ध्रुव की तारा
भाग - १६
लेखिका "अनामिका"
ध्रुव के वापस आने की खुशी में दोनों परिवारों ने मिलकर एक छोटी सी गेट-टुगेदर पार्टी रखी। बाहर से तरह-तरह का स्वादिष्ट खाना मंगवाया गया था। सब लोग ड्राइंग रूम में बैठकर बातें कर रहे थे, हँस-बोल रहे थे और बीच-बीच में ध्रुव और तारा की नोक-झोंक भी चालू थी।
इसी माहौल के बीच, सुमन जी ने अचानक तारा का हाथ अपने हाथ में लिया और मुस्कुराते हुए बोलीं, "सुधा, जिस तरह से तारा ने मेरी सेवा की है न, मेरा तो दिल करता है कि इसे हमेशा के लिए अपनी बहू बनाकर अपने ही घर में रख लूँ!"
यह सुनते ही सुधा जी हँस पड़ीं और बोलीं, "अरे सुमन, इसमें पूछने वाली क्या बात है? अगर तुम्हारी यही मर्जी है तो हम कौन होते हैं ना कहने वाले! वैसे भी ध्रुव जैसा समझदार और प्यारा लड़का हमें ढूँढने से भी नहीं मिलेगा।"
दोनों माताओं की यह बात सुनकर विजय जी और तारा के पापा एक-दूसरे को देखकर बस मुस्कुरा दिए। उन्हें समझ आ रहा था कि दोनों मम्मियों को बच्चों के मन की बात का अहसास हो चुका है, और वे एक तरह से ध्रुव और तारा के रिश्ते को अपनी अनकही सहमति दे रही थीं।
यह सुनते ही तारा का दिल ज़ोरों से धड़कने लगा। उसे तो अपनी भावनाओं का पूरा अहसास था, इसलिए वह मारे शर्म के लाल हो गई और नज़रें झुका लीं।
तभी ध्रुव ने माहौल को हल्का करने के लिए बीच में टोकते हुए कहा, "क्या माँ... आप भी न कुछ भी बोलती रहती हो! भला इस चश्मिश से कौन शादी करेगा?"
"तू रुक ध्रुव, तुझे तो मैं बताती हूँ!" तारा ने तुरंत बात संभाली और नकली गुस्से में ध्रुव को मारने दौड़ी। दोनों लड़ते-झगड़ते बाहर की तरफ भाग गए, जबकि पीछे बैठे दोनों परिवार उनके इस बचपने पर ठहाके लगाकर हँस पड़े।
इसके बाद शाम को दोनों स्विमिंग पूल के पास जाकर बैठते हैं। ठंडी हवा के बीच तारा पूछती है, "ध्रुव... तूने स्विमिंग क्यों छोड़ दी? तू तो नेशनल जाने का सपना देखता था ना?"
ध्रुव ने पानी की लहरों को देखते हुए कहा, "तारा, जब माँ पर इतनी बड़ी मुसीबत आई और मुझे पता तक नहीं चला, तब मुझे समझ आया कि सपनों से पहले परिवार और एक सुरक्षित करियर ज़रूरी है। अब पढ़ाई पर ध्यान देकर जल्द से जल्द सेटल होना ही मेरी प्राथमिकता है।"
तारा की आँखें ध्रुव के प्रति सम्मान से भर गईं। ध्रुव ने फिर मुस्कुरा कर पूछा, "वैसे, इन महीनों में तूने मुझे मिस भी किया या नहीं?"
तारा ने अपनी तड़प छिपाते हुए चिढ़ा कर कहा, "तुझे क्यों मिस करूंगी? मुझे और भी बहुत काम थे!"
ध्रुव हँसते हुए बोला, "अच्छा! पर सच कहूँ तो मैंने तुझे बहुत मिस किया चश्मिश।"
बात-बात में ध्रुव ने अचानक पूछा, "अच्छा, सिया कैसी है? उससे बात होती है क्या?"
सिया का नाम सुनते ही तारा का मूड खराब हो गया। उसने रूखे स्वर में कहा, "तेरे जाने के बाद उसने स्कूल बदल लिया था, अब मेरी उससे कोई बात नहीं होती।"
ध्रुव ने उसकी खीझ भांपकर कहा, "अच्छा छोड़ उसे! १२वीं के बाद तू मेरे ही कॉलेज में एडमिशन ले ले, वहाँ इंग्लिश लिटरेचर का बहुत अच्छा स्कोप है। हम साथ रहेंगे।"
तारा मन ही मन तो बेहद खुश हुई, पर नखरे दिखाते हुए बोली, "कोई ज़रूरत नहीं है! मैं क्यों आऊँ तेरे कॉलेज?"
अगले कुछ दिन इसी खट्टी-मीठी नोक-झोंक में बीत गए। आखिर में ध्रुव की छुट्टियों के खत्म होने का दिन आ गया। स्टेशन पर बेमन से और अपनी आँखों में आँसू छिपाकर तारा ने ध्रुव को अलविदा कहा।
ध्रुव के जाने के बाद दोनों की जिंदगी एक बार फिर से अपनी-अपनी दिनचर्या की ओर लौट आई। ध्रुव अपनी कॉलेज की पढ़ाई में पूरी तरह जुट गया, लेकिन इस बार उसके मन में एक स्पष्ट मकसद था—वह तारा के आने से पहले हर तरह से खुद को काबिल और मजबूत बनाना चाहता था, ताकि जब तारा उसके शहर आए, तो वह उसे हर खुशी और सुरक्षा दे सके।
उधर तारा ने भी ध्रुव के कहे उन शब्दों—"तू मेरे ही कॉलेज में एडमिशन ले ले"—को अपना लक्ष्य बना लिया था। 12वीं की परीक्षा सिर पर थी, इसलिए उसने दिन-रात एक करके पढ़ाई शुरू कर दी। ध्रुव से दूर रहने का अकेलापन अब उसकी सबसे बड़ी ताकत बन चुका था। दोनों के बीच लंबी बातचीत भले ही कम हो गई थी, लेकिन दूरियों ने उनके इंतजार और मिलने की तड़प को और गहरा कर दिया था। दोनों ही बस उस दिन की राह देख रहे थे, जब 12वीं के इम्तिहान खत्म होंगे और उनकी जिंदगी का नया सफर एक साथ, एक ही कॉलेज की चौखट से शुरू होगा।
सोलहवाँ भाग समाप्त, कहानी जारी है....