ध्रुव की तारा - भाग 8 Anamika द्वारा प्रेम कथाएँ में हिंदी पीडीएफ

Featured Books
श्रेणी
शेयर करे

ध्रुव की तारा - भाग 8

ध्रुव की तारा

भाग -  ८

लेखिका "अनामिका"

तारा के घर से ध्रुव के घर तक का सफर सिया के दिल की जलन को शांत करने के बजाय और बढ़ा रहा था।

​ध्रुव के घर में कदम रखते ही सिया का सामना वही दीवारों पर टंगे फ्रेमों से हुआ। परिवार की साझी तस्वीरों के साथ-साथ ध्रुव के कमरे का हर कोना भी तारा और ध्रुव की बचपन की यादों, ढेरों फनी स्नैप्स और तस्वीरों से पटा पड़ा था। सिया का चेहरा उतर गया; उसकी असहजता और जलन अब उसके चेहरे पर साफ़ पढ़ी जा सकती थी।

​"अरे आओ सिया, बैठो!" ध्रुव ने पूरे उत्साह से उसका स्वागत किया।

​अचानक तारा के घर से यहाँ आ जाने की वजह से तारा ने मेहमाननवाज़ी का फर्ज़ खुद निभाया। वह औपचारिक मुस्कुराकर बोली, "तुम दोनों बैठो, मैं रसोई से कुछ खाने-पीने को लाती हूँ।" और वह बिना ध्रुव से पूछे सीधे उसके किचन की तरफ बढ़ गई।

​तारा के जाते ही ध्रुव के कमरे में तस्वीरों का यह सैलाब देखकर सिया का सब्र टूट गया। उसने चिढ़कर, थोड़े रूखे लहजे में कहा, "ध्रुव! तुम हर वक्त मुझसे इतनी फ्लर्टिंग करते रहते हो, लेकिन मुझे नहीं लगता कि तुम्हें ऐसा करना चाहिए। तुम दोनों के कमरे देखकर लगता है कि तुम और तारा बस 'दोस्त' से कहीं ज़्यादा करीब हो।"

​ध्रुव उसकी बात सुनकर हैरान रह गया, फिर बेफ़िक्री से हँसकर बोला, "अरे सिया! तुम क्या सोच रही हो? तारा मेरी बचपन की बेस्ट फ्रेंड है, बस। हमारे पापा भी कॉलेज के दिनों से दोस्त हैं, इसलिए हमारा रिश्ता परिवार जैसा है। इसमें ऐसा कुछ भी नहीं है, तुम बेवजह सोच रही हो।"

​तारा अभी-अभी ट्रे में कटे हुए फल और पानी के ग्लास लेकर कमरे में दाखिल ही हुई थी कि ध्रुव झपटकर आगे बढ़ा और प्लेट से सेब का एक टुकड़ा उठाकर चबाने लगा।

​"अरे बुद्धू! ये मेहमान के लिए है," तारा ने हँसते हुए उसे टोका।

​सिया ने हैरान-परेशान नज़रों से तारा को देखा और तंज कसते हुए बोली, "तारा, तुम ध्रुव के घर के किचन में इतनी सहजता से कैसे चली गईं? जैसे तुम्हारा अपना ही घर हो!"

​ध्रुव और तारा दोनों एक-दूसरे को देखकर हँस पड़े। ध्रुव ने मुस्कुराते हुए कहा, "सिया, हमारे लिए ये सब बहुत नॉर्मल है। हम दोनों के घरों में एक-दूसरे पर कोई पाबंदी नहीं है।"

​यह सुनकर सिया का दिमाग और खराब होने लगा, लेकिन तभी ध्रुव ने माहौल बदलते हुए अपना लैपटॉप खोल लिया, "छोड़ो ये सब! चलो, अब ट्रिप की फोटोज़ देखते हैं।"

​तीनों एक साथ बैठकर लैपटॉप पर तस्वीरें देखने लगे, पर सिया की नज़रें तस्वीरों से ज़्यादा ध्रुव और तारा के बीच के उस न दिखने वाले, लेकिन गहरे रिश्ते पर टिकी थीं।

लैपटॉप पर तस्वीरों का सिलसिला चल ही रहा था कि मुख्य दरवाजे की घंटी बजी और ध्रुव की मम्मी व तारा की मम्मी ढेर सारे शॉपिंग बैग्स के साथ मुस्कुराते हुए कमरे में दाखिल हुईं।

​"अरे, तुम लोग यहाँ हो! अच्छा हुआ," ध्रुव की मम्मी ने बैग्स मेज पर रखते हुए कहा, "आज रात का खाना हम यहीं साथ में बनाएंगे और खाएंगे।"

​ध्रुव ने झट से आगे बढ़कर माताओं का परिचय कराया, "मम्मी, यह सिया है—तारा की क्लासमेट। आज यह हमारे साथ असाइनमेंट डिस्कस करने आई थी।" दोनों माताओं ने सिया का आत्मीयता से स्वागत किया। तारा की मम्मी ने प्यार से कहा, "अरे वाह, सिया! बेटा, तुम भी आज हमारे साथ डिनर करके ही जाना।"

​तारा और ध्रुव की मम्मी बिना किसी हिचकिचाहट के रसोई में जाकर एक-दूसरे के काम में हाथ बंटाने लगीं। हंसी-मजाक, पुरानी बातें और एक-दूसरे के परिवारों के प्रति वह सहज अपनापन देखकर सिया की छाती पर सांप लोटने लगा। उसे समझ आ गया कि यहाँ बात सिर्फ ध्रुव और तारा की नहीं, बल्कि दोनों परिवारों के एक अटूट रिश्ते की है, जिसमें उसके लिए जगह बनाना नामुमकिन सा था।

​"थैंक यू आंटी, पर मुझे घर निकलना होगा, मम्मी इंतज़ार कर रही होंगी," सिया ने अपनी बेचैनी छिपाते हुए झूठी मुस्कान के साथ कहा।

​ध्रुव उसे बाहर तक छोड़ने आया। सिया ने भारी कदमों से कदम बाहर बढ़ाए, लेकिन उसके दिल में उठ रही जलन और इनसिक्योरिटी की आग अब और तेज़ हो चुकी थी।

अगले दिन क्लास में माहौल रोज जैसा खुशनुमा नहीं था, क्योंकि सिया के बर्ताव में आई बेरुखी तारा का दिल बेचैन कर रही थी।

​तारा और सिया भले ही एक ही डेस्क पर बैठती थीं, लेकिन आज सिया ने क्लास में आते ही अपनी बैग ज़ोर से टेबल पर रखी और बिना एक शब्द कहे खिड़की के बाहर देखने लगी। तारा ने मुस्कुराकर हालचाल पूछना चाहा, पर सिया का ठंडा और अनदेखा करने वाला रवैया तारा को अंदर तक परेशान कर गया। आखिरकार, जब तारा से रहा नहीं गया, तो उसने सिया का हाथ थामकर धीरे से पूछा, "सिया, क्या हुआ है? तुम मुझसे इस तरह खिंची-खिंची क्यों व्यवहार कर रही हो? मुझसे कोई गलती हुई है क्या?"

​तारा की बात सुनते ही सिया का ज़ब्त टूट गया और उसका गुस्सा गुस्से से भरे शब्दों में बह निकला, "तुम्हें सच में नहीं पता, तारा? या बनने का नाटक कर रही हो! तुम्हें अच्छे से पता था कि मैं ध्रुव को पसंद करती हूँ, फिर भी तुम दोनों मेरे सामने उस तरह का बर्ताव कर रहे थे? तुम हर वक्त उसके इतने करीब रहती हो और ध्रुव... वह मुझसे फ्लर्ट करता है लेकिन असल में तुम दोनों का ही कुछ चल रहा है! तुम दोनों ने मुझे बेवकूफ बनाया है!"

​सिया का यह अचानक फटा गुस्सा और धोखा देने का आरोप सुनकर तारा एक पल के लिए सन्न रह गई। उसने सिया के हाथों को सहलाते हुए बेहद शांत और सहमे स्वर में कहा, "सिया, प्लीज शांत हो जाओ। ऐसा बिल्कुल नहीं है जैसा तुम सोच रही हो। ध्रुव और मैं सिर्फ और सिर्फ बचपन के पक्के दोस्त हैं, उससे ज़्यादा कुछ नहीं। अगर हम दोनों के बीच ऐसा कुछ भी होता, तो क्या मैं तुमसे छिपाती? ध्रुव का स्वभाव थोड़ा बेफिक्र है, पर वह दिल का बुरा नहीं है। तुम्हारे और मेरे बीच कोई गलतफहमी नहीं आनी चाहिए।"

​तारा के चेहरे पर सच्चाई और आँखों में छलकता अपनापन देखकर सिया की आँखों से आंसू छलक पड़े। तारा के तसल्लीबख्श शब्दों और उस भरोसेमंद मुस्कान ने सिया के दिल में उठ रहे शक के तूफ़ान को धीरे-धीरे शांत कर दिया, और वह भी तारा की बात मानकर राहत की सांस लेने लगी।

तारा ने मुस्कुराते हुए सिया का हाथ थामकर कहा, "अब सब भूलकर मुस्कुराओ, वैसे भी जल्द ही हमारे बोर्ड्स आने वाले हैं और हमें पढ़ाई में एक-दूसरे की ढाल बनना है।" सिया ने तारा को गले लगा लिया, और इस तरह उनके दिल की दूरियाँ मिटकर आने वाले कठिन दौर के लिए एक अटूट दोस्ती के बंधन में बंध गईं।

आठवाँ भाग समाप्त, कहानी जारी है....