"क्या शेख़ बाबा तक पैग़ाम पहुंचा दिया?" अम्मा साहब ने ऐवान सद्र में बैठे हुए सुरूर से पूछा
"जी। वो कोर्ट रूम में थे, उन्होंने कहा है कोर्ट रूम का काम ख़त्म करके आते हैं।"
"आज कि ख़बर क्या है?"
"कोर्ट रूम में आज लगभग सारे ही लोग थे, और वो अनाबी से खेतों के मसले के बारे में बात कर रहे थे।"
"और अनाबी?"
"उनका मिज़ाज ठीक लग रहा था लेकिन गुस्सा कर रहीं थीं।"
"ठीक है तुम जाओ।" सुरुर चली गई और अम्मा साहब रखी पत्रिकाएं देखने लगीं।
दोपहर के बाद, कोर्ट रूम का ख़त्म करके शेख़ बाबा ऐवान ए सद्र पहुंच गए
"आपने याद किया मुझे?" अपनी जगह संभालते हुए उन्होंने कहा
"क्या कुएं वाला काम अभी तक हुआ नहीं?" उन्होंने हाथ में थामी पत्रिका मेज़ पर रखकर पूछा
"उसकी अर्ज़ी तो पिछले महीने ही देखा जा चुका है, और काम भी शुरू करवा दिया गया है।" शेख़ बाबा ने सोचते हुए बताया
"फ़िर ये अर्ज़ी क्यों डाली गई है?" अम्मा साहब ने बाबा को पत्रिका देते हुए कहा, बाबा ने उसे लेकर पढ़ना शुरू किया, फ़िर कहा
"इसकी ख़बर मुझे हुई थी। वहां के लोगों में आपस में बहस हो गई थी। उनका कहना था हमारी ज़मीन पर कुआं बन रहा है इसलिए दूसरे ज़मीन के लोग इसका इस्तेमाल नही कर सकते, और ये अर्ज़ी उसी का नतीजा है।"
"इसका हल निकला?"
"जी, कुएं को दोनों जमीन पर बराबर से बांट दिया गया है, और उसमें दो बाल्टी लगाई गई है ताकि जगह को लेकर कोई झगड़ा न हो।" उन्होंने बताया फ़िर कोर्ट से लाई हुई पत्रिका अम्मा साहब के सामने रखा "ये माली विनोद की अर्ज़ी है।"
अम्मा साहब ने अर्ज़ी को पढ़ना शुरू कर दिया
"शहर में बेटे की पढ़ाई के लिए अर्ज़ी डाला है, साथ में सारा नतीजा भी है।" शेख़ बाबा ने बताया
"ये महल का बहुत वफ़ादार था। आप इसके लिए शिक्षक से बात करिए, और एक ख़त लिखकर दिल्ली रवाना कारवाईए। हम ज़य्यान से भी कहेंगे कि दिल्ली में इस सिलसिले में बात कर लें।"
"जी बेहतर।"
"आपने कल के बारे में ज़य्यान से बात किया?" अम्मा साहब ने कुछ याद करके पूछा
"मुझे तो वो कल से नज़र ही नहीं आए, न उनकी कोई ख़ैर ख़बर मिली।" शेख़ बाबा ने बताया
"कल से मुझे भी नज़र नही आएं हैं वो।"
"आप फिक्र मत करिए हो सकता है अहलम के साथ हो।"
"हम्मम, अगर हैं तो ठीक है। वरना फ़िर फ़िक्र की बात है।" अम्मा साहब ने ठंडी सांस खींचकर कहा।
"अब मुझे चलना चाहिए, अम्हेल से मिलने का वक़्त हो गया है, वो भी मेरे इंतज़ार में होंगी।"
शेख़ बाबा खड़े हुए तभी बाहर से आवाज़ उठी
"अम्मा साहब, अम्हेल आई है।" दरवाज़े पर से सुरूर की आवाज़ आई, और अम्हेल अंदर आ गई।
उसने बिना देर किए ख़त अम्मा साहब के सामने मेज़ पर रख दिया
"हमने जवाब लिख दिया है, उसे लेकर आएं है।" दोनों लोगों को देखकर उसने कहा
अम्मा साहब और शेख़ बाबा ने ख़त देखा, फ़िर अम्मा साहब ने पूछा
"इसे रवाना करवा दें?"
"जी, ये बिल्कुल तयार है।"
"ठीक है, तुम बाबा के साथ जाओ हम इसे रवाना करवा देंगे।"
बाबा आगे बढ़े, अम्हेल उनके पीछे चलने लगी। चलते हुए वो लोग शेख़ बाबा के कमरे के पीछे आस्ताना-ए-दर्स पहुंच गए।
यहां पर एक ऊंचा मुक़ाम था जिसपर पहुंचकर सामने लगी मेज़ पर दोनों आमने सामने होकर बैठ गए।
"मैंने जो दर्स कल दिया था आपको, वो याद है न?" शेख़ बाबा ने पूछा
"जी याद है हमें।" उसने सरगर्मी से जवाब दिया
शेख़ बाबा ने अम्हेल को ध्यान से देखा, और उनको आज उसका अंदाज़ कुछ अलग लगा, उसका चेहरा भी खिला हुआ था
"आज मैं देख रहा हूं, आपका अंदाज़ कुछ अलग मालूम हो रहा है, और आप खुश भी नज़र आ रहीं हैं।"
"क्योंकि आज हमने बाबाजान को देखा।" उसने मुस्कुराकर बएहतेराम जवाब दिया "वो बहुत दिनों बाद हमसे मिलने आए।"
"तब तो ये ख़ुशी नज़र आनी ही है।" शेख़ बाबा ने कहा
उन्हें मालूम था कि जब भी अम्हेल अपने बाबाजान को ख़्वाब में देखती है, यूंही खुश हो जाया करती है। महल में आने के बाद ऐसा अक्सर हुआ है, इसलिए वो अंदाज़ा लगा चुके थे
"मैं भी इंतज़ार में था कि जब आपके बाबा आपसे मिलने आए क्योंकि आप कुछ दिनों से काफी उदास भी लग रही थीं।" उनके चेहरे पर भी खिली सी मुस्कुराहट आ गई
"लेकिन....।" फ़िर अम्हेल ने चिंताजनक कहा "उन्होंने हमसे बातें किया जिसका मतलब हमें समझ नही आया।"
"अच्छा! क्या कहा उन्होंने?"
"पहले तो हम एक कमरे में तन्हा बैठे थे, फ़िर वहां बबाजान ने आकर हमें पकड़ा और महल के सामने पहुंच आए और फिर उन्होंने कहा..." अम्हेल ने दो पल कुछ सोचा फ़िर कहा
"उन्होंने कहा कि फ़र्क नही पड़ता तुम जहां भी रहो, बस तुम हमेशा ख़ुश रहो।....... फिर, फिर वो हमें महल के अंदर ले आएं ... जहां सबलोग हमसे बहुत दूर खड़े थे उसके बाद उन्होने कहा "तुम्हे इस बात का अंदाज़ा है की तुम्हारी उदासी मुझे बेचैन करती है, और मैं तुम्हे इनके हवाले इसलिए कर रहा हूं की अब मेरे जाने का वक़्त हो गया है।"
अम्हेल को इस पल वो बात भी याद आ गई जो उसे सुबह से याद नहीं आ रही थी, और ये बताते हुए उसकी आंखें भीग गईं। उसने आगे बताया
"और अब तुम्हारी उदासी मिट जाएगी जिससे मुझे सुकून मिलेगा।"
ख़्वाब से अम्हेल बेहद ख़ुश थी लेकिन अब ये सारी बातें पूरी तरह से याद आ जाने के बाद वो कश्मकश में पड़ गई।
शेख़ बाबा ने उसे ध्यान से सुनने के बाद कहा
"मैं सबब नहीं पूछूंगा लेकिन इससे ज़ाहिर है तुम काफ़ी परेशान थीं, और ये तुम्हारे बाबा भी जानते हैं और तुम्हारे लिए परेशान हैं।" शेख़ बाबा ने कहा "उम्मीद है कि तुम अपने बाबा की बातों का मतलब समझकर वो करो जो वो चाहते हैं, और वो क्या चाहते हैं साफ़ लफ्ज़ों में तुम्हे बता दिया है उन्होंने।....
इसके बाद भी तुम उनके लफ़्ज़ों पर ग़ौर करके समझ सकती हो उनकी बातों का मतलब। इतना तो मैंने आपको सिखा दिया है न।"
"और ये सारी बातें कहकर वो चले गए।" उसने रूआंसा होकर बताया
"जाने वाले को कौन रोक सकता है, लेकिन हम ख़्याल कर सकते है।" उन्होंने उसे समझाया "वो तुम्हें महल पहुंचाकर चले गए क्योंकि तुम्हारे यहां होने से उन्हें भी सुकून है।"
अम्हेल के सामने उसकी अम्मा साहब से हुई कल शाम वाली बातें घूमने लगी और वो समझ गई कि ऐसा क्यों हुआ
"आपने सही कहा था बड़ीमां वो अपने वादे से मायूस नही है। हमने इसपर ध्यान ही नहीं दिया की उन्हें कितनी उलझन हो जाएगी मेरी वजह से।" मुस्कुराकर अम्हेल ने ख़ुद से कहा
अम्हेल के लहजे में आज बहुत दिन बाद फिर से वो हिम्मत और ख़ुद ऐतेमादी देखने को मिली जिसके साथ उसने अपने क़दम बेलोस हवेली से बाहर निकाले थे, जिसके ज़रिए उसने हर ग़लत को ग़लत कहा और सही को सही बनाए रखा, जिसे वो धीरे धीरे ख़ुद से जुदा करती जा रही थी।
कुछ अम्मा साहब, कुछ कुसुम और मैथिली, कुछ महल के लोग, और कुछ शेख़ बाबा के सिखाए सबक़ इसे दुबारा अम्हेल आरा बना रहे थे और आख़िर में उसके बाबाजान ने भी इसमें उसका साथ दिया।