐसा कर रहे हैं मेरे साथ? क्यों चाहते हैं वो इस क़दर हमें हवेली से बेदखल करवाना, बेशक हमें कर दें बेदखल हम नहीं करेंगे कोई शिकायत, मगर हम हरगिज़ नवाब के लिए हां नहीं करेंगे।"
उसके लहजे में शिकायत साफ थी। उसने 2 पल की खामोशी के बाद कहा "हैरत हमें इस बात की है कि वो लोग समझना ही नहीं चाह रहे, क्या इतना काफ़ी नहीं है हम इस बात से इंकार कर रहे हैं जो इन लोगों को वजह, सबूत, गवाह और ना जाने क्या-क्या चाहिए। हमने जो कुछ भी कहा सबके सामने कहा और बिल्कुल सच कहा है अगर सबकी आंखों पर पट्टी बंधी है तो हम क्या करें इसमें। बाबा जान होते तो कभी ये मनमानी ना चलने देते किसी की, यहां तो बस बात इतनी सी है कि जहां शक होता है वहां भरोसा हो ही नहीं सकता। अम्मीजान को तो बस भाईजान की बात का भरोसा करना है, बाक़ी लोग तो उन्हें नज़र ही नहीं आ रहे हैं, जो सोचना है सबको सोचने दो, जो करना है करने दो, हम भी वही करेंगे जो हमें करना है।"
"अच्छा ठीक है तुम कुछ नहीं बोलना चाहती तो मत बताओ मुझे मगर बाहर तो चलो, भाई जान इतने गुस्से में गए हैं पता नहीं क्या बात करें अम्मीजान से, हम लोग सुनेंगे तभी ना उस पर बात कर सकेंगे, चलो मेरे साथ तुम।" मिबसाम उसे समझाते हुए कमरे से बाहर जाने लगा
"तो कब से ना जाने क्या-क्या सोच ही रहे हैं, कुछ और भी सोच लेंगे तो क्या ही हो जाएगा।" अम्हेल अपने मन में सोचते हुए मिबसाम के साथ चली गई।