DASTAN-E-KARB - भ्रम से परे क्या है? - Chapter 1 Scene 4. Azoorey द्वारा नाटक में हिंदी पीडीएफ

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DASTAN-E-KARB - भ्रम से परे क्या है? - Chapter 1 Scene 4.

SCENE 4.

"........ आपकी बेटी काफ़ी बदजुबान और बेकार है, इसे अपने गढ़ का हिस्सा हम कैसे बना लें?......

........क्या मेरी हरकतें आपके बेटे की हरकत से ज़्यादा बेबाक थी?.... ये बदगुमानी किसलिए है?....... 

......... ख़ामोश हो जाओ अब तुम, अम्हेल , बहुत तमाशा लगा लिया है तुमने........

......तो क्या उसकी बदतमीज़ी हर हालत में सही थी?......"

अम्हेल तन्हा अपने कमरे में बैठे उन लम्हों को सोच रही थी जिस पर उसकी अम्मी जान ने भी यक़ीन नहीं किया। मिबसाम और माहम ने कमरे में आकर देखा कि उसने अपनी चूड़ियां तोड़कर पूरे कमरे में बिखेरा हुआ है और ख़ुद से ख़ुद की कहानी सुन रही। मिबसाम ने कमरे की हालात को देखते हुए अपनी जगह दरवाजे के क़रीब बना लीया और माहम के साथ खड़ा हो गया। आहट लगने पर अम्हेल ने मुड़कर देखा, साम खड़ा था और उसने अपनी कहानी उसे सुनाना शुरू कर दिया

"बेहतर था मेरे लिए ना मिबसाम, हम अपने बाबा जान की बात मान लेते और शाहबाद चले जाते, अपनी तालीम आगे बढ़ाते, तो हमें ये सारी बातें अपनी मां और भाई से नहीं सुननी पड़ती। क्या बाबा जान के जाने के बाद ये मेरा घर नहीं रह गया? क्या बाबा जान की इज़्ज़त का ख़्याल हम नहीं करते? कोई मेरे नाम पर बग़ीचे की दास्ताने लिखता है, कोई कहता है हम हवेली को रुसवा करना चाहते हैं। ऐसा किसके अपने सोचते हैं? क्या ये सब हमें बेदखल करने की कहानी बनाई जा रही है या शुरू से हमारे बारे में ऐसा ही सोचा जाता था? क्या बाबा जान की वजह से सब लोग ख़ामोश रहते थे या बाबा जान भी ऐसा ही सोचते थे? लेकिन साम बाबा जान ने तो कभी ऐसी बातें नहीं किया, नहीं, वो मुझे इतनी जल्दी विदा भी नही करना चाहते थे।" 

"नहीं अम्हेल, बाबा जान तो सब के बारे में अच्छा ही सोचते थे, आज हवेली में हर शख़्स को मालूम है कि वो सबसे ज़्यादा तुमसे मोहब्बत करते थे, तुम्हें इतने ऊंचे मुक़ाम पर देखना चाहते थे, सब की वजह से बाबा जान के बारे में ऐसा मत सोचो। अगर बाबा जान ऐसा सोचते तो तुम्हें कैसे अकेले कहीं भी भेजने के बारे सोच सकते थे?"

"कितना अच्छा होता ना बाबा जान होते तो सारी मुश्किल चुटकियों में हल कर देते, हम पर कोई मुसीबत ना आने देते। इस हवेली में इस इल्ज़ामों के बीच इन लोगों के साथ हम एक पल और नहीं रहना चाहते हैं। बस मन कर रहा है कहीं दूर चले जाए इन सब से दूर मगर ये मेरे बाबा जान का घर है, उन्होंने हमें एक बड़ी ज़िम्मेदारी का हिस्सा बना दिया है, हम इसे यूं ही छोड़ भी नहीं सकते।"

"दुनिया बहुत ज़ालिम है, सोचना आसान होता है की चले जाएं, सब कुछ छोड़ दे मगर जब घर नहीं रहता ना तो दरबदर होकर जीना मुश्किल हो जाता है, अज़ाब बन जाता है। मुझे अफ़सोस इस बात का है कि इन सब में मैं कुछ नहीं कर पा रहा हूं। काश मैं इस घर का सब से बड़ा होता तो मैं ये सब कभी ना होने देता।" ये सब होने की वजह के बारे में सोचते हुए मिबसाम ने अम्हेल को समझाना शुरू कर दिया कि ये सब किया धरा बड़ों का है जिसमें हम छोटे बेबस हैं।

"तुम्हारी कोई ग़लती नहीं है, शायद बाबा जान ने हमें इन्हीं मुश्किलों का सामना करने के लिए इतना हिम्मती और मज़बूत बनाया है ताकि हम हर ग़लत बातों का सामना अपनी हिम्मत से कर सके, हम ख़ुद के लिए अकेले काफ़ी है और हम ऐसा हरगिज़ नहीं चाहते कि हमारी वजह से तुम दोनों हमारा साथ देने की सज़ा काटो। तुम कुछ नहीं कर सकते हम जानते हैं, तुम कुछ करो भी मत हम यही चाहते हैं।"

अपने अंदर की सारी हिम्मत जो धीरे-धीरे बिखर गई थी अपने बाबा जान को याद करके अम्हेल ने उसे बटोरते हुए मिबसाम से कहा "तुम अभी जाओ नहीं तो बिखरे शीशे तुम्हे भी गड़ जाएंगे." साम बिना कुछ कहे माहम को इशारे से कुछ कहकर चला गया और माहम वही खड़ी रही

"हमने सब की वजह से बाबा जान से शाहबाद जाने के लिए मना कर दिया था मगर कम से कम अब हमारे ऊपर किसी बात का कोई असर नहीं होगा। अब हम वही करेंगे जो बाबा जान चाहते थे और हम जो चाहेंगे। हमें कभी कुछ ग़लत नहीं किया, हवेली के नाम का या अपने मुक़ाम का कभी फ़ायदा नहीं उठाया, हमेशा हवेली के तौर-तरीकों का मान रखा। अम्मी जान ने जो चाहा वही सीखा, वही किया अब ऐसा क्या कर दिया हमने कुछ दिनों में इतने बुरे बन गए। क्या ऐसा होता है, क्यों बेबुनियादी शक की वजह से ऐसा सुलूख़ करने पर मजबूर हो गए?" अम्हेल बिस्तर पर बिखरी चूड़ियों को साफ़ करके ये सारी बातें सोचते सोचते सो गई।