मेहनत Rajeev kumar द्वारा लघुकथा में हिंदी पीडीएफ

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मेहनत

 

घर वापसी का तो मन बना ही लिया था। अब तो जाना लगभग तय ही था। काम भी नहीं और रूपया भी खत्म।बिना रूपया का तो एक दिन भी गुजारा करना संभव है। यह बात तो कई लोगों ने समझायी थी।
पिता ने भी कहा था ’’ थोड़े से पैसों का क्या मुल्य, चार-पाँच दिन में ही खत्म हो जाएंगे। ’’
माँ ने आँख में आंसू भर कर कहा था ’’ मत जा बेटा, यहीं तो इतना सारा काम है। ’’
मगर किसी की भी न सुनते हुए श्रवण शहर चला आया। जितना सुन रखा था शहर के बारे में, उस से ज्यादा पाया।
एक इंसान, दुसरे इंसान की मदद करने को तैयार नहीं, पुरा शहर अंजान सा। होटल में खाना भी ढंग का नहीं। यही सब कुछ श्रवण ने शहर में अनुभव किया। मगर अनुभव नहीं किया तो सिर्फ यह कि जो सपना देखा था, उसके किसी भी तरह सच होने की गुंजाइश दिखी हो। श्रवण ने जब जेब टटोला ता उसमें 100 रूपया और 10 के दो सिक्के पड़े थे।हालत ऐसी थी कि एक रूपया भी खर्च करने की स्थिति में नहीं। मगर भोजन तो करना ही था। काम मिले या कि न मिले। पेट की अग्नि को तो श्रवण ने 20 रूपया देकर शांत किया। अब पेट पुरी तरह से भरा या नहीं, मगर 100 रूपया में से एक भी खर्च न कर पाने की स्थिति थी, क्योंकि घर वापसी हेतू रेलगाड़ी का किराया 100 रूपया ही था।
श्रवण को विजय की बातों पर बहूत गुस्सा भी आ रहा था। क्या-क्या झुठ बोलकर , क्या-क्या सपने दिखाकर वो शहर ले तो आया था, मगर अत्यधिक व्यस्तता के चलते खाना और रहना छोड़कर किसी भी प्रकार की मदद नहीं कर पाया था। श्रवण को इस बात का भी अपने उपर गुस्सा था कि घुमने-फिरने में व्यर्थ का रूपया बर्बाद किया।
अब हर प्रकार का काम कर पाना तो बुते से बाहर की बात थी। उसकेा 12 वीं कक्षा में अपने अव्वल होने का स्मरण हो आया। किनाने पत्थर पर शांत सा बैठा श्रवण अपने ध्यान में मग्न था।
बगल में बैठे एक सरदार जी कब आकर बगल में बैठ गए, श्रवण को पता ही नहीं चला। यह भी नहीं पता चला कि कनखियों से सरदार जी उसी का मुआयना कर रहे हैं।
सरदार जी ने श्रवण को अचानक से झकझोरा और पुछा ’’ क्या बात है पुत्तर , उदास क्यों हो । ’’
श्रवण के मन में आया कि वो इस बात का जवाब दे या न दे, किसी को अपने परेशानी बताने का क्या फायदा, लेकिन जवाब के इन्तजार में सरदार जी कोक एकटक निहारते हुए देखकर , श्रवण से रहा नहीं गया।
अपनी कहानी सुनाते हुए श्रवण ने अंत में कहा ’’ मेरे पास सिर्फ 100 रूपया बचा है। ’’
सरदार जी वैसे लोगों में थे जो हतोत्साहित करना बिल्कूल भी नहीें जानते। सरदार ज ने कड़क आवाज में कहा ’’ मेहनत कर सकते हो तो, इस रूपया से 1000 रूपया तुम आज ही कमा सकते हो। श्रवण ने सरसरी निगाह से सरदार जी की तरफ देखा और कहा ’’ मैं आपको रूपया बिल्कूल भी नहीं दुंगा। ’’
सरदार जी ने कहा ’’ अरे पुत्तर मुझे नहीं देना रूपया, आप ही खर्च करना, आप की कमाना।’’ सामने की दुकान की तरफ इशारा करते हुए सरदार जी ने कहा ’’ इस दुकान में जा कमाची खरीद, गुब्बारा खरीद, धागा खरीद, फुक मार और गुब्बारा बेचकर कर ले बड़ी कमायी। ’’
गुब्बारा खुब बिका, तीन-चार गुब्बारा में ही मुल्य की वसूली हो गयी।
गुब्बारे की कमायी ने श्रवण के मनोबल को और उंचा किया और संघर्ष के बाद श्रवण ने अच्छा मुकाम हासिल कर लिया।

समाप्त।