दोपहर ढलने लगी, बादल घिरे हुए थे, हवाएं ठंडी और तेज़ चल रही थी। मीरास महल से आए हुए सामान बाक़ी सामानों के साथ मिसकिनो में बट चुके। जाने वाले चले गए और ठहरे हुए लोगों के लिए दस्तरख्वान लगा दिया गया। पीर बाबा के हुक़्म से महल के लोगों के लिए ठहरने का इंतज़ाम मेहमान ख़ाने में हुआ, अम्मा साहब, कुसुम, वायला, बिलाल और बिलाल के दोस्त हारून जो अभी अभी ही दरगाह आया है पीर बाबा और अम्हेल के साथ आराम के लिए मेहमान ख़ाने पहुंच गए।
मेहमान ख़ाने में उनके आराम के लिए ख़ासा इंतेज़ाम था, चाय पानी का एहतमाम भी किया गया और फ़िर उनके लिए शाही पकवान भी सजाया गया।
इस दौरान अम्हेल ने बिलाल पर बिल्कुल ध्यान नहीं दिया। सभी खाने का एहतराम करते हुए ख़ामोशी से खाना खाने में मसरूफ़ हो गए, इस सन्नाटेदार कमरे में खाना खाते खाते एकाएक अम्मा साहब की बुर्दबार आवाज़ मेहमान ख़ान में गूंज गई
"बाबा...।" उन्होंने पीर बाबा की तरफ़ निगाह करके कहा, अम्मा साहब सदर की जगह पर थीं, और पीर बाबा उनके सामने बैठे हुए थे "क्या अरसों पुराने वादें अरसों बाद भी क़ायम रहते हैं?" उन्होंने गहराई से पूछा
उनके सवाल से दाएं - बाएं बैठे लोगों का ध्यान भी उनपर हुआ, लेकिन किसी ने देर तक उनपर अपनी नज़र नही ठहराया
"इससे आपकी क्या मुराद है?" पीर बाबा ने जुस्तुजू किया
"अगर बहुत अरसे पहले किसी ने वादा किया हो किसी बात का तो क्या उसके इस दुनिया से चले जाने के बाद भी वो बरक़रार रहेगा?"
"ये वादा करने वालों पर मुनहसिर है कि उसका दिल कैसा है, उसका वादा कैसा है, और उनके दिल का मदार भी उनपर हैं। अगर सब खोखले थे तो भूल जाएंगे, मगर जो सच्चे दिल से होंगे तो ज़रूर निभाएंगे क्योंकि दिल न निभाने के लिए मानेगा ही नही।" उन्होंने बएहतराम समझाया
अम्मा साहब ख़ामोश हो गई, बाक़ी सभी ने भी उनकी बातें ध्यान से सुन लेने के बाद फिर से खाने की तरफ़ ध्यान कर लिया। खाना ख़त्म हो जाने के बाद अम्मा साहब की ख़ामोशी कुछ सोचते हुए फिर से बेअख़्तियार हो गई
"मैं एक बात कहना चाहती हूं।" पीर बाबा अम्मा साहब के आली मुक़ाम से ख़ूब अच्छी तरह वाकिफ़ थे इसलिए उन्होंने उनके एहतेराम में कोई कमी नही की
"मैं अम्हेल को मीरास महल ले जाना चाहती हूं।" उनके ऐसा कहते ही अम्हेल उन्हें बेसाख्ता हैरानी से देखने लगी
"मैं चाहती हूं हमारे कस्बे में तालीम हासिल करने का शौक़ रखने वाले आगे बढ़े और तालीम हासिल करें, और मुझे
मालूम हुआ है की अम्हेल को भी तालीम हासिल करने का शौक है, और बाबा आपको इल्म है कि महल किसी को ख़ाली दामन लौटता नही है।"
"ये आपकी ही ज़र्रानवाज़ी हैं आली मुक़ाम।" पीर बाबा ने कहा
"चूंकि अब अम्हेल भी हमारी ही आवाम का ही हिस्सा है तो हम उसे ख़ाली दामन कैसे रहने दे सकते हैं। ये आपकी बेटी है इसलिए हमने आपसे इजाज़त तलब किया है।"
"आली मुक़ाम मुझसे इजाज़त तलब करके आप मुझे महदूद वसायल मत करिए।" उन्होंने बअदब कहा, अम्हेल मग़्लूबी से उन्हें देखने लगी।
"बाबा... हम नही जा सकते।" अम्हेल ने बेसख़्ता आहिस्ता, नर्म, दबे लहजे में जाने से इंकार कर दिया।
अम्हेल के ऐसा करने पर सबसे पहले हारून ने उसे हैरत से देखो क्योंकि उसकी नज़र में कभी किसी ने इस तरह से अम्मा साहब के सामने उनकी बात का इंकार नहीं किया जैसा अम्हेल ने किया। ये बात उसके लिए ख़ासा हैरतनाक थी।
उसने फ़िर बिलाल की तरफ़ देखा, बिलाल ने एक निगाह हारून की तरफ़ किया फ़िर अम्हेल को देखकर मुस्कुरा उठा।
"बाबा हम नही जाना चाहते.. हम.....।" उसने नाज़ुक अंदाज़ में कहा।
इससे पहले कि वो और कुछ कहती, वहां बैठे लोगों पर ध्यान देकर ख़ामोश हो गई। पीर बाबा उसका इशारा समझ गए। अम्मा साहब भी उसे देखकर मुस्कुरा उठी।
"क्यों नहीं बेटा, महल में तुम्हे बेहतरीन आला तालीम मिलेगी।" उन्होंने शफ़कत अपनाया
"मगर हम यहां से नहीं जाना चाहते।"
अम्मा साहब को उसकी आवाज़ में अजीब कशमकश और डर महसूस हुआ। शायद वो उसका इशारा समझ गई और दिलासा देते हुए कहा
"तुम परेशान मत हो वहां और भी कई बच्चियां है, और तुमने कहा था ये तुम्हारी मंज़िल तक पहुंचने की एक रहगुज़र है। जब तुम इसे पीछे नही छोड़ोगी तो आगे कैसे बढ़ोगी।"
"लेकिन..." अम्हेल उनकी बातों से सोच में पड़ गई। उसे देखकर उसकी उलझन को समझते हुए पीर बाबा ने कहा
"आली मुक़ाम मैं आपकी बात से इंकार नहीं कर सकता मगर दरअसल बेगम ये नई जगहों से कुछ घबरा जाती है।" पीर बाबा ने सवाल उठाया
"इस बात से आप बेफिक्र रहिए, एक बार मसरूफ़ हो जाएगी तो ये हिचकिचाहट ख़त्म हो जाएगी।"
अम्मा साहब की बातों पर काफ़ी गहराई से कुछ सोचते हुए बाबा ने उनसे हामी भर लिया "ठीक है।"
अम्हेल ने फौरन अपनी नज़र से बाबा के इक़रार पर सवाल उठा लिया, बाबा ने उसे जवाब दिया
"बेटा अगर तुम ग़ौर-ओ-फिक्र करोगी तो समझोगी की ये बिलकुल वैसा ही है जैसा तुमने चाहा था।" उनकी बात पर अम्हेल फिक्र में पड़ गई वहीं अम्मा साहब को ये कुछ ख़ास समझ में नहीं आया।
बाबा ने आगे कहा
"तुमने हमेशा उस रास्ते की तलाश किया जो तुम्हारी तालीम मुकम्मल करने की तरफ़ बढ़े, मुझे ये बिल्कुल वैसा ही मालूम हो रहा है।"
अम्हेल सारी बातों से गहरी फ़िक्र में पहुंच गई थी। उसे
समझाकर बाबा ने उसे नौशीन को बुलाने के लिए बाहर भेज दिया, वो चुपचाप उनकी बात पर फिक्र करते हुए चली गई ये सोचते हुए की वो ऐसा क्यों चाहतीं है, क्या वाक़ई ये उसकी दुआ का नतीजा है या एक और इम्तेहान।
इधर अम्मा साहब भी परेशान थीं और अपनी उलझनों को सुलझाने की कोशिश करने लगी। उन्होंने बिलाल से कहा
"बिलाल मैं बाबा से कुछ बज़ात-ए-ख़ुद बात करना चाहतीं हूं।"
उन्हें सुनकर बिलाल हारून और वायला के साथ मेहमानखाने से चला गया। उनके जाने के बाद अम्मा साहब ने कहा
"बाबा मैने आपसे पूछा था.. मुझे बताइए कि अगर 35 साल पुराना एक वादा, किसी की इज़्ज़त के ख़्याल का वादा, जिसका असल मतलब मुझे अब समझ आया, मुझे आज उसे निभाने का मौक़ा मिला, जबकि वादा 35 साल पहले हुआ था। ऐसा क्यों बाबा?"
"आप किसी शदीद उलझन में मुब्तिला मालूम हो रही है?"
"ये बच्ची उसकी इज़्ज़त है जिसकी इज्ज़त का ख़्याल रखने का वादा मैने 35 साल पहले लिया था मगर आज इतने सालो बाद ये मेरे सामने इस हाल में है। वो मुझे क्यों मिली? क्या उसने वादा आज के दिन के लिए लिया था मुझसे?"
उन्हें सुनकर पीर बाबा भी क़ुदरत के करिश्मे पर हैरत करने लगे, उससे ज़्यादा उन्हें ये मोजिज़ात-ए-अमल लगा। उन्होंने ख़ुदा की ख़ास रियायत पर मुस्कुराकर कहा
"उसे आज के दिन का इल्म कैसे होता? ये वादा उसने नही लिया आपसे, ख़ुदा ने ये अहद करवाया था आप दोनो के दरमियान, वो तो अगला पिछला सबसे वाक़िफ है, उसे मालूम है कब, किससे क्या लेना है और क्या देना है और वो चाहता था कि आप अम्हेल की सरपरस्त बने इसलिए आपसे ये अहद सालों पहले ही ले लिया गया था।"
अम्मा साहब पीर बाबा के समझाने से कुछ इतमीनान में हो गईं, पीर बाबा ने कुछ ठहर कर सुकून की सांस लिया
"अब मुझे भी अम्हेल की तरफ़ से बिल्कुल इतमीनान हो गया, वरना मैं उसके मुस्तक़बिल के लिए काफ़ी दर्जा फिक्रमंद था।"
"अम्हेल यहां कैसे पहुंची?" एकदम से अम्मा साहब ने सवाल कर लिया, जिसपर पीर बाबा ने संभले अंदाज़ में कहा
"आपकी बाते सुनकर मुझे इस सवाल की उम्मीद थी, मगर मैं इस लिहाज़ में आपको ज़्यादा ज़ि इल्म नहीं कर सकते ये उस बच्ची का ज़ाती मसला भी है। मैं बस कुछ रौशनी ही डालने का अख़्तियार रखता हूं।"
"आप जितनी ख़बर रखते हैं मुझे बताइए ताकि मैं उसके कुछ पहलू को समझ सकूं।"
"दर असल मैं अक्सर मशरिक़ी छोटी दरगाह जाया करता था, वो भी अक्सर मुझे वहीं मिल जाती थी और अपने लोगों के लिए दुआएं करवाती थी।..... इस मौसमे गर्म कुछ महीनो तक मेरी उससे मुलाक़ात नहीं हुई तो मुझे उसकी तरफ़ से कुछ घबराहट महसूस हुई और मैंने मालूम किया तो मुझे वहां के लोगो से मालूम हुआ वो महीनो पहले हवेली से जा चुकी थी।" उन्होंने इस मोड़ पर अपना लहजा धीमा और नादिम कर लिया
"लेकिन फ़िर उसी रात मैने उसे उसके बबाजान की क़ब्र पर ग़ैर हालत में उदास पाया। मैं फ़ौरन उसके पास गया, मैने उससे कुछ पूछा तो नही पर मैं कुछ कुछ समझ गया था और उसे अपने साथ ले आया। उसके बाद से वो बिल्कुल ख़ामोश सिफत हो चुकी थी। जब मैने आहिस्ता आहिस्ता उसे समझाया, उससे बातें किया तब वो भी आहिस्ता आहिस्ता ख़ुद को ज़ाहिर करने लगी।"
"ऐसा क्या हुआ था?" वो ताज्जुब खेज़ हो चुकीं थीं
"मैं किस तरह बताऊं,... दरअसल मैं अभी भी हक़ीक़त से वाबस्ता नहीं हूं। मुझे नहीं मालूम है कि क्या हुआ था, वो मुझे इस हाल में, इस तरह क्यों मिली। न मैंने उससे कुछ पूछा न उसने कुछ बताया, उसने ताकीद किया की मैं इसका ज़िक्र कभी करूं, और किसी से न करूं।... मगर मुझे लगा कि मैं आपको बता सकता हूं और बेशक आप ही हक़ीक़त से पर्दा हटा सकतीं हैं।"
"मैं बिलाल की वजह से उसे मिली, बिलाल ने मुझे ख़त के ज़रिए बुलाया, इसलिए मैं उससे मिल सकी....अगर आज मैं न आती.....।" उन्होंने हक्का बक्का होकर कहा
"आपका आना तो लाज़मी था क्योंकि क़ुदरत जो जिसके ज़रिए करवाना चाहती है वो उसके ज़रिए ही होता है। आपके ज़रिए ही वो उसे संवारना चाहता होगा, चौबीस साल की उम्र में नजाने उसे क्या क्या देखना पड़ा।... मुझे यक़ीन है आपके ज़ेरे सरपरस्ती वो संवर जाएगी।"
ये सारी बातें मुकम्मल करके पीर बाबा का भी दिल भर आया था।
"यक़ीनन।" अम्मा साहब ने कहा और मुस्कुरा उठी
इसके बाद पीर बाबा ने बाहर आकर अम्हेल के मीरास महल जाने की ख़बर बिलाल को भी सुना दिया। बिलाल ख़ुशी से मुस्कुराने लगा। हारून उसे हैरत से देख रहा था। इस ख़बर से वायला भी ख़ुश हो गई।
फ़िर पीर बाबा आगे बढ़कर अम्हेल के साथ आती हुई नौशीन के पास आ गए और उन दोनों ने भी ये ख़बर सुन लिया, नौशीन ने एकदम से चौंककर पूछा
"क्या! क्यूं?" उसे मौजूदा हस्तियों की कोई ख़बर न थी मगर बाबा ने उसे इशारे से रोकते हुए शांत करा दिया और अम्हेल को जाने के लिए तैयार कर दिया।
"तुम बताओ बेटा?" उन्होंने अम्हेल से पूछा
"आपका फ़ैसला हमारे लिए सही होता है बाबा।" उसने जवाब दिया। पीर बाबा ने उसके सर पर मुस्कुरा कर हाथ फेर दिया।
शाम हो गई, सूरज डूबने लगा हालांकि इसकी तपिश आज महसूस नहीं हुई, बादल और काले हो गए, हवाएं ऐसी हो गई मानो जैसे आज सब उड़ा ले जाना चाहतीं हो, इधर मीरास महल की सवारी तयार हो गई, साथ हबिलालकी सवारी भी तैयार खड़ी थी।
बिलाल अम्हेल को देखकर मुस्कुराने लगा, जिसकी वजह से अम्हेल बिलाल से ख़ासा चिढ़ गई थी, वो उसे घूरकर अम्मा साहब और कुसुम के साथ बैठ गई।
अम्मा साहब ने ऐलान कर दिया की वो पहले मुश्ताक़ महल जाएंगी। बिलाल हारून से विदा लेकर सवारी पर सवार हो गया। दोनो महलों की सवारी पीर बाबा को अलविदा करते हुए राजगढ़ के लिए रवाना हो गई।
मीरास महल को जाने वाला रास्ता मुश्ताक़ महल से होकर गुज़रता है, अम्मा साहब जानती थीं कि बिलाल के महल से उन्हें अपने महल जाने में देर नहीं लगेगी इसलिए वो मुतमईंन थीं।
बिलाल का महल आने में अभी वक़्त था इसलिए अम्मा साहब अम्हेल को पढ़ने के लिए उससे बातें करने लगी
"तुमने मुझे अपने बारे में कुछ ख़ास नही बताया।" उन्होंने पूछा "तुम्हारी पहचान क्या है"
"अम्हेल आरा।"
"तुम्हारे बाबाजान ने अलविदा कब कहा?"
"बीते सर्द मौसम में।"
"साल होने को हो गए।" हैरत से अम्मा साहब ने कहा और चेहरे पर हल्की उदासी के साथ मुस्कान लाते हुए किन्ही ख्यालों में गुम होकर अम्हेल से बताने लगी
"मैं तुम्हारे बाबाजान से वाक़िफ़ थी, वो अपने बाबा के साथ हमारे गांव आए थे, वहां उनसे पहली दफ़ा मुलाक़ात हुई थी। बस वही पहली और आखरी बार आए थे।" अम्हेल को ख़ुद से आशना रु करवाने से अम्मा साहब ख़ुद को रोक नही सकी।
अम्हेल के मन के ख़रीब होने के लिए एक आह भरकर उन्होंने अपनी बात ख़त्म कर दीया और पिछले ख्यालों की दुनिया से बाहर आकर उन्होंने कहा " अहं.... ख़ैर मैंने कभी सोचा नहीं था उनकी नसब से इस तरह मिलूंगी।... बहुत अच्छा लगा मुझे।" उन्होंने डूबे लहजे में कहा
अम्हेल के चेहरे को नज़र भर देखकर उन्होंने फिर पूछा "हवेली के बारे में कुछ बताओ मुझे।" अम्मा साहब ने ये सवाल अम्हेल के लिए पूछा मगर उनका मन ये सवाल करने को कर रहा था क्योंकि वो अम्हेल के बाबाजान के बारे में और जानना चाहती थीं। ये सारी बातें सुनकर अम्हेल हैरत में पड़ गई फिर एक बनावटी मुस्कान के साथ उसने जवाब दिया
"अम्मीजान है, भाई हैं और एक छोटी बहन।"
"मुझे यक़ीन है वजाहत को सबसे ज़्यादा लगाव तुमसे ही होगा।" उनकी बात पर अम्हेल ने फौरन चौंककर पूछा
"आपको कैसे पता?"
"क्योंकि वो कहते थे मैं अपनी बेटी को अपने बाबा जैसा बनाऊंगा और तुम बिल्कुल हुबहु उनकी तरह ही हो। वो अपने बाबा से बहुत मुहब्बत करते थे।" इस बात से अम्मा साहब और अम्हेल दोनो की ही आंखें नम हो गई। उन्होंने पल भर चुप रहकर कहा
"महल में तुम्हे कोई परेशानी या बेसुकूनी नहीं होगी। तुम ये सोचकर ख़ुश रहना की तुम्हारे बाबाजान हमेशा तुम्हारे साथ है। तुम....।"
"रायगढ़ में मुश्ताक महल पहुंच गए।" रायगढ़ राजगढ़ का पड़ोसी कस्बा है और मुश्ताक महल भी मीरास महल की तरह अपने कस्बे का सरपरस्त है। जहां पहुंच जाने की ख़बर आगे खड़े खबरी ने सबको दिया।
सभी तांगे रुक गए मुश्ताक़ महल के दरवाज़े के सामने, दरवाज़ा खुलने पर तांगा धीरे धीरे चलकर अपनी मंज़िल को पहुंच गया। बिलाल ने उतरकर सबसे पहले अम्मा साहब की तरफ़ हाथ बढ़ाया और वो नीचे उतर गई, फिर कुसुम उतरी और आख़िर में अम्हेल उसे थामे बिना ख़ुद से नीचे आ गई।
बिलाल ने मुस्कुराकर सबका ख़ैरमक़दम किया और उन्हें महल के अंदर ले गया। अंदर मौजूद एक अधेड़ उम्र का आदमी और एक औरत लगभग हम उम्र शाही लिबास में अरास्ता बैठे हुए थे, वो लोग किसी दूसरे आदमी से बातें कर रहे थे। वो भी शाही मालूम हो रहा था
"लायलामी, आबाजां, देखिए ज़रा कौन आया है।" बिलाल की आवाज़ पर वो लोग पलट गए और अम्मा साहब को देखकर बेहद ख़ुशी ज़ाहिर किया
"आरज़ू!" लायलामी के क़दम अम्मा साहब की तरफ़ बढ़ गए
"ख़ुशा मदीद, ख़ुशा मदीद।" आबाजां ने भी ख़ुश होते हुए उन्हें बैठने को कहा और लायलामी से कहने लगे "बेगम, ज़माने बाद हमारे महल की रौनक बढ़ाने आईं हैं बहु बेगम, इनका ख़ैर मक़दम बेहतरीन अंदाज़ में कारवाईए।"
आबाजां कुछ कुछ बिलाल से मुशाबे थे, उनका लहजा भी हु बा हु वैसा ही था जैसे बिलाल बोल रहा हो।
"आप इनके साथ बैठिए, मैं इसके साथ चला जाता हूं।" उन्होंने लायलामी से कहा और दूसरे आदमी के साथ चले गए।
अम्मा साहब के पूछने पर लयलामी ने बताया कि मंत्रियों की बैठक उनकी मुंतज़िर है।
लायलामी ने अम्हेल पर ध्यान देते हुए उसके बारे में पूछा जिसपर वायला ने जवाब दिया
"ये वही हैं जिनकी कहानी भाई अक्सर सुनाया करते थे हमलोगो को।" वायला की बात पर लायलामी हंस पड़ी और अम्हेल हैरत से बिलाल को घूरने लगी। अम्मा साहब बिलाल और अम्हेल पर बार बार अपनी नज़र कर रहीं थी।
थोड़ी ही देर में ख़ादिमाओ ने मेहमान नवाज़ी शुरू कर दिया। कई महीनो बाद लायलामी और अम्मा साहब इस मुलाक़ात से बेहद ख़ुश और पुरसुकून लगी जिसकी वजह बिलाल बना।
काफ़ी वक़्त बाद इनके आने से मुश्ताक़ महल खिल गया। अम्हेल पूरे वक़्त ख़ामोश रही लेकिन बीच बीच में बिलाल और वायला उसे परेशान कर रहे थे, और अम्मा साहब और लायलमी के बीच इधर उधर की बातें होती रहीं। कुछ देर बाद अम्मा साहब ने विदा लिया और लायलामी ने उन्हें दुबारा आने का वादा लेकर अलविदा कह कर विदा किया।
इन्हें सवार करवाने बिलाल ख़ुद तांगे तक गया। बिलाल और अम्हेल के दरमियान थोड़ी थोड़ी बातें होने लगी थीं....बिलाल कुछ भी बोलता तो अम्हेल उसका जवाब उसे घूरकर दबे अल्फाजों में दे देती।
बाहर हल्की हल्की बुंदिया पड़ रही थीं, सड़कों पर अंधेरा छा चुका था, तांगे के आगे लालटेन जली लटक रही थी। सब मीरास महल जाने के लिए तांगे में सवार हो गए, उन हल्की हल्की बूंदों के दरमियान में से तांगा मीरास महल पहुंचने के लिए रवाना हो गया और बिलाल ने अंधेरे में खड़े होकर अपना हाथ दिखाकर उन्हें देखकर मुस्कुराते हुए अलविदा कर दिया।