अफरातफरी मचते ही लोग सिर पर पाँव रख कर भागे। लोगों के कदमों की तेज ध्वनी गुंजायमान थी। कम्पन ऐसा हो रहा था मानो धरती काँप रही हो। कदमों को कहाँ मालूम था कि कुचला जाने वाला आदमी कौन है और कहाँ का है। भाग तो सभी रहे थे मगर बीच बीच में कोई अचाकन आवाज लगा जाता था कि जल्दी निकलो, जल्दी निकलो। ’’ देखते ही देखते पुरा परिसर खाली हो गया। लोग यहाँ से निकल कर भागे हैं इस बात की गवाही टुटी हुई चप्पलें और पड़ हुआ एक ही पाँव का जुता दे रहा था।
राकेश अपार्टमेंट की तीसरी मंजील पर ऋण योजना का कार्यालय लोगों के लिए दहशत का केन्द्र बन गया। आखिर लोगों को आर्थिक लाभ और राहत प्रदान करने वाली संस्था दहशत का पर्याय क्यों बन गयी, यही जानने की उत्सुकता उनलोगों में बढ़ी, जो कि भूक्तभागी नहीं थे। सी.आई.डी. वालों को देखकर लोगों की भीड़ वहाँ जमा होने लगी। कुछ भुक्तभोगी भी वहाँ आ गए।
दस्ताना पहने हुए हाथ तहकीकात में जुट गए।
’’ हाँ तो मोहतरमा, पुरी घटना का व्यौरा आप अपनी जुबानी दिजीए। फुटेज तो हमलोग देख ही लेंगे। ’’ सी.आई.डी. चीफ ने अगला प्रश्न किया ’’ गर्मी में पसीना निकलना तो समझ में आता है, मगर ए.सी. कमरे में बैठकर पसीना आना, यह बात हजम नहीं हो रही है। ’’
शकीना ने ललाट का पसीना हथेली से पोंछ कर , एक गिलास पानी एक ही बार में गटक लिया। शकीना ने अपने जवाब में कहा ’’ मैं यहाँ रिसेप्शन काउंटर पर थी, अचानक लोग उस कमरे से निकल कर भागने लगे। ’’
अधिकारी के ललाट पर बल पड़ा और उन्होंने पुछा ’’ शाॅट सर्किट हुआ था, बम की खबर थी या कोई भुतीया घटना हुई थी जो लोग भागने लगे। ’’
शकीना सकपकायी और बोली ’’ नहीं सर, ऐसी किसी भी घटना की जानकारी मुझे नहीं है, ऐसा कुछ भी नहीं हुआ होगा। ’’
सी.आई.डी. विभाग के एक सदस्य ने एक फाईल दिखाते हुए कहा ’’ देखिए सर, इस पर खुन लगा हुआ है। खुद का रुमाल पर फैल जाना , खुन की ताजगी को ब्यां कर रहे थे। अधिकारी के शक की सुई किसी और बात पर घुमी। मामले की पेचीदगी का एहसास हो आया और यह भी एहसास हो आया कि खुन है तो जिस्म भी होगा या तो फिर लाश होगा।
लाश छुपाने में दिमाग का पुरजोर इस्तमाल किया गया था, डाॅग स्कवायड को आने में देरी न होती तो लाश का पता भी जल्दी चल जाता, अधिकारी के समक्ष पेचीदगी हल हुई तो और बढ़ी, विश्वास जगा कि लाश मिला तो कातील भी होगा।
पुछताछ के लिए ऋण वसूलने वाले दो सेवकों को बुलाया गया। तालाशी के दौरान दोनों की जेब से न चाकु मिला और न पिस्तौल। मगर चेहरे पर उभर आयी भय की लकीर ने सी.आई.डी. का काम आसान कर दिया।
जुबान खामोश रह सकती है मगर चेहरा कभी छुपा नहीं सकता है। सिलसिलेवार धंग से प्रश्नों की बौछार ने मामले की गुत्ठी को धीरे-धीरे सुलझा लिया। गिरफ्त में आते ही कातील ने पीछा छुड़ाना चाहा यह कह कर ’’ मैंने जानबुझ कर नहीं किया है। ’’
सी.आई.डी. अधिकारी ने कहा ’’जान बुझकर किया हो या अन्जाने में, गुनाह तो तुमने किया ही है। ’’
ऋण विभाग का रिकवरी एजेंट धर्मा का गुनाह तय हो गया है। वो अपनी सजा काट रहा है। ऑफिस हेड अब भी फरार है।
समाप्त।