मंगरू ने बैठे-बैठे सोचा कि घर के लोगों के सुख-चैन की पूर्ति करना ही नियती है, क्या यही जीवन है। अगर यही जीवन है तो कैसा यह जीवन है। अपनी पसंद का कुछ कर नहीं सकता, कुछ खरीद नहीं सकता और तो और ठेले पर जाकर कूछ अच्छा खा भी नहीं सकता। तंग आया ऐसे जीवन से।
मंगरू ने इस बात को बड़ी गहराई से सोचा तो उसका ध्यान अपने गहरे मित्र प्रदीप पर गया। प्रदीप की स्थिती, मंगरू की स्थिती की तरह बंदीशों भरी नहीं थी। ऐसा मंगरू इस लिए सोच पर रहा था क्योंकि प्रदीप अपनी पत्नी और बच्चों से दुर प्रदेश में रहता था। वहीं काम करता था। 6 महीने साल भर में आता था, खर्चा करता था, तो पत्नी और बच्चे खुश होकर गुणगान करते थे। मंगरू को अपनी जिंदगी परेशानीयों भरी महसूस हो रही थी और प्रदीप का जीवन आनंद भरा। मतलब यह कि सुख-चैन जो प्रदीप का है वो मेरे सुख-चैन से अच्छा है, ऐस मंगरू को प्रतीत हो रहा था।
मंगरू की पत्नी छाया ने आवाज लगाकर कहा ’’ चंदु के बापू, आटा, तेल और दाल खत्म है, जाइए बाजार जाकर ले आइए।’’
मंगरू ने आवाज लगाकर कहा ’’ हाँ, थोड़ी देर में ले आउंगा। ’’
सारा सामान तो मंगरू ही जुटाता था लेकिन आज मंगरू को आभाष हुआ कि यह तो हुक्म है और मैं इस बंदिशों में ज्यादा दिन बंधने वाला नहीं हुं। कमाई मेरी और हुक्म मेरी पत्नी का। सबकी आवश्यकताओं की पूर्ति करने हेतू ही क्या मेरा जन्म हुआ है।
घर में तो इस तरह की बात सोचता ही था, लेकिन पंसारी की दुकान में काम करते वक्त भी मंगरू ऐसा ही सोचता था। अब मंगरू क्या सोचता था, इस बात से किसी को क्या मतलब और सोचने की फुर्सत है ही किसको। कुछ दिनों से मंगरू के रवैये को देखकर पंसारी ने सोच लिया और मंगरू का हिसाब-किताब कर कहा ’’ कल से तुमको यहाँ आने की जरूरत नहीं है। ’’ उस दिन इतना कुछ हो ही गया था कि एक ग्राहक ने कहा ’’ आपका यह आदमी कुछ न कुछ सोचता ही रहता है, दस बार पुछने पर एक बार में जवाब देता है, इसको कुछ मानसिक परेशानी है क्या। ’’
अपने निकाले जाने का मंगरू को दुःख तो हुआ मगर खुशी भी हुई कि आब वो बाहर, प्रदीप के पास जा पाएगा और प्रदीप की ही तरह आजादी से जीवन व्यतीत कर पाएगा, प्रदीप की तरह की काम चलाने भर रूपया रखकर घर भेज दिया करेगा। कम से कम किसी का धौंस तो नहीं सहना पड़ेगा।
मगर अगले ही क्षण मंगरू के मन में ख्याल आया कि छाया को राजी कर पाना आसान नहीं होगा। मंगरू घर पहूंचा तो छाया ने कहा ’’ अच्छा हुआ कि आप जल्दी आ गए, घर में आटा खत्म हो गया है, जाइए गेंहू सुखा दिए है, जाइए पीसवा कर ले आइए। ’’
मंगरू इन्कार तो नहीं कर सका लेकिन गेंहू की बोरी सिर पर उठाते ही उसको आभाष हुआ कि वजन बहूत ज्यादा है।
मंगरू ने खिज कर कहा ’’ और नहीं था, इसमें भर देती।’’ मंगरू की खिज ने छाया को भी झुंझला दिया, छाया ने भी झुंझला कर कहा ’’ अब गेंहूं नहीं है तो क्या मैं ही बैठ जाउं बोरी में। ’’
मंगरू ने कहा ’’ देख गुस्सा मत दिला, नही ंतो...........। ’’
’’नहीं तो क्या। ’’ छाया ने बड़ी ही शालीनता से पुछा। शालीनता इसलिए क्योंकि आदमी जब उग्र हुआ बैठा है तो सामने वाले को शांत-शालीन होना ही अच्छा। लेकिन छाया का शांत हो जाना मंगरू के उपर कोई काम नहीं कर सका। मंगरू को तो हालात पैदा करने थे, इसलिए उसने ओवर एक्टिंग करते हुए बोरी को नीचे पटक दिया और कहा ’’ जाओ, नहीं जाता, तुमको मील जाना है तो जाओ, मैं किसी का नौकर नहीं हुं। ’’ मंगरू ने दांत किंच कर भौंहें तान ली।
’’ आप मत जाइए न, मैं कभी झगड़ा नहीं करूंगी। ’’ छाया ने रूआंसी आवाज में पति से कहा लेकिन मंगरू पर इस बात को कोई असर नहीं हुआ।
अंततः वो चला गया, शहर प्रदीप के पास, अपना जीवन आजादी से व्यतीत करने के लिए, सुख-चैन से रहने के लिए।
सेठ जी से कह सुन कर प्रदीप ने मंगरू को काम पर रखवा दिया। दोनों साथ काम करने लगे, साथ आने-जाने लगे और साथ मिलकर खाना पकाने लगे। अपनी मर्जी से सोने और जागने का मंगरू ने खुब लुत्फ उठाया। मंगरू के आ जाने पर प्रदीप को अच्छा भी बहूत लगा और काम निकलता भी प्रतीत हुआ।
अकेलेपने से उकताया हुआ प्रदीप अब पारिवारिक जीवन का पक्षधर था। प्रदीप और मंगरू का काम ऐसा था कि एक आदमी दोनों के काम में मदद कर सकता था। मालिक से बात कर और मंगरू को समझा बुझा कर प्रदीप गाँव चला आया। अपना एकाकीपन दुर करने के लिए।
मंगरू की आजादी में थोड़ी कमी आयी क्योंकि अब सारा काम मंगरू को ही करना पड़ रहा था। लेकिन मंगरू ने यह सोचकर खुद को समझा लिया कि एक महीना कोई बहूत दिन नहीं है, जल्दी ही बीत जाएगा। मगर यह क्या एक महीना पन्द्रह दिन होेने को आया लेकिन प्रदीप नहीं आया। इस बात पर सेठ जी ने भी खरी-खोटी सुना दी। फोन करवाने पर प्रदीप ने स्वीकार करते हुए कहा कि ’’ अभी तीन महीना नहीं आउंगा, और मेरे हिस्से की तनख्वाह लेेते रहना। मैंने बहूत साल एकाकीपन झेला है, यहाँ पारिवारिक माहौल में स्वर्ग सा महसूस कर रहा हूं। यहाँ का सुख-चैन बहूत अच्छा है।
मंगरू ने कहा ’’ तो हमको एकाकीपन क्यों महसूस करवा रहा है। ’’
तीन महीने तो क्या, साल भर हो गए, मंगरू को अब एकाकीपन खलने लगा। गाँव की जिन्दगी और शहर की जिन्दगी में सिर्फ इतना फर्क था कि छाया की बात को धौंस समझता ही था, लेकिन सेठ जी के धौंस के कारण अक्सर खिज उत्पन्न हो जाती थी। पत्नी से प्यार भी मिलता था, मगर सेठ जी से प्यार तभी मिलता था, जब कोई ऐसा काम करवाना होता था जिस काम को सबने मना कर दिया होता था।
शहर के एकाकीपन ने मंगरू को साल भर में तोड़ कर रख दिया था। मंगरू ने निश्चय किया कि प्रदीप आए या न आए, गाँव जाकर उसको चाभी पकड़ा दुंगा और फिर लौटकर नहीं आउंगा।
आमने-सामने होन पर छाया और मंगरू दोनों ही रूआंसे हुए।
छाया ने कहा ’’ और चार-पाँच साल बाद आते।
मंगरू ने छाया को सीने से लगा कर कहा ’’ सुख-चैन क्या है और कहाँ है, मैं अब समझ गया हूं। ’’
समाप्त