DASTAN-E-KARB - भ्रम से परे क्या है? - Chapter 4 Scene 7 Azoorey द्वारा नाटक में हिंदी पीडीएफ

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DASTAN-E-KARB - भ्रम से परे क्या है? - Chapter 4 Scene 7

पुराने ज़ख्म ताजा होकर तकलीफ़देह बन जाते है। अम्मा साहब भी इस वक़्त उसी तकलीफ़ में थीं, लेकिन उनके पास इतना वक़्त नही की उस बात का दुख मनाए। अम्हेल की बातें और उसका जवाब उनके दिल को रेज़ा-रेज़ा करने की कोशिश में लगा हुआ था लेकिन कर नहीं पा रहा था। 

शेख़ बाबा और मुंशीजी के आते ही उन्होंने अपने आप को पुराने दिनों से बाहर निकाल लिया। उनके पास अब उनके लिए वक़्त कहां था, उन्होंने तो मीरास महल की ज़िम्मेदारी के तले कबका सब भुला दिया था। उनके लिए तो मीरास महल उनकी अज़ीयत से ज़्यादा अहम हो गया था।

शेख़ बाबा और मुंशीजी के चेहरे पर फिक्रमंदी देखकर अम्मा साहब ने पूछा

"क्या हुआ बाबा सब ख़ैरयत, इस वक़्त मुंशीजी महल में और आपके साथ?"

"बड़ा मसला दरपेश आ गया है बेगम साहब।" मुंशीजी ने अपनी जगह संभालते हुए कहा

"कैसा मसला?" 

"किशन 3 दिन से अर्ज़ी डालकर इंतज़ार में था, आज बेबसी से रोते हुए मेरे घर पहुंच गया।" हरे रंग की पत्रिका सामने रखकर मुंशीजी ने बताया

"क्यों, क्या मसला हो गया, और तीन दिनों से उसकी अर्ज़ी अभी तक देखी क्यों नहीं गई?" तेवर बदलकर अम्मा साहब ने सवाल किया, उनका तेवर समझकर मुंशीजी ने बात साफ़ किया

"अर्ज़ीयां तो अनाबी देखती है, उन्होंने इस अर्ज़ी पर नज़र डालने से साफ इंकार कर दिया था। वो कहती है ये साफ़ साफ़ उनके घर का मसला है और उसमे हम नही पड़ते।" 

अम्मा साहब ने पत्रिका उठाकर पूछा "इस बारे में भी हम बात करेंगे, अभी मुझे किशन का मसला बताइए।"

"अम्मा साहब आपको तो ख़बर है कि किशन ने बेटी की शादी इस शर्त पर किया था की ससुराल उसकी शिक्षा पूरी की जाएगी। कुछ वक़्त तो सब ठीक रहा मगर अब जब 4-5 महीने गुज़र गए तो वो उससे कहते है कि उसकी ज़मीन उनके नाम करेंगे तब इजाज़त मिलेगी, उसके मना करने पर उसे क़ैद करके उसपर ज़ुल्म करते है और ये बात सबसे छुपी थी। किशन ने बताया वो हफ़्ता भर पहले बिटिया से मिलने गया था वहां उसे हालात का पता चला, सरदार से बात करने पर सरदार ने कहा कि ससुराल वाले सही हैं। अब वो अर्ज़ी की सुनवाई के इंतज़ार में है।"

"और आप किसके इंतज़ार में है मुंशीजी? कल इस मसले को हल करवाइए और इस बारे में मैं अनाबी से बात कर लूंगी?"

"बेगम साहब मसला तो हल करवा दें लेकिन मसला ये है कि इस मसले को हल किया कैसे जाए?"

"इसका क्या मसला है?"

"बात ये है कि वो न ख़ुद आना चाह रहे और न नंदिनी बेटी को आने दे रहें है। न किशन को बेटी से मिलने दे रहे हैं।"

"तो बेटी के ससुराल जाकर मसला हल करवाएं।"

"इस बारे में मुझे आपसे मशवरा करना था।"शेख़ बाबा ने कहा

"आप सुलाहकार को तैयार करिए और उनके साथ ज़य्यान को भेजिए।"

"अहम्मम... म्म्ममम....बेगम साहब आली जान इस काम के लिए क्या तजुर्बेकार हैं?" मुंशीजी ने मुंहफट तरीक़े से पूछा

"मुंशीजी मैं कोर्ट रूम में नही हूं तो क्या आप मेरे फैसले पर शक कर रहे हैं?" 

"मेरी क्या मजाल, मुझे लगा कि शायद आपको वो याद आ गए इसलिए उनका नाम ले लिया।" मुंशीजी ने फ़ौरन सफ़ाई पेश किया

"हहाहहा.....मुंशीजी बहु बेगम ने जो फैसला लिया है बेहतर लिया है आप सलाहकार के साथ ज़य्यान को कल सुबह रवाना कर दें।" पत्रिका पढ़ते पढ़ते उसपर से नज़र हटाकर शेख़ बाबा ने कहा 

"अब आप भी पुष्टीकरण कर रहे हैं वज़ीर साहब तो कोई ठोस वजह ही होगी बेगम साहब के इस फ़ैसले के पीछे जो मेरी समझ से बाहर है।"

"पेशकार साहब अगर ये सारी बातें किसी और ने किया होता तो नज़रबंद हो जाता या फिर महल से बेदख़ल लेकिन आप ही है जो इस तरह मसखरापन कर सकते है।"

"क्या आप नहीं जानते वज़ीर साहब, इस मसखरेपन की वजह से कितनी मुश्किलें आसान होती है और ये मसखरेपन मैं पूरी ज़िम्मेदारी से करता हूं।"

"हा अंदाज़ा है इस बात का तभी तो आप सलामत रहते है।" उन्होंने भी मसखरे अंदाज़ में कहा, फ़िर पूछा "अब पूरी ज़िम्मेदार से मुझे बताइए ज़य्यान क्या मसरूफ़ हैं सुबह से?"

"वो सुबह से अपने कमरे में बंद है और अपने सामान को समेट कर तयारी कर रहें हैं।"

"तयारी कर रहें हैं? क्या उनके जाने का वक़्त क़रीब आ गया है?" अम्मा साहब ने चौंक कर पूछा

"जी बेगम साहब उनके बुलावे की चिट्ठी आ गई है, और हर बार की तरह वो आपको तैयारी हो जाने के बाद ही बताएंगे।"

"हम्मम।" उन्होंने कुछ सोचते हुए कहा "आप अब घर जाइए और किशन से कह दीजिए जाने की तयारी कर ले?"

"जी बेगम साहब।" मुंशीजी ने जाते जाते कहा 

"वज़ीर साहब मुझे वलिए मीर के सिलसिले में आपसे कुछ बात करना था।" 

"क्या वलिए मीर कस्बे और ज़मीनों पर जाते हैं?" अम्मा साहब ने उसका ज़िक्र सुनकर पूछा

"वो सुबह जल्दी जाते है और देर रात लौटते है। ज़मीनों को देखने के बाद कस्बे वालों से भी मिलते है और उनसे बातें भी करते हैं। उनके मन में क्या चल रहा है आजकल कुछ बोलते भी नहीं हैं।"

"सुबह जो हुआ क्या उनको कोई ख़बर है?"

"आप बेफिक्र रहिए, ये ख़बर उनसे दूर है।" 
उनका जवाब सुनकर अम्मा साहब के जान में जान आई

"बेहतर है, कुछ दिनों में अहलम की अठारहवीं सालगिरह है, मैं नहीं चाहती ज़ख्म बार बार कुरेदे जाएं, और हम सबको उनके गुस्से का अंदाज़ा भी है।" 

"मैं बिल्कुल समझता हूं इसलिए मैने इसको उनसे दूर ही रखा है।"

"आप समझदार है इसलिए ही बच जाते है मुंशीजी।" शेख़ बाबा ने मौक़ा पाकर फिर से उनपर मज़ाकानाह तंज़ कर दिया

"ये बात तो आपकी सौ टके सही है।" उन्होंने भी पीछे रहने से इंकार नहीं किया "वैसे मैं सोच रहा था की क्या वो अभी तक नाराज़ हैं?" मुंशीजी के इस सवाल पर अम्मा साहब और शेख़ बाबा इन्हें घुरकर देखने लगे "अरे मैं तो इसलिए पूछ रहा हूं क्योंकि आजकल वो आली जनाब की ख़ैरियत बहुत ले रहें हैं।" 

"और कबतक आप उनसे नाराज़ रहेंगी?" शेख़ बाबा ने पूछा

"जबतक वो अपनी ग़लती नही समझ लेते।" उन्होंने जवाब दिया

"इस तरह तो वो बेज़ार होने लगेंगे। लेकिन आपके समझाने पार वो बेशक आपकी बातें समझते हैं।" शेख़ बाबा ने मशवरा दिया

"आप कहें तो मैं कुछ करूं?" मुंशीजी ने कहा

"ठीक है आप उनसे बात करिए।" शेख़ बाबा ने कहा

मूछ पर ताव डालकर, सीना तानकर, अपनी धोती संभाले मुंशीजी अपने घर को लौट गए। उनके जाने के बाद अम्मा साहब ने कहा

"मुझे भी आपसे बात करना था।" 

"कहिए।" बाबा ने कहा 

"मैने अम्हेल से ख़त के सिलसिले में बात किया, उसने कुछ नही बताया, लेकिन मुझे मालूम हुआ कि वो लालगंज के बारे में बहुत कुछ जानती है।"

"उसने बताया आपको?"

"उसने बताया कि वजाहत अक्सर उससे लालगंज की बातें करते थे।" 

"हम्मम, अम्हेल काफ़ी समझदार है, वो चीज़ें बहुत जल्दी समझती है और उसे बख़ूबी संभालती है।"

"मैंने उसे हमारे वादे के बारे में बताया उसने कहा कि वो बिल्कुल वही करेगी जैसा उसके बाबाजान चाहते थे, और अपनी हिफाज़त का वादा भी किया है।"

"मुझे मालूम था वो ऐसा ही करेगी। उसे तालीम देते देते कुछ कुछ मैं उसे समझ गया हूं। वो ख़ामोश रहती है मगर उसकी ख़ामोशी समंदर से भी गहरी रहती है।"

शेख़ बाबा ने गहराई से कुछ सोचा फ़िर नीम मुस्कान के साथ आगे कहा
"अब अगर देखा जाए तो ये अच्छी बात है। मैंने भी उसे नक़सान फ़ायदा समझाया और उसने मुझसे कहा इस सबक़ का पहला दर्ज़ होता है कि किसी पर आंख बंद करके यक़ीन न किया जाए। मुझे लगता है हमलोग खांमखां उसके लिए घबराते हैं। वो हमारी सोच से ज़्यादा समझदार है, और आप फ़िर भी परेशान हैं तो आप तो आसानी से सब मालूम करवा सकतीं हैं।

उनकी बात पर अम्मा साहब ग़ौर-ओ-फिक्र करने लगी। हाथ में ली हुई पत्रिका को बंद करके रखते हुए बाबा खड़े हो गए 

"अब आप आराम करिए।" बाबा चले गए

अम्मा साहब थका हुआ महसूस कर रहीं थीं लेकिन अब उनके मन में कुछ और चलने लगा था इसलिए आराम का वक़्त कहां था। कमरे के सन्नाटे में काफ़ी देर तक ग़ौर-ओ-फिक्र के बाद उन्होंने सुरूर को बुला लिया

"सेनावीर को ऐवान-ए-सद्र में फ़ौरन हाज़िर होने का पैग़ाम पहुंचाओ।" सुरुर पैग़ाम लेकर चली गई और कुछ देर बाद सागर भाई के साथ लौट आई। उन्हें बाहर ठहराकर वो अंदर आ गई

"सेनावीर आ गए हैं।" सेनावीर को अंदर ले आया गया

अंदर आकर सागर भाई उनके सामने झुककर खड़े हो गए और सुरूर बाहर दरवाज़े के पास निगरानी में खड़ी हो गई। 

"तुम्हारे लिए एक बेहद अहम काम है।" 

"हुकुम आली जनाब।"

"अम्हेल आरा से सभी बख़ूबी वाक़िफ हो चुके हैं। मैं चाहती ही की तुम उसकी सरज़मीन आलीपूर जाओ, और उसके साथ, बेलोस हवेली से मीरास महल के सफ़र तक के दरमियान जो कुछ भी हुआ मालूम करो।... मुझे सारी मालूमात चाहिए।"

"आपका हुक्म ही हमारा कर्तव्य है।" सागर भाई सर झुका कर चले गए।

ठंड की रात का अंधेरा जल्दी गहराने लगा। सब इसे नज़रअंदाज़ किए अपने अपने कामों में थे। मीरास महल में सुबह के हादसे के बाद से सब कुछ उदास सा था, और
इन हालात के बीच दो घुड़सवार अपने समान के साथ गहरे अंधेरे को चीरते हुए महल से रवाना हो गए। सुरूर में उनके रवाना होने की ख़बर आकार अम्मा साहब को सुना दिया। ये ख़बर सुनते ही अम्मा साहब लंबी सांस लेकर आराम के लिए चली गईं।