ध्रुव की तारा - भाग 20 Anamika द्वारा प्रेम कथाएँ में हिंदी पीडीएफ

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ध्रुव की तारा - भाग 20

ध्रुव की तारा
भाग - २०
लेखिका "अनामिका"
​ध्रुव की आँखें तारा पर ही टिकी थीं। उसके चेहरे पर नाराजगी और सवालों का गुबार साफ दिख रहा था। उसने बिना पलक झपकाए पूछा, "किसी को याद नहीं होगा... मतलब? तारा, साफ़-साफ़ बताओ कि तुम यहाँ अचानक बिना बताए क्यों आई? और यह पेस्ट्री... क्या चल रहा है यह सब?"
​तारा ने हल्के से ध्रुव का हाथ छुआ और शांत आवाज़ में कहा, "अरे ध्रुव, पहले थोड़ा शांत तो हो जाओ! मैं यहाँ परसों मम्मी-पापा की मैरिज एनिवर्सरी है न, उसी के केक का ऑर्डर देने आई थी। जब काउंटर पर तुम्हारी फेवरेट पेस्ट्री दिखी, तो रहा नहीं गया और ले ली।"
​तारा की बात सुनते ही ध्रुव का गुस्सा थोड़ा पिघल गया, लेकिन उसकी फिक्र अभी खत्म नहीं हुई थी। वह अब भी मुँह फुलाए खड़ा था।
​तारा ने मुस्कुराते हुए कहा, "अब यूँ मिस्टर एंग्री बर्ड मत बनो! चलो, हमारी फेवरेट जगह बैठते हैं और मजे से पेस्ट्री खाते हैं, वहीं बात करेंगे।"
​दोनों कॉलोनी के पार्क में बने अपने पसंदीदा कॉर्नर पर आ गए। ठंडी हवा चल रही थी और दोनों बेंच पर बैठकर पेस्ट्री का लुत्फ उठाने लगे।
​तारा ने पेस्ट्री की एक चम्मच लेते हुए कहा, "मैंने तुम्हें इसलिए नहीं बुलाया क्योंकि हम अभी-अभी ट्रेन के लंबे सफर से लौटे थे। तुम थके हुए थे, तो मैं तुम्हें परेशान नहीं करना चाहती थी।"
​ध्रुव ने उसकी तरफ देखा और गंभीर होकर बोला, "परेशानी कैसी तारा? तुम्हें अंदाज़ा भी है कि जब तुम घर पर नहीं मिली तो मैं कितना घबरा गया था? शाम हो रही थी, और तुम तो वैसे भी अकेले बाहर जाने से डरती हो... अगर तुम्हें कुछ हो जाता तो?"
​ध्रुव की आवाज़ में छिपी बेपनाह फ़िक्र देखकर तारा का दिल तेज़ी से धड़कने लगा। उसके मन में एक मीठा सा अहसास कौंधा—'यह मेरी कितनी परवाह करता है!' उसने ध्रुव के चेहरे को निहारा, जहाँ सिर्फ उसके लिए मोहब्बत और चिंता थी। लेकिन अगले ही पल तारा ने खुद को संभाला और मन ही मन सोचा, 'मैं भी क्या-क्या सोचने लगती हूँ... यह तो बस मुझे अपनी सबसे अच्छी दोस्त मानता है।'
​वहीं दूसरी तरफ, ध्रुव भी तारा के मासूम चेहरे को देखते हुए गहराइयों में खोया हुआ था। उसने सोचा, 'अगर इस डरपोक लड़की को कुछ हो जाता, तो मेरा क्या होता?' ध्रुव का दिल कह रहा था कि तारा उसके लिए दोस्त से बढ़कर है, लेकिन फिर उसने अपने दिल को समझाया, 'ध्रुव, ज्यादा उम्मीदें मत लगा... इसके लिए तो तुम सिर्फ एक पक्के दोस्त हो।'
​दोनों एक-दूसरे के पास बैठे पेस्ट्री खा रहे थे, लेकिन दोनों के दिलों में मोहब्बत का एक अनकहा तूफान उमड़ रहा था।
​दो दिन बाद, पूरे घर में एनिवर्सरी का एक अलग ही उत्साह छाया हुआ था। तारा ने सुबह ही अपनी समझदारी से आनंद और सुधा (मम्मी-पापा) को सरप्राइज का ज़रा भी शक न होने देने के लिए 'शॉपिंग और मंदिर दर्शन' के बहाने घर से बाहर भेज दिया था।
​जैसे ही आनंद और सुधा घर से निकले, ध्रुव अपने पापा विजय और मम्मी सुमन के साथ तारा के घर पहुँच गया। बचपन से ही दोनों परिवारों में बेहद गहरा रिश्ता था और विजय तो आनंद के लंगोटिया यार थे, इसलिए इस सरप्राइज पार्टी को खास बनाने में ध्रुव का पूरा परिवार भी दिल से जुट गया।
​"ध्रुव! ज़रा वो फेरी लाइट्स ऊपर दीवार पर लगा दो ना... और विजय अंकल, आप प्लीज़ वो गुब्बारे टेबल के पास रख दीजिए," तारा घर के बीचों-बीच खड़ी होकर किसी कुशल मैनेजर की तरह सबको काम बांट रही थी।
​ध्रुव सीढ़ी पर चढ़कर लाइट्स टांग रहा था और बीच-बीच में तारा को देखकर चिढ़ाते हुए मुस्कुरा देता। तारा जब-जब काम में व्यस्त होकर इधर-उधर भागती, ध्रुव की नज़रें बस उसी पर टिक जातीं। सुमन (ध्रुव की माँ) ने दोनों को चुपके से देखा और मुस्कुराते हुए विजय से धीरे से कहा, "देख रहे हो, ये दोनों साथ में कितने प्यारे लगते हैं... बिल्कुल जैसे एक-दूसरे के लिए ही बने हों।"
​सजावट लगभग पूरी हो चुकी थी, घर मोमबत्तियों और फूलों से महक रहा था। तभी बाहर से गाड़ी के रुकने की आवाज़ आई—आनंद और सुधा वापस आ चुके थे।
​मम्मी-पापा के घर के अंदर कदम रखते ही तारा ने चुटकी बजाई और पूरा घर मोमबत्तियों व रंग-बिरंगी लाइट्स की जगमगाहट से नहा उठा। दीवार पर 'हैप्पी एनिवर्सरी' का सुंदर बोर्ड और बीच में सजी तस्वीरों की लड़ी देखकर दोनों हैरान रह गए।
​"सरप्राइज!" तारा और ध्रुव ने पूरे परिवार के साथ मिलकर एक सुर में कहा।
​आनंद और सुधा की आँखें खुशी और अचरज से फटी की फटी रह गईं। तारा दौड़कर अपने मम्मी-पापा से लिपट गई। सुधा ने उसे गले से लगा लिया और आनंद की आँखों से खुशी के आँसू छलक पड़े।
​तारा के पापा (आनंद) ने भर्राई आवाज़ में कहा, "मुझे लगा था कि आज सब भूल गए हैं... लेकिन तुम लोगों ने इसे इतना खूबसूरत बना दिया।" उन्होंने सुधा का हाथ अपने हाथों में थाम लिया और आँखों में बेपनाह मोहब्बत लिए बोले, "सुधा, इतने साल कब और कैसे बीत गए, पता ही नहीं चला। तुमने हर सुख-दुख में मेरा जिस तरह साथ निभाया है, मैं हर जन्म में बस तुम्हारा ही साथ चाहता हूँ। आई लव यू।"
​यह अनपेक्षित और प्यारा इज़हार देखकर पूरा कमरा तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा। सुधा शर्म से लाल हो गईं और उन्होंने धीरे से अपने पति का हाथ दबा दिया।
​यह खूबसूरत मंज़र देखकर विजय (ध्रुव के पापा) भी भावुक हो गए। उन्होंने सुमन के कंधे पर हाथ रखा और मुस्कुराते हुए बोले, "क्यों जी, देख रही हो? पुराने चावल भी अब रोमांटिक हो रहे हैं! वैसे सच तो यह है कि सुमन, तुम्हारे बिना मेरी ज़िंदगी भी बेरंग ही थी। इतने सालों तक मुझे झेलने के लिए शुक्रिया, मेरी जान।"
​सुमन ने हल्के से उनके कंधे पर मुक्का मारा और हंस पड़ीं। पूरे घर में प्यार, मिठास और खुशियों का माहौल बन गया था।
​सबको इस तरह अपने-अपने प्यार का इज़हार करते देख ध्रुव कोने में चुपचाप खड़ा यह सब देख रहा था। उसका दिल तेज़ी से धड़कने लगा। उसने पास ही खड़ी तारा की तरफ देखा, जो अपने माता-पिता को मुस्कुराते हुए निहार रही थी।
​ध्रुव के मन में एक गहरा विचार कौंधा—'जब प्यार सच्चा हो, तो उसे दिल में छिपाकर रखने का क्या फायदा? नतीजे की फिक्र किए बिना मुझे भी तारा से अपने दिल की बात कह देनी चाहिए... चाहे जो हो, अब मैं और इंतज़ार नहीं करूँगा।'
​ध्रुव ने गहरी सांस ली और धीरे-धीरे कदम बढ़ाता हुआ तारा के करीब पहुँच गया। तारा ने मुड़कर उसकी तरफ देखा और मुस्कुराई, "क्या हुआ ध्रुव?"
​ध्रुव ने तारा की आँखों में झाँका। उसकी धड़कनें बेकाबू हो रही थीं, लेकिन आज उसकी आँखों में एक अजीब सा फैसला था...
​बीसवां भाग समाप्त, कहानी जारी है....