"क्या है जिंदगी हक़िक़त या छलावा या कोई भ्रम? इतनी मुद्दत की जिंदगी जिसे हम हक़िक़त समझते रहे क्या वो छलावा थी, क्या सबकुछ सिर्फ एक भ्रम था? क्या हक़िक़ि ज़िंदगी अब शुरू हुई है या मेरे क़दम किसी छलावे में फंस गए है जिसकी वजह से हम फर्क नहीं कर पा रहे है दोनों में?" अपने कमरे की खिड़की पर खड़ी वो धूप की शिद्दत की वजह से बाहर के मुरझाए फूलो को देख रही थी, वो फूल जो माली की सुबह शाम की देखभाल की वजह से इतने ख़ुबसुरत खिलते हैं।
"हमने जो किया बिलकुल सही किया, हमें कोई पछतावा नहीं है।" कुछ पल में कुछ लोगों की आहट पर एक आह भरकर गुस्से की शिद्दत और दर्द के एहसास में डूबी उसकी आवाज़ कमरे में गुंज गई
आज कई महीनो से उसके अंदर छुपे सारे दर्द और उनसे जुड़े सवालों को समेटते हुए उसने उन्हें एक मक़ाम पर ला दिया जिसके जवाब में पिछले सारे इल्ज़ाम सुनने को मिल रहे थे।
"हम ऐसा नहीं करते थे।" उसने कहा "हम कब ऐसे थे? आप लोगो ने ही हमें ऐसा होने पर मजबूर किया। इसका अंदाजा आपको भी है कि हम बेवजाह किसी के आगे झुकेंगे नहीं। फिर इन कोशिशो का क्या फ़ायदा है।" न जाने अपने छलनी मन के घाव पर किस तरह ख़ुद से मरहम लगा कर उसने मिंटो में सही कर के अपने लहजे को नर्म कर लिया।
"अम्हेल ख़ामोश हो जाओ अब, अब बिलकुल नहीं सह सकता मैं, मै बस अम्मीजान की वजह से सबकुछ ज़प्त कीये बैठा हू, वर्ना"...। सामने से उसे जवाब मिला
"भाईजान आप भी जानते है की जो इल्ज़ामात अपने हमपर लगाए है वो कितने सही है और कितने नहीं"। एक बार फिर अम्हेल अपने संभले हुए जज़बात पर से क़ाबू खोते हुए, अपने बचपन की सैर को निकल कर अपने भाइयों और बाबाजान की मोहब्बत की माला की मोती को चुनने लगी, मगर बिखरे मोती कबतक चुने जा सकते है, मोतीयों को चुनते-चुनते अम्हेल ने अपने भाईजान को रूप बदले देखा तो उसे छोटी छोटी आंखो में बहते हुए आंसुओं को ज़प्त कर के पोंछ लिया और अपने बाबाजान को याद करने लगी।
अम्हेल की बातों से, वजदान को अपने गुस्से पर जो क़बू था उसने वो भी खो दिया और अपनी आँखो को बड़ा कर के अम्हेल को घुरते हुए बुलंदी से चीखते हुए कमरे से बहार चला गया। बाबाजान के गुज़र जाने के बाद अब बेलोस हवेली की मुखिया कहने को तो अम्मीजान है मगर बड़ा बेटा होने के नाते सरपरस्त और वारिस वजदान है। इस ओहदे के बाद उसे ये बात हरगिज़ पसंद नहीं आती थी के कोई भी काम उसकी मर्ज़ी के बग़ैर हो।
बे लोस हवेली मे आज कई तरह के एहसासों के जज़्बातों की आवाज़ें गूंज रही थी। सुबह का वक़्त था, सूरज आसमान पर चढ़ चुका था और आग के मानंद गरम हवाएं चल रही थी, शिद्दत की गरमी की वजह से सड़के सुनसान, लोग अपने अपने कामों में सुबह से मसरूफ थे। इस सन्नाटे के आलम में बस एक गाड़ी, जिस्पर 4–5 लोग सवार बेलोस हवेली से निकलकर जाती हुई नज़र आई, कुछ हफ़्तो से आलीपुर में गार्मी का हाल ऐसा था कि लोग अपने घरों से निकलने में हिचकिचा रहे थे, आसमान में ज़्यादा परिंदे भी नजर नहीं आ रहे इसी के साथ बे लोस हवेली का माहौल भी कुछ ऐसा ही गरम चल रहा था मगर आज बदले माहौल के साथ अचानक ज्वालामुखी फूट पड़ा।
"अम्मीजान, अम्मीजान कहां है आप?" लाल आंखो के साथ वजदान गुस्से से बेहाल बिना किसी ख़्याल के चला जा रहा था।
"क्या हो गया भाईजान। अम्मीजान आपका ही इंतजार कर रही है मगर आप इतने गुस्से में क्यूं है "। हालात से अनजान अंदर से माहम निकलते हुए बाहर आई।
"और मैं क्या करूं? तुम जाओ अम्मीजान को बुला लाओ"। गुस्से की आग में दहकते हुए इसने माहम को भी इस घेरे में ले लिया "हद पार हो गई है अब, बात बर्दाश्त के कहीं आगे निकल चुकी है।
"ठीक है, हम बुलाकर आते हैं।" ये कहते हुए माहम मुड़कर कर चली गई।