स्कूल की छुट्टी और बारिश Vandna Sharma द्वारा लघुकथा में हिंदी पीडीएफ

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स्कूल की छुट्टी और बारिश



अदिति किचन में जल्दी-जल्दी हाथ चला रही थी। दीवार घड़ी में एक बज रहा था। डेढ़ बजे अर्णव की छुट्टी होनी थी।

बाहर सुबह से झिम-झिम बारिश हो रही थी, जो रुकने का नाम ही नहीं ले रही थी। काले बादलों ने दिन को ही शाम बना दिया था। अदिति ने चाय का कप वहीं छोड़ा, बालों का जुड़ा बनाया, छतरी उठाई और फ्लैट को लॉक करके सीढ़ियों से लगभग भागते हुए नीचे उतर गई। भूख लग रही थी, पर भूख से बड़ी थी बेटे की चिंता।

सड़कें लबालब भरी थीं। शकरपुर की सड़क तो जैसे नदी बन गई थी। वह सड़क के किनारे खड़ी होकर ऑटो को हाथ देने लगी। एक, दो, तीन... सब भरे हुए या फिर जाने को तैयार नहीं। जो रुके भी, उन्होंने तीन किलोमीटर के पाँच सौ रुपये माँग लिए।

पंद्रह मिनट हो गए। अदिति की चप्पलें पानी में भीग गईं। उसका मन घबराने लगा। "अर्णव गेट पर अकेला खड़ा होगा... सब बच्चे चले जाएंगे... वो सोचेगा मम्मी नहीं आई..."

तभी भीगता हुआ एक जाना-पहचाना ऑटो गुजरा। वही भैया जो पिछले हफ्ते रोज उसे स्कूल ले जाते थे। अदिति ने लगभग चीखते हुए आवाज लगाई, "भैया! भैया रुको!"

ऑटो रुका। अदिति भागकर पास गई, "भैया चलो न, प्लीज। बेटे को लाना है स्कूल से। बहुत देर हो गई है। आप जितने पैसे कहोगे दे दूंगी।"

ऑटो वाले ने उसके भीगे चेहरे और आँखों में तैरती ममता देखी। उसे तरस आ गया। बोला, "आ जाओ मैडम, बैठो।"

ऑटो पानी चीरता हुआ चल पड़ा। शकरपुर वाले पुल के नीचे तो पानी बोनट तक आ रहा था। ऑटो हिचकोले खा रहा था। अदिति ने कसकर हैंडल पकड़ लिया और आँखें बंद कर लीं। उसे लग रहा था जैसे ऑटो नहीं, कोई नाव है।

उसने धीरे से कहा, "बहुत खराब पानी है, है न?"

ऑटो वाले ने हंसकर कहा, "मैडम, डरो मत। हम रोज इसी में चलते हैं। आपके बेटे को ले आएंगे।"

उस एक वाक्य ने अदिति को बहुत हिम्मत दी।

स्कूल पहुँची तो देखा, सच में गेट पर बस दो-तीन बच्चे ही बचे थे। उनमें उसका अर्णव, अपना छोटा सा बस्ता सीने से लगाए, गेट के गार्ड के पास सहमा खड़ा था। अदिति को देखते ही उसकी आँखें चमक उठीं और वह "मम्मा!" कहकर दौड़ पड़ा।

अदिति ने भीगते हुए ही उसे गले से लगा लिया। सारा डर, सारी थकान एक पल में गायब हो गई।

"मम्मा, आप लेट हो गईं, मुझे लगा आप नहीं आओगी," अर्णव ने सुबकते हुए कहा।

"कैसे नहीं आती बेटा, मम्मा कहीं भी हो, तुम्हें लेने तो आना ही है न," अदिति ने उसके गाल पोंछे।

वापसी में अदिति ने कहा, "भैया, अक्षरधाम वाले रास्ते से चलो, उधर पानी कम होगा।"

अक्षरधाम वाले रास्ते पर सच में पानी नहीं था, बस हल्का ट्रैफिक था। अर्णव अब खिड़की से बारिश देखता हुआ खुश था। उसे ऑटो में बैठकर बारिश देखना अच्छा लग रहा था।

घर के सामने ऑटो रुका। अदिति ने पर्स से पाँच सौ का नोट निकाला और बिना कुछ बोले ऑटो वाले के हाथ में रख दिया।

ऑटो वाला चौंका, "अरे मैडम, मीटर से तो डेढ़ सौ ही हुआ है।"

अदिति मुस्कुराई, "भैया, आपने आज पैसे नहीं देखे। आपने एक माँ का दिल देखा। आपने मुझे मेरे बेटे तक सुरक्षित पहुँचाया और मेरे बेटे को मुझ तक। जब सबने मना कर दिया था, तब आप हाँ बने। इसका कोई मीटर नहीं होता। आप पूरे पैसे रख लो और झिक-झिक भी नहीं की, इसके लिए दिल से धन्यवाद।"

ऑटो वाला भी मुस्कुरा दिया। बोला, "भगवान आपके बच्चे को खुश रखे मैडम।"

ऊपर फ्लैट में आकर अदिति ने सबसे पहले हाथ जोड़कर भगवान को धन्यवाद दिया। अर्णव कपड़े बदल रहा था और अपनी नई पानी की बोतल दिखा रहा था।

अदिति उसे देख रही थी और सोच रही थी - कभी-कभी जिंदगी में यही होता है। मंजिल सिर्फ घर पहुँचना नहीं होती। मंजिल उस डर को पार करना होती है जो बारिश से ज्यादा हमारे मन में भरा होता है। उस दिन उसने समझा कि एक माँ के लिए सबसे बड़ा सुकून क्या होता है - बस अपने बच्चे को सकुशल घर ले आना। पैसे ज्यादा लगे तो लगे, कुछ सुकूनों का कोई मोल नहीं होता।
डॉ वंदना शर्मा नई दिल्ली