कहानी - कथनी और करनी
रोहित बहुत ही धार्मिक व्यक्ति था। सबकी सहायता के लिए हमेशा तैयार रहता। मोहल्ले में उसकी गिनती एक अच्छे बेटे और अच्छे भाई के रूप में होती थी, पर वह एक अच्छा पति कभी न बन सका। वह राधा रानी का परम भक्त था, हर समय मुख पर राधे-राधे का जाप, माथे पर तिलक और हाथ में माला। लेकिन जो न्याय और प्रेम वह बाहर की दुनिया को देता था, वही अपनी पत्नी को न दे सका।
उसकी पत्नी सीमा एक पढ़ी-लिखी, सुलझे हुए विचारों वाली स्त्री थी। उसने शादी के बाद हर संभव कोशिश की कि वह अपने ससुराल को अपना ले, अपने पति और सास को खुश रखे। वह सुबह से शाम तक घर संभालती, पर उसकी सास बबली कभी उससे खुश न रहती।
बबली देखने में एक दुखियारी माँ लगती थी, पर अंदर से बहुत शातिर थी। जवानी में उसका पति उसे बहुत मारता-पीटता था। बुढ़ापे में उसने अपने बेटे रोहित को ही हथियार बना लिया और अपने पति को घर से निकलवा दिया। अब वह बेटे के साथ भावनात्मक खेल खेलती थी।
रोज़ शाम ऑफिस से आते ही रोहित सीधा माँ के कमरे में जाता। बबली अपनी दुःख भरी कहानी सुनाकर रोने लगती और रोहित मातृ-भक्ति में सब भूल जाता। वह माँ की सेवा करता, दिन भर की सारी बातें उसे बताता। सीमा इंतजार करते-करते थक जाती।
जब भी रोहित हिम्मत करके सीमा के पास जाने की कोशिश करता, तभी बबली को कहीं न कहीं दर्द शुरू हो जाता। वह कराहते हुए कहती, "अब तो मेरे जाने का समय आ गया है बेटा, लगता है अब नहीं बचूंगी। मुझे छोड़कर कहीं मत जा।" और रोहित वहीं रुक जाता।
दरअसल बबली को डर था कि अगर सीमा का बच्चा हो गया तो रोहित अपनी गृहस्थी में व्यस्त हो जाएगा और घर की सत्ता उसके हाथ से चली जाएगी। इसलिए वह रोहित को सीमा के पास जाने ही नहीं देती थी।
इसी खींचतान में धीरे-धीरे शादी के पाँच साल बीत गए। सीमा अंदर ही अंदर घुटती रही, पर कुछ न बोली।
फिर नवरात्रि का पर्व आया। रोहित ने पूरे नौ दिन व्रत रखे, मंदिर गया, कन्याओं को भोजन कराया। उसी दौरान एक दिन बबली ने सीमा के खिलाफ रोहित के कान भर दिए। गुस्से में आकर रोहित ने पहली बार सीमा पर हाथ उठा दिया।
बस, वहीं सीमा का धैर्य टूट गया।
आँखों में आँसू और आवाज में दृढ़ता लिए सीमा ने कहा, "रोहित, तुम राधा रानी को पूजते हो, माँ के लिए नवरात्रि के व्रत रखते हो, और एक स्त्री पर हाथ उठाते हो? पाँच साल से मैं तुम्हारा और तुम्हारी माँ का दिया हुआ मानसिक शोषण झेल रही हूँ। मत भूलो, मैं भी किसी की बेटी हूँ। जो व्यक्ति अपनी पत्नी का सम्मान नहीं कर सकता, उसकी पूजा कभी सफल नहीं होती। माता रानी उस घर में कभी प्रसन्न नहीं होती जहाँ एक स्त्री दुखी हो।"
उसने एक गहरी सांस ली और बोली, "मैं जा रही हूँ। तुम्हारे पास छह महीने का समय है। सोचना, कि तुम्हें कथनी का धर्म निभाना है या करनी का। अगर रिश्ता निभाने की चाह हो तो मुझे लेने आ जाना, नहीं तो छह महीने बाद स्वतः ही तलाक मान्य होगा।"
इतना कहकर सीमा ने अपना सामान पैक किया और घर से निकल गई। रोहित वहीं खड़ा, निराश, उसे जाते हुए देखता रह गया। पीछे कमरे से माँ की आवाज आ रही थी, पर इस बार रोहित के कदम माँ के कमरे की ओर नहीं उठे।
डॉ वंदना शर्मा नई दिल्ली