अधूरापन - 26 Falguni Dost द्वारा प्रेरक कथा में हिंदी पीडीएफ

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अधूरापन - 26

अध्याय-२६

राजेश ने अमृता को जो पिछली रात वचन दिया था, वह उस पर खरा उतरा। राजेश को पापा के बचपन के दोस्तों से लेकर फिलहाल अमेरिका के दोस्तों में से जितनों का परिचय था, उन सभी के व्हाट्सएप नंबर लिए और फिर सबकी अनुमति से एक ग्रुप बना दिया। इस पूरी बात से रमेशभाई अभी अनजान ही थे।

रमेशभाई सुबह जल्दी उठकर सपरिवार मंदिर गए, ताकि शोभा की आत्मा को शांति मिले और प्रभु से प्रार्थना करके तथा आरती का आनंद लेकर घर वापस लौटे। रमेशभाई का मन अभी भी उचाट था। अतीत उनकी आँखों के सामने ताज़ा हो गया था। बार-बार मन शोभा को ही याद कर रहा था। वे अपने विचारों में लीन थे, तभी राजेश ने कहा, "पापा, अपना मोबाइल दीजिए न!" रमेशभाई ने बिना किसी सवाल के राजेश को मोबाइल दे दिया। राजेश ने चेक किया कि ग्रुप में पापा का नंबर ऐड हुआ या नहीं। जैसे ही पापा का नंबर ग्रुप में ऐड हुआ, अनगिनत मैसेज की टोन बजने लगीं। राजेश ने मोबाइल पापा को वापस दे दिया।

रमेशभाई उत्सुकतापूर्वक मैसेज देखने लगे। रमेशभाई एक के बाद एक मैसेज पढ़ते जाते और बोलते जाते, "अरे, यह तो मन्या है! देख तो कैसा लग रहा है?" ऐसे एक-एक करके सभी दोस्तों और उनके परिवार के फोटो देखते जा रहे थे और साथ ही अपने परिवार को भी दिखाते जा रहे थे। अमृता और भार्गवी को पापा के चेहरे पर थोड़ी खुशी नज़र आई। दोनों ने आँखों के इशारे से राहत की साँस का अहसास जताया। रमेशभाई के मोबाइल पर तभी मन्या का वीडियो कॉल आया। उन्होंने कॉल उठाया और सालों बाद दोनों दोस्त आज एक-दूसरे का चेहरा देखकर बेहद खुश हुए। फिर तो खुशी की बातें भी हुईं और मन की बातें भी छलक पड़ीं। थोड़ी खुशियाँ खिलीं तो थोड़ी अश्रुधारा से मन का दिल भी हल्का हुआ। शोभा के बिना की ज़िंदगी की बातों में मानो कुछ पलों के लिए शोभा जीवंत हो उठी थी। बस इसी तरह खुशी में दर्द भी सह लिया गया और जीवन में थोड़े बदलाव का भी स्वागत किया गया। दिन बस ऐसे ही बीतते गए। रमेशभाई अपने परिवार की तारीफ़ करते नहीं थकते थे। रमेशभाई अपनी बहुओं को घर की असली लक्ष्मी के रूप में ही पहचान दिलाते थे। और दोनों बहुओं ने कैसे परिवार को सँभालकर रखा है तथा इस प्राचीन देश (संस्कृति) में भी हमारे संस्कारों को बनाए रखकर दोनों बच्चियों का इतना सुंदर पालन-पोषण कैसे कर रही हैं, यह बताते भी नहीं थकते थे। बड़े फ़क्र से अपने दामाद और बेटी की बातें भी करते थे।

अमृता और भार्गवी ने अपने ससुर के जीवन में बदलाव लाने का एक छोटा-सा प्रयास किया था और उसका ऐसा सुंदर परिणाम आया कि दुख के साथ भी जीवन का सब आनंद लेने लगे थे। जीवन में परिस्थितियों के अनुकूल ढलना अगर आ जाए, तो जीवन का अधूरापन दूर हो जाता है।

**६ साल बाद...**

अमृता और भार्गवी की समझदारी से दोनों बेटियों—हनी और भव्या—की परवरिश बहुत सुंदर तरीके से होने लगी थी। कोई जान ही नहीं सकता था कि दोनों सगी बहनें नहीं हैं। बहुत गहरा लगाव बन गया था।

वो पराई थी,
अपनों से भी ज्यादा
स्नेह बोया है।

सोनाली भी जब छुट्टियाँ पड़तीं, तब मामा के घर ठहरती और परिवार के प्यार को पाती थी।

रमेशभाई ने अपने मित्र-मंडल के सहयोग से एक संस्था शुरू की थी, जिसमें जिसे भी किसी प्रकार की सलाह या मार्गदर्शन की आवश्यकता होती, उसे उचित मार्गदर्शन दिया जाता था। इस संस्था का नाम बड़ी बहू के नाम पर 'अमृता' ही रखा गया था। थोड़े ही समय में यह संस्था बहुत प्रसिद्ध और लोकप्रिय भी बन गई। रमेशभाई को व्यस्तता मिली, इसलिए वे भी खुश रहने लगे—वह भी एक अच्छे दर्जे को पाकर! रमेशभाई कभी-कभी मन ही मन बहुत ग्लानि भी महसूस करते कि जब बहुओं को ज़रूरत थी, तब वे उनके पक्ष में एक शब्द भी नहीं बोलते थे और मौन रहते थे। आज इस बात का उन्हें कई बार अफ़सोस होता था। वहीं, वही बहुएँ हमेशा उन्हें खुश रखने और परिवार को एकजुट रखने का प्रयास करती रहती थीं।

समय आने पर समझ आता है,
परिस्थिति वह जो बिताई है,
अफ़सोस बेहद होता है,
इसलिए खुद को अब मैंने बदल लिया है!

राजेश और अपूर्व अब जब ऑफिस से घर आते, तो लगभग ज़्यादातर समय हनी और भव्या शाम की आरती कर रही होती थीं! दोनों इतने खुश होते कि घर अब सचमुच एक मंदिर बन गया हो, वैसी अनुभूति करते थे। दोनों बेटियाँ सचमुच पढ़ाई में तो होशियार थीं ही, पर तौर-तरीकों में भी इतनी प्यारी थीं कि अब घर में कोई वारिस (बेटा) न होने का कोई अफ़सोस ही नहीं बचा था। बेइंतहा प्यारी लगने वाली बेटियों ने संस्कारों के साथ-साथ खुद को आज के ज़माने की होड़ में भी अव्वल साबित किया, जिससे इस परिवार को बेटे की कमी खलने ही नहीं दी।

देखो न, बेटे की चाह में मन में था अधूरापन,
संस्कारों से छलकती बेटियों ने दूर किया बेटे का अधूरापन!

इस तरह परिवार में जिस बेटे के लिए अत्यधिक तड़प महसूस होती थी, वह समय रहते कब दूर हो गई, पता ही नहीं चला! अब किसी को भी परिवार में वारिस न होने का अफ़सोस नहीं था। आज इस घर के तीनों बच्चों—राजेश, अपूर्व और गायत्री—के बच्चों में सिर्फ़ बेटियाँ ही थीं, फिर भी सभी बहुत संतुष्ट थे। समय का चक्र ऐसा चला कि हर किसी का मन अब एक-दूसरे के अनुकूल होकर जीने लगा था। अमृता द्वारा दिखाया गया धैर्य ही सबको खुश रख रहा था। समय बहुत आनंद से बीत रहा था। देखते ही देखते सभी बेटियाँ पढ़ाई पूरी करके अपने पैरों पर खड़ी हो चुकी थीं। भव्या इंजीनियर, हनी डिज़ाइनर और सोनाली एम.बी.ए. करके एक अच्छी कंपनी में मैनेजर थी। ये सभी बेटियाँ अब विवाह योग्य हो चुकी थीं, इसलिए रमेशभाई ने चिंता जताते स्वर में रात के डिनर के समय शादी की बात छेड़ी।

दादाजी के मुँह से शादी की बात सुनकर हनी और भव्या एक-दूसरे की तरफ आश्चर्य से देखने लगीं। अमृता तुरंत बोली, "हाँ पापा, आपने बहुत अच्छी बात की। अब बेटियाँ अपने पैरों पर खड़ी हो चुकी हैं, तो उनके जीवन में विवाह के लिए यह बिल्कुल सही समय है।" भार्गवी बोली, "पापा, आपके ग्रुप में कोई भारतीय युवक है जो हमारी बेटियों के लायक हो?"