दस्तक देती ख़ुशियां जो मीरास महल के दरवाज़े पर तयार खड़ी, फूलों के बीच से अपने स्वागत का इंतज़ार करती सबकी आंखों में बिखर रहीं थीं। उन ख़ुशियों की आमद के लिए सभी नौकर मिलकर पर मीरास महल की शान बढ़ाने के लिए अपने अपने कामों में मसरूफ़ थे, और मीरास महल के दरों दीवारों को खिलखिलाता देखने की उम्मीद में आस लगाए, दूसरी हर बात को नज़रंदाज़ किए हुए थे।
चारों तरफ़ सजावट का शोर उठ चुका था। कहीं कोई कह रहा "अरे, वो लाल फूल परदे के पास भी रहेंगे।" कही पीले फूलों की जगह तय की जा रही है, कहीं से आवाज़ आई "अरे भाई क़ालीन लाल वाली लाओ नीली नही चलेगी।"
एक तरफ़ महल का ये शोरो गुल अम्मा साहब और शेख़ बाबा के दिल को सुकून पहुंचा रहा था, तो वहीं आगे जाकर महल के पीछे शिक़े मसकन में ऐसा अंधेरा छाया था जैसे आज ही किसी की मैय्यत निकली है।
हां...निकली हैना, अनाबी के मनसूबों की, उनके बनाए मंसूबे परवान न चढ़ सके। ऐसा पहली बार नहीं हुआ था की इनका मंसूबा बेबुनियाद और बेमायने था। पहले भी कई दफ़ा अनाबी अपने मंसूबों को लेकर अम्मा साहब से मात खा चुकीं थीं।
लेकिन इस दफ़ा उन मंसूबों को किसी अजनबी के ज़रिए टूटता देख उनका पारा आसमान पर था। गुस्सा, ख़फ़गी, बेबसी, चिढ़ उनके अंदर से रह रह के बाहर आने लगे थे। इनके गुस्से ने इनकी आंखों को फाड़कर लाल कर दिया था
"कैसे.. कैसे हो गई मुझसे इतनी बड़ी बेवकूफी? वो बेवकूफ़ मैने उसे खूबसूरत मौक़ा दिया लेकिन उसने सब बर्बाद कर लिया। उसकी हिमाक़त की वजह से मेरे सारे मंसूबों पर पानी फिर गया।" उस दिन से उनके अंदर यही चल रहा था और रह रहकर सामने आ जा रहा था।
"आप उनकी वजह से क्यों ख़ुद को थका रही है? आप इन बातों को जाने दीजिए और वक़्त ज़ाया करने से बेहतर है की आप कुछ और सोच लीजिए।" रानिया ने उन्हें समझाने की कोशिश किया
"क्या कह रही हो तुम? तुम्हें अंदाज़ा भी है कि उसका डर मैने किस तरह ख़त्म किया था, किस तरह मनाया था उसे? हर रोज़ उसे समझाती थी, और हर रोज़ वो पीछे हट जाता था।" उन्होंने कुछ सोचकर कहा
"मुझे लगा था कि उसके ज़रिए से अहलम हमारे अख़्तियार में हो जाएगी तो हमारा काम आसान हो जाएगा लेकिन उसने सब ग़लत कर दिया।......
वो बेवकूफ़, क्या ज़रूरत थी उसे उसके कमरे में जाकर उससे इस तरह की बात करने की। मुझे ज़रा भी अंदाज़ा होता इस तरह का नादान है वो तो मैं उसे नही किसी और को ये काम देती।" फ़िर अनाबी ने बाहर की तरफ़ रुख़ कर के कहा "देखो, सुन रही हो तुम ये शोरो शैन, आज ये उसकी शादी की ख़ुशी में हो रहे होते मगर उसे ये मंज़ूर नहीं हुआ।"
"आप जाने दीजिए उसे, वो तो गया न? लेकिन अब मेरा क्या होगा। आप जानती हैं न हमारे मिलने पर अम्मा साहब ने पाबंदी लगा रखा है।... मैं उनसे मिल नही पाती, उनसे बातें नही कर पाती। आप कोई और रास्ता निकाल लीजिए। आप शेख़ बाबा से बात करिए या कुछ और करिए लेकिन बस मुझे उनसे अलग होने से बचा लीजिए।" रानिया ने गिड़गिड़ाकर विनती किया
"मुझे यही करना पड़ेगा।" अनाबी ने रानिया को देखकर कहा "अगर कुछ नहीं किया तो मेरा ख़्वाब ख़्वाब ही रह जाएगा।" उन्होंने सोचकर बड़े गुस्से में अपनी ख़ास ख़ादिमा को आवाज़ लगाया
"कंगना।"
"जी अनाबी।" सहमी हुई सी पतली दुबली लड़की, घबराई, कई राज़ो नियाज़ में डूबी आंखें लिए उनके सामने आ गई
"मैने ज़रूरी काम तुम्हारे हवाले किया था, कोई ख़बर है उसकी?"
"मैने उसपर नज़र रखा हुआ है पर कुछ ख़ास मालूमात नहीं हुई अभी अभी तक।"
"नज़र तेज़ कर दो।" उन्होंने उबलकर कहा
"जी।" जवाब देकर वो किनारे खड़ी हो गई, अनाबी ने उसे घूरकर कहा
"अब जाओगी या खड़े रहकर मेरे सर पर सवार रहोगी।"
उनके गुस्से से डरकर कंगना दौड़ते हुए इक़ामतगाह पहुंच गई।
यहां वो धीरे धीरे क़दम बा क़दम चलते हुए हर तरफ़ नज़र फेर रही थी। मसरूफियत, सजावटें बस यही पाया। उसने भी एक जगह फैले हुए फूलो को समेटने का काम करते हुए नज़र रखना शुरू कर दिया।
वहीं पास में कुछ लड़कियां काम के साथ हंसी ठिठोलिया करके बातें कर रही थी, उनके बातों के बीच में कुसुम ने आकर कहा
"अरे ये सजावट महल की हो रही है, तुमलोग तो ऐसे खुश हो रहे हो जैसे अभी के अभी दुल्हन बनने वाले हो।" उसकी बात पर सब हंसने लगे
"क्या पता बन ही जाएं।" उनमें से एक ने कहा। उसके बाद कुसुम अम्हेल के कमरे की तरफ़ आ गई, और चुपके से उसका पीछा करते हुए कंगना भी इक़ामतगाह आकर अम्हेल के कमरे के पास छुप गई।
"अम्हेल आपी, अम्हेल आपी कहां हैं आप? क्या अभी तक किसी ख़्वाब में हैं?" कुसुम ने कमरे के अंदर आकर फ़िर उससे तफ़रीह करना शुरू कर दिया
उसे वहां अम्हेल नही मिली, उसने छत पर जाकर देखा, वहां पहुंचते ही पीछे से उसे अम्हेल की आवाज़ आई
"अरे हम यहां है, कमरे में आओ।" गीले बालों में दुपट्टा लपेटकर वो कुसुम के सामने आ गई। उसे देखकर कुसुम ने कमरे में आकर छत का दरवाज़ा बंद करते हुए कहा
"मुझे लगा आप यहां है ही नही।"
"मैं यहां नहीं रहूंगी तो कहां जाऊंगी। तुम बताओ, तुम्हारी तबियत कैसी है?"
"मुझे क्या होगा, मैं बिलकुल ठीक हूं।"
"शेख़ बाबा ने हमे बताया था तुम्हारी तबियत ठीक नहीं।"
"अच्छा बाबा ने कहा था! वो तो यूंही परेशान हो जाते है।" उसने इठलाकर कहा
"तो फिर क्या हुआ था?" उसने पूछा
"कुछ भी नही हुआ था। देर तक सो गई थी इसलिए उन्होंने कहा होगा।"
"अच्छा बस इतनी सी बात थी।" अम्हेल बाल पोंछकर गीले दुपट्टे को छत पर डाल आई "हमें लाइब्रेरी जाना था आज, बाबा ने वहां कुछ किताबें ढूंढने को कहा है। मुझे लगा था आज अकेले ही जाना होगा।"
"अरे ऐसे कैसे? जब मैं हूं तो आप अकेले क्यों जाएंगी? मैं जाती हूं ना साथ आपके।"
"हां जाती तो तुम ही हो।"
मुस्कुराकर आइने के सामने बैठकर अम्हेल तैयार होने लगी। उसे कुसुम ने देखकर कहा
"वैसे अम्हेल आपी आप आज कुछ बदली बदली नज़र आ रहीं हैं। ऐसा लग रहा है आज सूरज की किरणों ने आपके ऊपर अलग ही असर डाला है।" कुसुम की बात पर वो उसे एकटक देखकर उसके साथ खिलखिला उठी। हंसते हुए अम्हेल ने कहा
"चलो अब लाइब्रेरी चलें।" बाल संवार लेने के बाद शॉल उठाकर ओढ़ते हुए दोनों महल के शोर शराबे से गुज़र कर मैदान पार करते हुए लाइब्रेरी की तरफ़ चले गए।