SCENE 5.
आसीगाह के कैदियों के बीच डॉक्टर हम्ज़ा का नया वजूद आ गया। वो किनारे बैठा हुआ शायद अपनी ही ग़लती पर ग़ौरफिक्र में था, शायद यहां पहुंचकर उसे समझ आ गया की उसे गुलशन में खिले फूल को तोड़ने की कोशिश नहीं करना चाहिए था, यहां की दीवारें इतनी सख़्त है कि इसपर किसी भी क़िस्म के वार का कोई असर नहीं होगा।
हम्ज़ा अपनी ग़लतियों पर अक्स डालने लगा। उसे अभी आसीगाह में ज़्यादा देर नहीं हुई थी इसलिए आसीगाह के सारे क़ैदी इसे घेर कर इसके गुनाह के बारे में तरह तरह के सवाल करने लगे थे मगर वो ख़ामोश बैठा रहा। क़ैद के शोर और अपने अंदर की ख़ामोशी के दरमियान उसे अपने नाम की पुकार सुनाई देने लगी
"हम्ज़ा.... हम्ज़ा।" आवाज़ सुनकर वो आसीगाह के दरवाज़े के क़रीब आ गया जहां सर से लेकर पैर तक काली चादर में लिपटी अनाबी खड़ी थी
"आप यहां क्या कर रही है?" उसने नाराज़गी से पूछा
"कबसे आवाज़ लगा रही हूं।" अपनी पहचान छुपाए रखने के लिए वो आहिस्ता आहिस्ता बोलने लगी "मैने तुमसे कहा था सही वक़्त का इंतज़ार करना है, फिर तुमने इतनी जल्दबाज़ी से काम क्यों लिया। तुमने अपने हाथों से सब ख़राब कर लिया।" उनकी बात हम्ज़ा को पसंद नही आई
"आपके कहने पर, आपकी वजह से मैंने उसे चाहने की हिम्मत किया ये जानते हुए भी की वो शाही खानदान से ताल्लुक़ रखती है। उसकी तकलीफ़ से मेरा दिल बेक़ाबू सा हो गया था।"
"तो क़ाबू कर लेना चाहिए था। क्या मिला तुम्हे अब सब बिखेर कर।" अनाबी ने चिढ़कर कहा "हमारे सारे मनसूबो पर तुमने पानी फेर दिया। अब न मैं अहलम को मना पाऊंगी तुम्हारे लिए और न रानिया को राइद मिल सकेगा, अब तुम बताओ जब मैं ब्लैक कोर्ट तक पहुंचूंगी ही नही तो कैसे मैं तुम्हें तुम्हारी मंज़िल तक पहुचाऊंगी।"
"मुझे माफ़ कर दीजिए, मेरा मक़सद ये नही था। ये सारी ग़लत फहमिया अम्हेल की वजह से हुई जिसने हमारे बीच में आकर सब तहस नहस कर दिया।" हम्ज़ा ने सारा इल्ज़ाम बिल्कुल सफ़ाई से अम्हेल पर डाल दिया
"जो होना था हो गया, अब मुझे कोई और रास्ता ढूंढना होगा। जबतक तुम्हारी क़ैद ख़त्म नहीं होती मैं तुम्हारे लिए कुछ नही कर सकती लेकिन अपनी ख़ादिम कंगना को वक़्तन भेजती रहूंगी ख़ैर ख़बर के लिए। अभी चलती हूं मैं।"
हम्ज़ा से हुई ग़लती की वजह से उनके बनाए मनसूबे उन्हें नाकाम होते नज़र आने लगे अपनी नाकामी की पहली मंज़िल की मायूसी की नाराज़गी उन्होंने हम्ज़ा पर उतार दिया लेकिन उसकी वजह से आसीगाह के दर पर आकर उनके मन में अम्हेल का किरदार खटकने लगा, उनके मन में ये बात बैठ गई की उनका पहला और कारगर मनसूबा अम्हेल की वजह से नाकाम हुआ। वो चुपके से आसीगाह से महल को पलट गईं।
आज से पहले महल में कभी इतनी ख़ामोशी तारी ना हुई थी। शाम होने को आ गई मगर एहसास हो रहा था कि महल के अंदर की आबो-हवा, चरिंद-परिंद और ये लोग अभी तक मातम मना रहे है। ये चलती हवा भी ठहरी लग रही थी। लबों पर ख़ामोशी थी और दिल में तूफ़ान उठा हुआ था, तूफ़ान जो उठती आंधी को अपने साथ बहा ले जाना चाहता था। सभी इस इंतज़ार में थे कि कब और कैसे महल में छाई हुई उदास संगीन ख़ामोशी दम तोड़ेगी
"रुकमणी दीदी.....रुक्मणि दीदी.....।" आख़िरकार दिन ख़त्म होते होते कुसुम की झिलमिलाती, चंचल, पुरसुकून आवाज़ महल के दरो दीवारों को गूंजती हुई सुनाई दी "रुकमण.....।"
"क्या हुआ कुसुम यूं चिल्ला चिल्ला कर क्यूं पुकार रही हो मुझे।" मैदान में खनखनाती हुई तलवारों के बीच में से एक बुलंद आवाज़ ने उनकी ऊंची खनक को कम कर दिया।
उसकी आवाज़ सुनकर कुसूम ने महल के ऊंचे छज्जे पर से मैदान में झांककर रुक्मणि को तेज़ आवाज़ में अम्मा साहब का पैग़ाम दिया
"आपके लिए फरमान आया है की आपको बावर्चीखाने में जाकर बीबिजी के लिए बन रहा काढ़ा और गर्म तेल पूरी ज़िम्मेदारी से ऐवान-ए-सद्र पहुंचाना है।"
"हा मैं पहुंचा देती हूं।" रुक्मणि फ़ौरन बावर्ची खाने की तरफ़ चली गई और कुसुम अपना काम पूरा करके ऐवान-ए-सद्र लौट आई
"मैंने पैग़ाम पहुंचा दिया।"
"तुम अम्हेल की तरफ़ गई थी?" अम्मा साहब ने पूछा
"दोपहर में, वो हाथ में ख़त लिए हुए काफ़ी परेशान लग रही थीं। मैने उनसे बात किया पर उन्होंने कुछ बताया नही।"
"बाबा ने मैथिली और तुम्हे एक ज़िम्मेदारी दिया था।"
"उसे अंजाम में ला दिया गया है।"
"उससे कुछ मालूमात हासिल हुई?"
"वो हमलोगों से बातें तो करती हैं और हवेली की भी बातें करती है मगर उन्होंने कभी उस बारे में कोई ज़िक्र नहीं किया।"
"ठीक है अब तुम बाबा के पास जाओ वो तुम्हे याद कर रहे थे।" कुसुम चली गई
"बाबा आप सुबह से गुम बैठें हुए हैं, आप जानते हैं सब आपके लिए कितना परेशान हो रहे हैं?"
"नहीं मैं बिल्कुल ठीक हूं।" सुबह से कुसुम को बाबा का बस एक ही जवाब मिल रहा था और हर बार उसके साथ एक ही सवाल
"क्या हया आ गई ? तुम एक दफ़ा उसे देख लेना और उसका ख़्याल रखना।"
"आप परेशान मत होइए बाबा मैं अभी देख आती हूं।" बाबा की परेशानी कम करने के लिए वो हया को देखने इक़ामतगाह चली गई। कुसुम हया के कमरे में पहुंच गई जो अम्हेल के कमरे से थोड़ी दूर पर ही था। ख़ादिमा हया का कमरा पूरी तरह ठीक कर चुकी थी। हया अपने बिस्तर पर पैरों को समेटे चुपचाप बैठी नज़र आई।
"आप ही हैना जिसके बारे में बाबा मुझसे सुबह से पूछ रहे है?" कुसुम की आवाज़ पर हया ने पलट कर उसकी तरफ़ देखा "मेरा नाम कुसुम है और मैं ही हूं जो महल में अकेले लोगों को तन्हा नहीं छोड़ती।" अपने अंदाज़ में उसने अपना तार्रुफ़ करवाया फिर पूछा "आपको किसी तरह की कोई परेशानी तो नहीं?"
"नहीं मुझे कोई परेशानी नहीं है।"
"अगर हुई तो आप बेझिझक मुझे याद कर सकती हैं।" उसकी बात पर हया मुस्कुराने लगी "मैं हाज़िर हो जाऊंगी। लेकिन फिलहाल अभी मैं कुछ मसरूफ़ हूं इसलिए आपसे कुछ देर बाद मिलूंगी।"
उसका बेतकल्लुफ अंदाज़ हया को भा गया, उसे देखकर उसने पूछा
"तुम्हारी उम्र क्या है?"
"कुछ महीनों में मैं पूरी 20 साल की हो जाऊंगी।"
"इतनी सी उम्र में इन कंधों पर इतनी जिम्मेदारियां?" उसने मज़ाकना अंदाज़ में कहा
"हां न मैं भी तो यही सोचती हूं, लेकिन क्या करूं मेरे बिना काम भी तो नहीं चलता।"
"फ़िर तो मुझे सोचना पड़ेगा तुमसे दोस्ती करूं या नही।"
"बिल्कुल नही, अभी से मैं आपकी दोस्त।" उसने कहा "अब तो आपको ज़रूरत में मुझे ही याद करना पड़ेगा।"
"हां फ़िर तो तुम्हे याद करना लाज़िम हो गया। अब मुझे ज़रूरत होगी तो मैं बता दूंगी।" उसने मुस्कुराकर कहा
"आप रुक्मणि दी को आवाज़ दीजिएगा, वो अक्सर इर्द गिर्द ही रहती हैं, आपकी मदद करेंगी।.. अभी तो आप आराम करिए।"
"ठीक है।" हया को मुस्कुराता देखकर कुसुम चली गई।
कुसुम शेख़ बाबा के पास जाते जाते अम्हेल की तरफ़ पलट गई और उसे आहिस्ता से आवाज़ लगाया
"अम्हेल आपी क्या कर रही है आप?"
"किताबें पढ़ रहे है।" किताब के वरक़ पलटते हुए उसने बताया
"कौन सी किताबें?" बिस्तर पर बैठ कर कुसुम ने किताब में झांकते हुए पूछा
"जो शेख़ बाबा ने दिया है।"
"आप हमेशा उसमें ही क्यों डूबी रहती है, कुछ ग़ज़लें, शेरो शायरी सुनाइए ना।"
"अभी दिल नही कर रहा।"
"पर मेरा दिल सुनने का कर रहा है।"
"हमें बाबाजान याद आ रहे हैं।"
"मुझे भी मां याद आ रही।" कुसुम ने नर्मी से कहा
अम्हेल उसका चेहरा देखने लगी "इसलिए मैं सुनना चाह रही हूं।" अम्हेल ने उसकी बात मान लिया
"तुम्हें ग़ज़लें सुननी है?"
"हां, ग़ज़लें हीं।"
"ठीक है फिर....।" हवेली से लाई हुई एक किताब अपने हाथों में उठाकर उसे खोलकर अम्हेल पढ़ने लगी
"..... ज़रा ठोकरों को सांस तो ले लेने दो
आह की चीखें जाएंगी हर कानों में
बह कर भी आंसू न बह पाएंगे
बेपनाह उठेगा दर्द सबके सीने में,
जब आग के शोले भड़कने लग जाएंगे
बरबादियां ही लाएंगे हर चोट के बदले
रंजिशे बढ़ेंगी, अज़ीयतें मिलेंगी
नफ़रतें, अदावतें दहकने लगेंगी,
थम जाएगा शोलो पे हर दौर का बाग़ी
मिट जाएगा आंधी में हर दौर का बाग़ी...।"
अम्हेल इसे मदहोशी से पढ़ने लगी और कुसुम ने महो होकर सुना।
ग़ज़ल ख़त्म होने के बाद भी वक़्त वहीं ठहर सा गया। दोनो के मन किताब के उस वरक़ में काफ़ी देर तक रहे। कुसुम ग़ज़ल सुनकर ख़ामोशी से बिना आवाज़ किए कमरे से चली गई और शेख़ बाबा के पास आकर उन्हें हया का हाल सुना दिया।
उसकी आवाज़ो हरकत में अजीब सी कसक मिली जो बाबा तक पहुंच गई मगर इस वक़्त वो ख़ामोश रह गए, कुसुम बाबा की तरफ़ पीठ करके कंबल ओढ़ कर लेट गई। उसपर तारी ये ख़ामोशी उन्हें बहुत अलग लगी, ऐसी कसक तो उसमें पहले कभी नही पाई गई।