DASTAN-E-KARB - भ्रम से परे क्या है? - Chapter 5 Scene 3 Azoorey द्वारा नाटक में हिंदी पीडीएफ

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DASTAN-E-KARB - भ्रम से परे क्या है? - Chapter 5 Scene 3

"मैं अंदर आ जाऊं?" दरवाज़े की तरफ़ से आई हुई आहिस्ता सी मायूस पुकार ने अम्मा साहब का ध्यान अपनी तरफ़ किया

"आ जाइए।" अम्मा साहब ने दरवाज़े की तरफ़ नज़र करके कहा। अम्मा साहब के साथ शेख़ बाबा और अम्हेल भी मौजूद थे। उनकी नज़रें भी दरवाज़े की तरफ़ पहुंच गई 

ज़य्यान ने अपने क़दम अंदर किए, मायूसी उसकी आंखों में बसी हुई थी। अंदर आते सामने अम्हेल को देखकर वो कुछ पल के लिए ठहरा, लेकिन अगले पल ही वो अम्मा साहब की तरफ़ बढ़ गया

"आपने याद किया मुझे?" उसने अम्मा साहब के सामने आकर पूछा

"कल से आप नाजाने कहां है। मुझे आपसे कुछ बातें करना है इसलिए मैने बुलवाया आपको।" उनका जवाब आया 

ज़य्यान को देखकर अम्हेल जाने के लिए खड़ी हो गई "हमें अभी चलना चाहिए।" वो अम्मा साहब से कहकर आगे बढ़ी लेकिन ज़य्यान ने उसे रोक लिया

"मैं आपसे बात कर सकता हूं?"  

उसके ऐसा कहते ही अम्मा साहब और शेख़ बाबा का ध्यान उनपर पहुंच गया, और अम्हेल उसे देखकर ठहर गई 

"मैं अपने कल के रवैये की वजह से शर्मिन्दा हूं। कल आप ग़लत नही थीं, मैं समझने में चूक गया, इसलिए मैं पाबंद हूं कि मैं आपसे माफ़ी तलब करूं।" अम्हेल के सामने मलाल-अंगेज़ नज़रें कर उसने अपनी ग़लती का एतराफ़ किया

"हमें आपसे शिकवा नहीं है।..." अम्हेल की भी निगाहे इंकिसार उसपर पहुंची  "कल हालात कुछ ऐसे हो गए थे की कोई आगाह नही हो सका इसलिए उन्हें न समझ पाना लाज़मी था, और हम भी ग़लत पर थे, हमें भी उस तरह बर्ताव नहीं करना चाहिए था।" अम्हेल ने नर्मी से जवाब दिया, उसके चेहरे पर नर्म सी मुस्कान सजी हुई थी "लेकिन हमें पछतावा नहीं है क्योंकि हमने जो किया था वो मेरे हुक़ूक़ थे, और आपने जो किया था वो आपके हुक़ूक़ थे।" 

उसे सुनकर ज़य्यान उसे देखता रह गया, और वो उसकी मुस्कान के साथ इक़ामतगाह लौट गई। उसके जाने के बाद शेख़ बाबा ज़य्यान से मुख़ातिब हुए

"मुझे ये देखकर बेहद ख़ुशी हो रही है, आपने अपनी ग़लती ख़ुद समझा और ऐतेराफ़ भी किया। वाक़ई आपमें हुबहू मीर साहब का अक्स है।" उन्हें भी उसके समझदारी भरे क़दम पर नाज़ हो रहा था। 

उसने नर्म सी मुस्कान के साथ ख़ामोशी अख़्तियार कर लिया। उसके चेहरे की बुझी मुस्कुराहट देखकर अम्मा साहब ने जुस्तुजू किया

"क्या किसी परेशानी में हो?"

"दिल्ली से ख़त आ गया है।" उसने अम्मा साहब के सामने बैठकर रंजीदा लहजे में संजीदगी से बताया "तीन दीन बाद रवाना होना है मुझे।"

"तो क्या आपने सारी तैयारियां कर लिया है?"

"जी... मासाब।"

"क्या आप भूल रहे है की अहलम की अठारवी सालगिरह आ रही है।"

"मुझे याद है, मैं ये कैसे भूल सकता हूं।" कहते हुए वो दो पल के लिए ख़ामोश हो गया "लेकिन मैं... उसके साथ उसमें शामिल होने का हक़ नहीं रखता।"

उसका इशारा अम्मा साहब बख़ूबी समझ गईं थीं, लेकिन इस वक़्त वो ज़य्यान के मन को हल्का करना चाहती थीं इसलिए ज़य्यान की बात को नज़रंदाज़ कर देना चाहा 

"ऐसा क्यों? तुम्हें मालूम है तुम ना रहे तो वो सारा महल अपने सर पर उठा लेगी।"

"दुरुस्त कहा बहु बेगम आपने। इन्हें मौजूद न पाकर तो वो हम सबको परेशान कर देंगी।" शेख़ बाबा ने ख़ुश तबई से हंसते हुए कहा "इन दिनों उन्होंने बहुत परेशान किया है मुझे।" शेख़ बाबा को सुनकर वो कुछ पल ख़ामोश रहा 

"मासाब....।" उसने अफ़सुर्दगी से अम्मा साहब की तरफ़ देखा "मेंरे अंदर ये हिम्मत नहीं है।" उसे ऐसे देखकर अम्मा साहब भी संजीदा हो गईं 

"तो आपने फ़ैसला कर लिया है! फिर आप ही अहलम को ये फ़ैसला सुनाएंगे, मैं इसमें नहीं पडूंगी।" 

"मैं जाने के बाद उसे ख़त लिख दूंगा।" ज़य्यान ने अपने हाथों को एक दूसरे में जकड़ लिया था। 

अम्मा साहब और शेख़ बाबा मामले की गहराई को समझ रहे थे। दोनों ने उसके सिलसिले में ख़ामोशी से एक दूसरे से बात किया, इतने में दरवाज़े पर मुंशीजी की दस्तक आ गई

"क्या मुझे अंदर आने को इजाज़त है?"

"आइए मुंशीजी।" ख़ामोशी तोड़कर शेख़ बाबा ने जवाब दिया

मुंशीजी जल्दी से अंदर आए, उनकी नज़र ज़य्यान पर भी पहुंच गई 

"वारिसे-अमान भी यहीं पर है।" ज़य्यान को देखकर उन्होंने आदतन चश्मा नाक पर चढ़ा लिया "ये अच्छा ही हुआ। मैं इसलिए आया था।" 

"तयारी हो गई आपकी?" शेख़ बाबा ने पूछा

"मेरी तो नही वज़ीर साहब, मैने कबीर को तयार कर दिया है, उनके साथ कुछ सिपाही भी जाएंगे।" 
मुंशीजी की बात ज़य्यान के पल्ले न पड़ी लेकिन शेख़ बाबा ने उनसे हामी भर लिया। उधर ध्यान न देकर मुंशीजी ने कहा "सारी बात हो गई है, मुझे यक़ीन है वापसी जल्दी हो जाएगी।"

"जल्दी हो जाएगी! आपको यक़ीन है?" शेख़ बाबा ने अपना चश्मा हाथ में थामकर शक का इज़हार किया

"यक़ीनन हो जाएगी, क्योंकि किशन ने नंदिनी बिटिया को तलाक़ दिलवाने का फ़ैसला कर लिया है ताकि वो सही सलामत घर लौट आए। रक्षा मंत्री ने वहां के सरदार बदलने का फैसला भी सुना दिया है इसलिए अब किसी बात की कोई गुंजाइश ही नही बची है। मैने महल का पैग़ाम भी तैयार करवा लिया है, बस आपकी मुहर बाक़ी है और फ़िर वो मैं आली जान को दे दूंगा, और जब आली जान उसे लेकर जा रहें हैं तो देर होने की कोई गुंजाइश ही नही है।" 

"बेहतर। इसके बाद हम सभी गांव का गुप्त जायज़ा करवाएंगे।" शेख़ बाबा ने कहा

"हमने भी यही फ़ैसला किया है।" अम्मा साहब ने कहा

ज़य्यान इनलोगो की बात तबतक न समझ पाया जबतक अम्मा साहब ने उन्हें बताया नही
"आप समझ गए ना ज़य्यान, बात साथ वाले गांव की है। वहां के सरदार आवाम पर ज़ुल्म कर रहे हैं। आप जाइए तयारी कर लिजिए, मुंशीजी आपको बाक़ी की बातें समझा देंगे।" 

"जी मासाब।" वो अम्मा साहब के हुक्म का पालन करते हुए फ़ौरन चला गया। फ़िर अम्मा साहब ने मुंशीजी से कहा

"मुंशीजी कल तक तो इसका ज़िक्र नही था?"

"किस बात का बेगम साहब?"

"सरदार बदलने का।" 

"इसके बारे में मुझे भी ख़ास नहीं पता था, वो तो मुझे आज रक्षा मंत्री ने बताया, उन्होंने कहा कि सुरक्षा का पालन करना उनकी ज़िम्मेदारी है इसलिए ये योजना बनाया गया। उनलोगों ने अनाबी के सामने आज ही ये प्रस्ताव रखा, सबकी मर्ज़ी थी इसलिए फ़ैसला हक़ में हुआ। अब उसकी पत्रिका आपके सामने दोपहर या शाम तक पेश कर दी जाएगी।"
उन्होंने हाथ में थामी एक पत्रिका अम्मा साहब के सामने पेश करते कहा "और ये वो है जिसपर आपकी मुहर लगेगी।"

"ठीक है।" सुरूर उनका मुहर ले आई, उन्होंने मुहर लगा दिया। मुहर लग जाने के बाद मुंशीजी ने कहा 

"नंदिनी बिटिया के लिए मैंने कौसर को भी जाने के लिए तयार कर दिया है।" 

"हम्मम, बेहतर।" 

"मैने तो चाहा था सेनावीर को तयार करूं मगर वो मुझे कहीं नज़र नहीं आए?" 

"मैने उन्हें गांव के दौरे के लिए रवाना करवाया है। आप इन बातों को छोड़कर अब मुझे बताइए ज़मीनों के मामले कैसे चल रहे हैं?"

"इन मामलों को वलिए मीर ने बख़ूबी संभाला हुआ है। मैने कस्बे के लोगों से बात किया, उन्होंने बताया मुझे कि वो उनके प्रति बहुत उत्तरदायी और संवेदशील हैं।" 

"ठीक है, आप तयारी कर लीजिए जाकर।"
मुंशीजी चले गए। 

उनके जाने के बाद अम्मा साहब खिड़की से महल की तरफ़ देखने लगीं। वहां फूलों की बड़ी बड़ी टोकरियों रखी हुई थी और खादिमाएं उन्हें पिरोने के लगीं हुई थीं।

"उम्मीद है सब जल्दी ख़ुशहाल हो जाए।" उन्होंने ख़ुद से कहा, और फ़िर उन्हीं टोकरी के बीच से उन्होंने हया को रुक्मिणी के साथ जाता देखा। 

सालगिरह की तैयारी के लिए महल में फूलों की टोकरियां, रंग बिरंगे कपड़े आना शुरू हो गए थे। महल में लगे परदे, बिछी क़ालीनें बदलने के लिए नए परदे और क़ालीनें निकाली जा चुकीं थीं। पकवान के लिए समान भी तैयार होने लगा था, और मैथिली मीरास महल की ख़ूबसूरती को निखारने के लिए अपनी ज़िम्मेदारी के तहत बिल्कुल तयनात थी।

नई ख़ुशियों की दस्तक ने मीरास महल में कुछ मायूस दिलो को जगमगा दिया था और कुछ जगमगाना बाक़ी थे।