कहानी - अपराजिता
संध्या का समय था। दिन ढल चुका था, अंधेरा अभी पूरी तरह बना नहीं था। अपराजिता, जिसे सब प्यार से सुहानी कहते थे, बेचैनी से हॉल में इधर-उधर टहल रही थी। उसके पति रोहन अभी ऑफिस से आए नहीं थे। बार-बार घबराहट में वह घड़ी देख रही थी। मन में अजीब-अजीब विचार आ रहे थे। आज रोहन को आने में बहुत देर हो गई थी।
तभी डोरबेल बजी। उसने दौड़कर दरवाजा खोला। रोहन मुंह लटकाए खड़ा था। बैग कंधे पर था, चेहरा उतरा हुआ और आँखें थकी हुईं।
सुहानी ने घबराते हुए पूछा - "क्या हुआ रोहन, सब ठीक है ना? तुम्हारी तबीयत तो ठीक है? अंदर आओ।"
रोहन ने बैग सोफे पर पटका, टेबल पर रखा पानी का गिलास उठाया और एक ही सांस में पी गया। गिलास मेज पर रखकर उसने एक लंबी सांस ली और कहा - "आज मैंने इस्तीफा दे दिया। बॉस से बहस हो गई थी। रोज-रोज के तानों से परेशान हो गया था। गुस्से में आकर इस्तीफा तो दे दिया लेकिन अब क्या होगा? घर का खर्चा कैसे चलेगा? बच्चे की फीस, कमरे का किराया, बिजली का बिल, घर का राशन, कैसे होगा सब?"
सुहानी ने उसका हाथ अपने हाथ में लिया और उसे धैर्य बंधाते हुए कहा - "रोहन, परेशान होने से समस्या हल नहीं होती। जो होना था हो चुका, अब आगे की सोचो। तुम काबिल हो, सभी कंपनियों में अर्जी डालते रहो, जल्दी ही नई जॉब मिल जाएगी। हम दोनों मिलकर संभाल लेंगे।"
उस रात सुहानी को नींद नहीं आई। महानगरीय जीवन में बेरोजगारी एक अभिशाप है, ये वो जानती थी। उसे सबसे ज्यादा चिंता बच्चे की पढ़ाई की हो रही थी। कुछ भी हो जाए, बच्चे की पढ़ाई नहीं रुकनी चाहिए। यही सोचते-सोचते कब आँख लग गई पता ही नहीं चला।
अगली सुबह सुहानी ने हिम्मत नहीं हारी। उसने अपनी पड़ोसन से उसके बच्चों को ट्यूशन पढ़ाने के लिए बात की। एक कोचिंग सेंटर पर भी बात की। संयोग देखिए, उसी दिन उसकी एक दोस्त का फोन आ गया, अपनी बेटी को ट्यूशन पढ़ाने के लिए। सुहानी ने तुरंत हाँ कह दी। यहीं से उसकी नई लड़ाई, उसकी अपराजिता बनने की कहानी शुरू हुई।
सुहानी बहुत मेहनती थी। अब उसका दिन सुबह चार बजे शुरू होता था। उठकर झाड़ू-पोंछा, नहाना, पूजा-पाठ, फिर पति और बेटे के लिए टिफिन पैक करना। बेटे को स्कूल भेजकर, कपड़े धोकर वह ट्यूशन पढ़ाने चली जाती। धीरे-धीरे उसकी ट्यूशन चलने लगी और घर में थोड़ा सहारा आने लगा।
एक शाम जब वह ट्यूशन पढ़ाकर घर लौट रही थी, उसकी नजर एक क्लीनिक के बाहर लगे विज्ञापन पर पड़ी। उस पर लिखा था - "एक योगा टीचर की आवश्यकता है।"
सुहानी ने सोचा, योग तो वह सालों से करती है, अगर एक घंटा निकाल कर सिखा सके तो घर में थोड़ी और मदद हो जाएगी। वह हिम्मत करके क्लीनिक के अंदर गई, अपना परिचय दिया। थोड़ी औपचारिक बातचीत के बाद डॉक्टर उसकी सादगी और ज्ञान से प्रभावित हुए और उसे जॉब मिल गई।
डॉक्टर ने प्रस्ताव रखा, "सुहानी, तुम्हें यहीं हॉस्पिटल में आकर मरीजों को योग सिखाना है। मुझे योग पर एक किताब भी लिखवानी है, उसका संपादन भी तुम्हें ही करना है। दिन में कुल चार घंटे - सुबह दस से बारह और शाम छह से आठ बजे तक।"
सुहानी ने सहमति दे दी। अब उसकी दिनचर्या और भी कठिन हो गई। सुबह चार बजे उठना, घर के काम, बेटे को स्कूल भेजना, ठीक दस बजे ऑफिस पहुँचना। साढ़े बारह बजे घर आकर बेटे को स्कूल से लाना, खाना बनाना, उसे पढ़ाना, फिर चार बजे ट्यूशन पढ़ाने जाना, वहाँ से सीधे छह बजे ऑफिस जाना और सवा आठ बजे थकी-हारी घर पहुँचना। घर पहुँचते ही फिर बर्तन मांजना, खाना बनाना। सोते-सोते रात के ग्यारह बज जाते।
इधर रोहन सारा दिन इधर-उधर घूमता, फोन पर नौकरियों के लिए आवेदन करता रहता। अच्छी नौकरी के इंतजार में छह महीने ऐसे ही बीत गए। बुरा वक्त लंबा होता जा रहा था और सुहानी अकेले ही घर की गाड़ी खींच रही थी।
और फिर वो अनहोनी हुई।
एक सुबह सुहानी घर का काम निपटाकर ऑफिस जा रही थी। घर से कुछ ही दूर चली थी। सड़क पर एक आदमी अपने कुत्ते को घुमा रहा था। अचानक कुत्ता बेकाबू हुआ और पीछे से तेजी से दौड़ता हुआ आया।
अनहोनी होनी थी सुहानी के साथ। कुत्ते ने तेजी से आकर उसका दायां पैर पकड़ लिया। उसके पाँचों दाँत पैर में गड़ गए। सुहानी को कुछ समझ नहीं आया, दर्द से उसकी चीख निकल गई। वह वहीं पैर पकड़कर बैठ गई, उसे चक्कर आने लगे। सड़क पर लोग आ-जा रहे थे, पर कोई भी उसकी मदद के लिए आगे नहीं आया। पैर से खून बह रहा था।
बड़ी हिम्मत करके वह खड़ी हुई। कुछ दूरी पर ही उसका क्लीनिक था। वह लंगड़ाते हुए वहाँ पहुँची। डॉक्टर अभी आए नहीं थे, सिर्फ नर्स थी। उसने कहा, "दीदी, मुझे कुत्ते ने काट लिया है, डॉक्टर को बुला दो।" नर्स ने तुरंत डॉक्टर को फोन किया और कहा, "जब तक डॉक्टर आते हैं, तुम घर जाकर घाव को पानी से धो लो और कपड़े बदल आओ, खून से पूरी पेंट खराब हो गई है।"
सुहानी हिम्मत करके घर पहुँची। घर पर सिर्फ उसका बेटा था, रोहन कहीं बाहर गया था। बेटा माँ की ऐसी हालत देखकर घबरा गया। पैर में पाँचों दाँत घुसने से गहरा घाव हो गया था। सुहानी अपने आँसू रोक नहीं पाई और फूट-फूट कर रोने लगी।
कुछ देर रोने के बाद उसे लगा उसकी मदद करने वाला कोई नहीं है, उसे खुद ही अपनी रक्षा करनी है, खुद ही अपना सहारा बनना है। वह उठी, साबुन से घाव धोया, कपड़े बदले और फिर मरहम-पट्टी के लिए क्लीनिक गई। डॉक्टर ने पट्टी बाँधी और दो इंजेक्शन लगाए - एक रेबीज का और दूसरा दर्द निवारक। जख्म गहरा था, सिर घूम रहा था। फिर भी दवा लेकर वह घर आई और आते ही बिस्तर पर बेहोश सी गिर पड़ी।
बेटे ने घबराकर पिता को फोन किया। जब होश आया तो देखा रोहन और बेटा पास बैठे हैं। एक सप्ताह तक रोज उसकी पट्टी बदली गई और रेबीज के इंजेक्शन समय पर लगे।
सुहानी मानसिक रूप से बहुत मजबूत और हिम्मत वाली औरत थी। इतना दर्द होने के बाद भी उसने अगले दिन से ही ऑफिस जाना शुरू कर दिया। वह जानती थी, पति बेरोजगार है, घर बैठकर आराम करना उसके नसीब में नहीं है। अगर वह रुकेगी तो घर कैसे चलेगा?
लगभग एक वर्ष बाद आखिरकार रोहन की नौकरी लगी। सुहानी को लगा अब हालात सुधरेंगे, पर रोहन सुधरा नहीं था।
सुहानी की सारी सैलरी घर के किराए, बच्चे की फीस और राशन में ही खत्म हो जाती। रोहन घर खर्च के लिए पैसे नहीं देता, बल्कि उल्टा एक-एक रुपये का हिसाब लेता - कहाँ खर्च किए? क्यों खर्च किए? अगर सुहानी अपने लिए बिना पूछे कुछ ले आती तो ताने देता, झगड़ा करता।
सुहानी को लगा रोहन उसकी सादगी और चुप्पी का फायदा उठा रहा है। वह सुबह से रात तक घर का काम भी करती है, बाहर ऑफिस का काम भी करती है, ट्यूशन भी पढ़ाती है, फिर भी रोहन की नजर में उसकी कोई इज्जत नहीं है। चौबीस घंटे वह घर के लिए पिसती रहती, फिर भी वह अपने लिए अपनी पसंद की एक ड्रेस तक नहीं खरीद सकती।
अब रोहन की भी नौकरी लग चुकी थी। उसने एक बड़ा फैसला किया - वह क्लीनिक की नौकरी छोड़ देगी। अब उसे इस घुटन से निकलना था।
रात को जब रोहन घर आया तो सुहानी ने शांत स्वर में अपना फैसला सुना दिया। रोहन को यह बिल्कुल पसंद नहीं आया। वह उसे बुरा-भला कहने लगा, ताने देने लगा। पर सुहानी इस बार चुप रही। उसने कोई जवाब नहीं दिया। मन ही मन उसने तय कर लिया था - बस, बहुत हो गया। अब रोहन से कोई बहस नहीं करनी है, बस अपने लिए जीना है।
उस दिन से सुहानी ने एक नई जिंदगी शुरू की। वह चुपचाप अपना फर्ज निभाती रही। घर के सारे काम करती, ट्यूशन पढ़ाने भी जाती, लेकिन रोहन से कभी कुछ नहीं कहती।
रोहन को लगता था कि सुहानी उससे डरकर चुप है, लेकिन सच्चाई कुछ और थी। सुहानी ने बिना शोर मचाए, बिना विरोध किए, अपने लिए जीना सीख लिया था।
जिंदगी की राह आसान नहीं थी, पर अब उसने शोर नहीं, सुकून को चुना था। खाली समय में वह योग करती, अपने छोटे-छोटे पौधों को पानी देती और अपनी ही एक नई, शांत दुनिया में खोई रहती।
उसे अब जीवन का एक गहरा सच समझ आ गया था - जब हम परिस्थितियों को नहीं बदल सकते, तो खुद को बदल लो और शांत रहना सीख लो।
खामोशी अब उसे बुरी नहीं लगती थी, बल्कि अच्छी लगने लगी थी। शायद अब उसे सच में सुकून का असली अर्थ समझ आ गया था।
वही तो है अपराजिता - जो हालातों से हारती नहीं, बल्कि हालातों को हराकर जीना सीख लेती है।
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