DASTAN-E-KARB - भ्रम से परे क्या है? - Chapter 2 Scene 1 Azoorey द्वारा नाटक में हिंदी पीडीएफ

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DASTAN-E-KARB - भ्रम से परे क्या है? - Chapter 2 Scene 1

SCENE 1.

"मूंशीजी, आपको और शेख़ बाबा को मैंने एक बहुत अहम काम सौंपा था, क्या हुआ उसका?" अम्मा साहब की आवाज़ कमरे में गूंज उठी। उन्होंने अपने कमरे ऐवान-ए-सद्र में बैठे चाय पीते हुए मुंशीजी से कड़े, रोबीले अंदाज में आजकल मीरास महल में हो रही सबसे अहम बात का आगाज़ किया। 

ऐवान-ए-सद्र मीरास महल का शाही कमरा - इसमें दरवाज़े से अंदर आते ही थोड़ी दूरी पर बाएं जानिब बिस्तर लगा है जिसके बगल में एक मेज़ रखी है और उसके क़रीब बड़ा सा आइना और सिंगारदान। बिस्तर के ठीक सामने चार दीवान है जिसके बीचो बीच बड़ा सा मेज़ है, यहां मुंशीजी, शेख़ बाबा और अम्मा साहब अकसर खुफिया बैठक रखा करते है। बिस्तर और दीवान के बीच से होकर उसपार आगे की तरफ़ नहानघर है और उसके ठीक बगल में एक दरवाज़ा जो सीधा ऐवान-ए-सद्र से लगी छत पर खुलता है जहां से पीछे का मैदान साफ नज़र आता है। 

अम्मा साहब जो एक छोटे से कस्बे राजगढ़ में मीरास महल की महारानी है। बतौर मलका राजगढ़ की आवाम की सारी ज़िम्मेदारी इनके ही कांधों पर है जिसमें इनका साथ इनके पुराने और वफ़ादार वज़ीर के तौर पर शेख़ बाबा और इनके ख़ास मुंशीजी देते है। राजगढ़ के लोगों में मीरास महल के लिए बहुत इज्ज़त है और इनसे उतनी ही मुहब्बत भी है क्योंकि वो जानते है मीरास महल इस बेनाम कस्बे के लिए ही जीता है।

"आली मुक़ाम मैंने और वज़ीर साहब ने इस काम के लिए अपने लोगों को तायनात कर दिया है। जैसे ही ख़ुशखबरी मिलती है मैं आपको ख़बर कर दूंगा और बहु बेगम की तस्वीर भी आपतक पहुंच जाएगी।" मुंशीजी ने नरमी से अम्मा साहब के मन में उठे सवालों को इतमीनान देने की कोशिश किया। 

मीरास महल से जुड़े हर एक लोग जानते हैं की अम्मा साहब सबसे नरमी और मुहब्बत से पेश आती है, किसी भी तरह की बद सुलुखी के सख़्त ख़िलाफ़ हैं मगर अगर किसी से ग़लती से भी ग़लती हो जाए तो उनके ग़ुस्से से कोई बच नही सकता, इस वजह से ग़लती की कोई गुंजाइश भी नही बाक़ी रह जाती है।

"अभी तक आपलोगों की नज़र में कोई नहीं आया? इस बात को तो काफ़ी दिन हो गए है।" अम्मा साहब ने पूछा 

"आपने जबसे ये काम हमें दिया है हमलोग तभी से तायनात हो गए है, देर इस वजह से हो रही है की एक तो बीच में ज़मीनों का मसला हो गया था जिसपर मेरा सारा ध्यान एकागृत था, और दूसरा की अभी तक मीरास महल के अनुसार की कोई कन्या मिली नही।" मुंशीजी ने समझाते हुए इतमीनान दिलाया

"जमीनों का क्या हाल है अब मामला संभल गया?"

"जी सबकुछ ठीक है अब।"

"अब आप जा सकते हैं।" 

मुंशीजी अपनी धोती संभाले, पगड़ी पकड़ते हुए ऐवान-ए-सद्र से चले गए। अम्मा साहब दीवान के पीछ लगे तराशे हुए झरोखे से इक़ामतगाह की तरफ नज़र कीए काफ़ी गहराई से अहम मुद्दों के बारे में सोचने लगीं। इक़ामतगाह इस झरोखे से काफ़ी नीचे और दूरी पर था लेकिन वहां के चलते फिरते लोग अम्मा साहब की नज़र में आ रहे थे।
उनके अकेलेपन को ख़त्म करने थोड़ी ही देर में कुसुम ऐवान-ए-सद्र पहुंच गई। उसके चेहरे पर मासूमियत की शान, आंखों में नटखटपन और चाल में फुर्ती झलक रही थी। उसने दरवाज़े पर दस्तक करके आहिस्ता लहजे में बातमीज़ पूछा

"अम्मा साहब आपने याद किया मुझे?"

"कल हमें मन्नत दरगाह चलना है, तुम चलने की सारी तयारियां कर लेना।" उन्होंने हुक्म जारी किया

"मैं कर लूंगी।" उसने बाअदब कहा फ़िर कुछ पल की ख़ामोशी के बाद नर्मी से पूछा "इस बार आपके साथ दाइजां नही जाएंगी?"

"क्या तुम मेरे साथ नहीं जाना चाहती?" उन्होंने ने भी उसे देखकर नर्मी से सवाल किया

"ऐसी बात नहीं है।... हम कर लेते है सारी तायरियां।" उसने कुछ हकलाकर कहा और जल्दी से अपने कमरे की तरफ़ चली गई, कमरे में शेख़ बाबा सफ़ेद कुर्ते में बैठे हुए, चश्मा लगाए किताब पढ़ते दिखे। उनका सफ़ेद जो उनके गर्दन तक था उड़कर उनके चेहरे पर आया जिसे उन्होंने पीछे किया और साथ में अपनी सफ़ेद दाढ़ी को भी हल्के हाथों से दबाकर बिठाया ताकि वो किताब से दूर हो जाए। उनका
ध्यान मुकम्मल किताब पर ही था।

कुसुम को देखते ही चश्मा आंखों पर से हटाकर उससे पूछताछ शुरू कर दिया

"क्यों बुलाया था बहु बेगम ने?" 

"उन्होंने कहा उन्हें कल मन्नत दरगाह जाना है, हमसे तयारी करने को कहा है!"

"ठीक है, तुम सारी तयारी बख़ूबी करना कोई भी मसला हो तो मुझसे पूछ लेना।"

"जी बाबा।" हामी भरकर कुसुम कमरे से चली गई और शेख़ बाबा अपना चश्मा लगाकर दोबारा किताब पढ़ने लगे।