गहरे सन्नाटे के गुज़र जाने के बाद आज फिर मीरास महल में हुल्लड़ शुरू हो गई। मंत्रियों का आना जाना, काम के साथ साथ नौकर चाकर की गपशप, और काम सही न होने पर डांट पड़ना।
मीरास महल में बीते हादसे ने सब खामोश कर दिया था , लेकिन अहलम की अठारवीं सालगिरह नज़दीक होने की वजह से सबके मन में एक आस आ गई थी, सबके अंदर एक जोश आ गया था, और उसकी तैयारी भी शुरू हो गई थी। आज महल की सफाई का काम भी ज़ोरो शोर पर था।
जिस शोर से महल उकता गया था आज नजाने क्यों इसी शोर की आवाज़ से सबको सुकून मिला। महल में चल रहे काम को देखने के लिए महल का एक चक्कर लगा कर मैथीली दुबारा अम्हेल के कमरे में आ गई
"अम्हेल , उठ जाइए अब तो सूरज भी चढ़ने लगा।" उसने एक आवाज़ लगाया फ़िर कहा "आप तो सुबह उठ जाने के बाद दोबारा सोती नहीं थी, तबियत तो ठीक है न आपकी?"
सुबह सुबह मैथिली की आवाज़ ने अम्हेल की आंख को खुलने पर मजबूर कर दिया
"क्या हो गया, सोने दो ना हमें।" उसने कहा और पलट कर फिर सो गई
"आपकी इबादत का वक़्त निकला जा रहा है।" उसने बताया
"क्या वक़्त हो गया, क्या सूरज सामने आ गया?" अम्हेल चौंककर उठकर बैठ गई
"अभी सामने नहीं आया है पर जल्दी ही आने वाला है इसलिए जल्दी से उठ जाओ, मैंने क़ालीन लगा दिया है।"
"हां जाते हैं।" वो उठकर चली गई। मैथिली भी कमरे से चली गई।
अम्हेल को छत पर बैठकर दुआएं करते वक़्त बीती रात का धुंधला पहलू याद आने लगा
"वो आप थे!" उसने आंखे पूरी खोलकर अचानक कहा
"हां, बाबाजान आप आए थे।" याद आते ही वो मुस्कुरा उठी लेकिन अगले पल मुस्कुराहट की लकीरें मिट गई
"ये ख़्वाब धुंधला सा क्यों हो गया। उन्होंने हमसे क्या कहा था, ये हमें याद क्यों नही।"
धुंधली यादों को लेकर वो ख़्वाब को याद करने लगी। जिसे वो भूल चुकी थी उसे याद करने की कोशिश में काफ़ी देर तक वो दुआओं में बैठी रह गई।
मैथिली चाय के साथ कमरे में वापस आ गई
"लो आ गई तुम्हारी दिलअजीज़ चाय।" उसने अंदर आकर कहा। अम्हेल को कमरे में न पाकर वो छत की तरफ़ बढ़ी
"अरे, अभी तक वहीं हो?"
उसे सुनकर अम्हेल ने कुछ खोए हुए मन से उसे द2कहा फ़िर उठकर अंदर चली आई।
"किसी उलझन में हो क्या, जब किसी उलझन में रहती हो तभी तुम देर देर तक दुआओं में रहती हो।" मैथिली ने चाय उसे देते हुए कहा
"हम्मम, बाबाजान ख़्वाब में आए थे, उन्होंने हमसे बहुत कुछ कहा मगर हमें कुछ ठीक से याद नहीं आ रहा।" उसने बताया "सबकुछ टुकड़े टुकड़े में याद आ रहा है।"
"बस इतनी सी बात है - तुम उन टुकड़ों को बैठकर जोड़ लो। तुम्हारे बाबाजान को तो तुम जानती ही हो इसलिए जब इन टुकड़ों को जोड़ेगी ख़ुद समझ जाओगी ख़्वाब।"
"तुम ठीक कहती हो, लेकिन जोड़ने के लिए तो सारे टुकड़े होने भी चाहिए।"
"जब तुम जोड़ना शुरू करोगी तो वो अपने आप मिलने लगेंगे।" मैथिली ने शाही बिस्किट निकाल कर उसके सामने रखकर कहा
"मैं इस बारे में शेख़ बाबा से बात करूं क्या? वो मेरे मन को और ख़्वाब को बहुत अच्छे से समझते हैं।"
"ये तो और बेहतर है। इसे तुम शेख़ बाबा से बताओ वो इसे सुलझा देंगे।" मैथिली उसके सामने बैठ गई "वैसे भी तुम्हारी किताबों में भी कुछ ऐसा ही तो पढ़ रही थी तुम। ख़्वाब के प्रकार, उनकी अहमियत।"
"मैं बताऊंगी उन्हें।" अम्हेल ने कहा
"और जो ख़त तुमने लिखा है उसे देना मत भूलना।"
" हम्मम।" उसने आहिस्ता से जवाब दिया
"अभी फ़िर ख़त का नाम सुनकर परेशान हो गई?" मैथिली ने उसका चेहरा देखकर पूछा
"मुझे बताओ, तुम क्यों हर पल परेशान हो जाती हो? ज़िंदगी में तो बहुत से मसले आते जाते हैं, और जबतक जिंदगी है आते रहेंगे। तुम सब से हार मानकर दुनिया में छुपकर तो नही रह सकती हमेशा। तुम जितना ख़ुद को गायब कर रही हो ये ठीक नहीं है इससे तो मुश्किल सिर्फ़ बढ़ेगी तुम्हारी।"
"इन सारी मुश्किलों को हल करने के लिए मेरे बाबाजान हमेशा मेरे साथ रहते थे लेकिन अब सिर्फ़ बयाबान का सन्नाटा ही दिखता है। ना बाहर निकलने का कोई रास्ता न उसमें रहने की हिम्मत।"
"वो इसलिए ऐसा करते होंगे ताकि तुम आगे अकेले चलने का हौसला रख सको। तुम बताओ, क्या उनके जाने के बाद कोई मुश्किल नहीं आई ज़िंदगी में तुम्हारी? या तुमने उसके सामना नहीं किया? तुम इस तरह सोचती रहोगी तो कैसे निकल पाओगी उलझन से बाहर।" मैथिली की बात पर अम्हेल अचानक खड़ी हो गई, उसे देख मैथिली भी झट से खड़ी हो गई।
"याद आ गया.....।" उसने मैथिली को पकड़कर जोश से कहा "बाबा जान ने भी कुछ ऐसा ही कहा था हमसे।"
"ज़ाहिर है तुम्हे परेशान देखकर वो भी ख़ुश नहीं रह पा रहे होंगे वहां, और तुम उन्हें परेशान करने की कोई कसर ख़ाली नहीं रहने दे रही। तुम ख़ुद सोचो तुम क्या कर रही हो।"
"हम जानबूझ कर ऐसा नहीं करते।"
"ऐसा तुम्हे लग रहा है, तुम चाहो तो ख़ुद अपनी अज़ीयतें कम कर सकती हो। इस तरह घुटने की ज़रूरत नही है।"
"हम शेख़ बाबा की तरफ़ से होकर आते है।" सामने रखी शॉल ओढ़ाकर, बिस्तर के पास वाली मेज़ पर रखा सफ़ेद लिफ़ाफ़ा उठाते हुए अम्हेल चली गई। मैथिली भी बिस्तर ठीक करके कमरे से बाहर आ गई।
जाते हुए वो शरबती से टकराते टकराते बची। शरबती चाय संभाल कर पीछे हटी
"अरे इन्हें क्या हो गया?" शरबती ने मैथिली से पूछा
"बाबाजान का ख़्वाब देखा है, अब बाबा से मिलने जा रहीं।"
"अच्छा इसलिए।" उसी देखकर शरबती हया के कमरे में आ गई
"मैं अंदर आ जाऊं।" शरबती ने बाहर से आवाज़ लगाया
"आ जाओ।" हया का जवाब मिलते ही शरबती अंदर आ गई
"आपकी चाय तयार है। आप इसे ख़त्म करके तयार हो जाइए। बाबा का आदेश है कि नाश्ते के लिए आपको मेज़ पर आना है।" उसने कहा
"ठीक है।" उसने दो पल सोचकर मुस्कुराते हुए जवाब दिया
शरबती ने चाय उसे थमा दिया और उसे पीते हुए हया ने उससे पूछा "सुनो, मुझे कुछ किताबों की ज़रूरत है। क्या मैं बाहर जाकर उन्हें ला सकती हूं?"
"आपको इसकी ज़रूरत नही पड़ेगी, मीरास महल में पीछे की तरफ़ किताबघर है वहां आपको किताबें मिल जाएंगी। आप जब कहेंगी मैं ले चलूंगी आपको।" उसने संभले अंदाज़ में जवाब दिया
"ठीक है।"
काम पूरा करके शरबती मीरास महल की दीवारों के बीच से गुज़र कर मैदान की तरफ़ चली गई जहां सभी अपने अपने हथियारों के साथ थे। वो भी अपनी तलवार उठाकर उन सबमें शामिल हो गई और सिकंदर भाई के सामने जा पहुंची।
आज की सुबह अलग रंग के साथ आई थी।
नई सुबह के साथ कई लोगों में नई उम्मीदें, नई उत्सुकता, और कुछ बदला हुआ ख़ुशहाल माहौल मीरास महल में देखने को मिला।