ध्रुव की तारा
भाग - २९
लेखिका "अनामिका"
ध्रुव ने बिना किसी दिखावे के बेहद सादगी से अपने दिल का हाल कह दिया था। उसकी निगाहें टकटकी लगाए तारा के चेहरे पर टिकी थीं, मानो वह हर गुज़रते सेकंड के साथ उसकी आँखों में अपना जवाब ढूँढ रहा हो।
तारा जहाँ की तहाँ सुन्न खड़ी रह गई। इतने बरसों से जिस एक पल का सपना उसने हर दिन, हर रात देखा था... जब वह हकीकत बनकर उसके ठीक सामने आया, तो उसके दिल का बाँध टूट गया। वह खुशी, राहत और इतने सालों के इंतज़ार का भारीपन एक साथ संभाल नहीं पाई। इससे पहले कि ध्रुव कुछ समझ पाता, तारा ने अपने सारे संकोच को पीछे छोड़ दिया और रोते हुए सीधे ध्रुव के गले से लग गई।
ध्रुव पल भर के लिए पूरी तरह हैरान रह गया। उसकी बाहें हवा में ही ठहर गईं। उसे समझ ही नहीं आ रहा था कि तारा की ऐसी हालत क्यों हो गई है—क्या वह किसी बात से परेशान है, डर गई है या यह खुशी के आँसू हैं।
"तारा... क्या हुआ? तुम ठीक तो हो ना?" ध्रुव ने घबराते हुए धीमी आवाज़ में पूछा।
तारा ने ध्रुव के कंधे पर अपना सिर और कसकर टिका लिया। उसके सिसकते हुए होंठों से बस इतना ही निकला, "बुद्धू... मैं तो कब से तैयार हूँ।"
यह सुनते ही ध्रुव के दिल का सारा डर और अनिश्चितता एक पल में गायब हो गई। उसने तारा को और कसकर अपनी बाहों में भर लिया, जैसे दुनिया की हर फिक्र और दूरी को हमेशा के लिए मिटा देना चाहता हो। स्विमिंग पूल के किनारे बिखरी उस नीली रोशनी में दोनों बस एक-दूसरे की साँसों को महसूस कर रहे थे। उस एक खामोश लम्हे में उन दोनों को ऐसा अहसास हो रहा था, मानो उन्होंने पूरी दुनिया की सबसे बड़ी जंग जीत ली हो—एक ऐसा सुकून, जिसे बयाँ करने के लिए शब्द हमेशा कम पड़ जाते हैं।
दोनों उसी सुकून भरे लम्हे में खोए हुए थे कि तभी ध्रुव की जेब में रखे फोन की वाइब्रेशन से उनका ध्यान टूटा। ध्रुव ने फोन निकाला, स्क्रीन पर माँ का नाम देखकर उसने मुस्कुराते हुए तारा की तरफ देखा और कॉल रिसीव किया।
"हाँ माँ?" ध्रुव ने सामान्य आवाज़ में कहा।
दूसरी तरफ से माँ की सहज आवाज़ आई, "ध्रुव, कहाँ हो तुम लोग? डिनर लग रहा है, अंकल-आंटी भी टेबल पर आ गए हैं। अगर तुम लोगों की बातचीत हो गई हो तो जल्दी घर आ जाओ।"
"हाँ माँ, बस निकल ही रहे हैं," ध्रुव ने तारा को देखते हुए जवाब दिया।
"ठीक है, आराम से आओ," कहकर माँ ने फोन रख दिया।
फोन कटते ही ध्रुव ने हल्का सा हंसते हुए तारा की तरफ देखा, "लगता है हमारे इंतज़ार में खाना ठंडा हो रहा है।" तारा ने भी अपनी आँखें पोंछते हुए हल्की सी मुस्कान के साथ सिर हिलाया। दोनों ने अपने बिखरे हुए जज़्बातों को समेटा, एक-दूसरे का हाथ थामा और घर की तरफ बढ़ गए।
जैसे ही दोनों घर के दरवाज़े पर पहुँचे, सुमन वहीं उनका इंतज़ार कर रही थीं। उन्होंने ध्रुव को तो अंदर जाने का इशारा किया, लेकिन तारा का चेहरा देखते ही उनकी नज़रें उसकी हल्की लाल और नम आँखों पर टिक गईं।
"क्या हुआ तारा? आँखें लाल क्यों हैं?" सुमन ने चिंता से पूछा।
तारा के पास इस बात का कोई जवाब नहीं था; उसने बस नज़रें झुका लीं और चुपचाप खड़ी रही।
पास से गुज़रते हुए ध्रुव ने दबी सी मुस्कान के साथ कहा, "अरे माँ, आप तो अपनी बहू को जानती ही हो... इसे हर छोटी-छोटी बात पर रोना आ जाता है।" इतना कहकर वह मुस्कुराता हुआ सीधे अंदर चला गया।
ध्रुव की बात सुनते ही तारा का चेहरा शर्म से लाल हो गया और वह भी झट से सुमन के पीछे छुपते हुए अंदर भाग गई। सुमन के चेहरे पर एक सुकून भरी मुस्कान फैल गई; वह बिना कुछ कहे समझ चुकी थीं कि अब घर में शादी की तैयारियाँ शुरू करने का वक्त आ गया है।
डिनर के बाद टेबल समेटने का काम शुरू हो चुका था। सुमन जी, सुधा जी और तारा किचन में सारा सामान समेट रही थीं, जबकि हॉल में सोफे पर विजय जी, आनंद जी और ध्रुव आराम से बैठे थे।
आनंद जी ने ध्रुव से काम-काज का हाल पूछते हुए कहा, "और ध्रुव, ऑफिस में सब कैसा चल रहा है? प्रोजेक्ट्स और काम का दबाव ज़्यादा तो नहीं?"
"सब बढ़िया चल रहा है अंकल, बस थोड़ा रूटीन का काम रहता है," ध्रुव ने सहजता से जवाब दिया।
तभी विजय जी ने मुस्कुराते हुए बात आगे बढ़ाई, "तो ध्रुव, अब जब तुम आ ही गए हो और सब बातें भी तय हो चुकी हैं... तो क्यों न जब तक तुम यहाँ हो, हम सगाई का काम निपटा लें?"
आनंद जी ने भी तुरंत हामी भरी, "हाँ, यह तो बहुत बढ़िया विचार है।"
ध्रुव ने थोड़ा झिझकते हुए कहा, "नहीं पापा... मुझे सिर्फ चार दिन की छुट्टी मिली है। आज का दिन तो ऐसे ही निकल गया, अब बस तीन दिन बचे हैं। इतने कम समय में हड़बड़ी होगी। इससे अच्छा है कि आप लोग पंडित जी से बात करके शादी का कोई अच्छा सा मुहूर्त निकाल लें। जब तैयारियां पूरी हो जाएंगी, तब मैं सीधे शादी के वक्त ही आ जाऊँगा। उस समय मुझे कम से कम एक महीने की छुट्टी आराम से मिल जाएगी।"
विजय जी ने थोड़ा हैरान होकर पूछा, "अच्छा! पर अगर तुम्हें एक महीने की छुट्टी मिल रही है, तो तुम सिर्फ शादी के वक्त क्यों आओगे? तैयारियां खत्म होने के बाद आने के बजाय तुम शादी से कुछ दिन पहले भी तो आ सकते हो ना, ताकि सब कामों में मदद हो जाए?"
ध्रुव के दिमाग में कुछ और ही गणित चल रहा था, उसने बिना सोचे-समझे सहज भाव से कह दिया, "अरे पापा, शादी के बाद हनीमून पर भी तो जाना होगा... उसके लिए छुट्टियों की ज़रूरत पड़ेगी ना।"
बोलते ही ध्रुव को अहसास हुआ कि उसने बड़ों के सामने क्या कह दिया है। उसकी ज़बान वहीं थम गई।
उसी वक्त किचन से बर्तनों की ट्रे लेकर बाहर आ रही तारा के कदम वहीं जम गए। उसका चेहरा मारे शर्म के लाल हो गया। उसने तुरंत हाथ में पकड़ी ट्रे पास की टेबल पर रखी और बिना किसी की तरफ देखे चुपचाप अपने कमरे की तरफ भाग गई।
ध्रुव ने घबराकर अपने पापा और आनंद अंकल की तरफ देखा, जो उसे ही देख रहे थे। अपनी भयंकर नादानी से घबराकर ध्रुव भी हड़बड़ाहट में उठा और 'मैं अभी आता हूँ' बड़बड़ाते हुए सीधे अपने कमरे की तरफ भाग गया।
दोनों बच्चों को इस तरह भागते देख एक पल के लिए सन्नाटा छा गया। विजय जी ने अपना गला खंखारते हुए माहौल को संभालने की कोशिश की और आनंद जी की तरफ देखा।
आनंद जी ज़ोर से हंस पड़े और विजय जी के कंधे पर हाथ मारते हुए बोले, "अरे विजय, तुम ऐसे क्या देख रहे हो? आखिर बेटा तो तुम्हारा ही है, उतावलेपन में बिल्कुल तुम पर ही गया है!"
सुमन जी भी किचन से बाहर आते हुए मुस्कुराने लगीं। आनंद जी ने सुमन जी की तरफ देखकर चुटकी ली, "भाभी जी, आपको याद है ना? जब आपकी और विजय की शादी तय हुई थी, तब यह भी छुट्टियों के नाम पर ऐसे ही हिसाब जोड़ रहे थे!"
सुमन जी ने हंसते हुए सिर हिलाया और पूरे हॉल में छाए उस हल्के-फुल्के तनाव की जगह ठहाके गूँज उठे।
उनतीसवाँ भाग समाप्त, कहानी जारी है....