अधूरापन - 25 Falguni Dost द्वारा प्रेरक कथा में हिंदी पीडीएफ

Featured Books
श्रेणी
शेयर करे

अधूरापन - 25

अध्याय-२५

शोभाबहन की गैरमौजूदगी से परिवार धीरे-धीरे ढल रहा था। हाँ, उनकी कमी ज़रूर महसूस होती थी, लेकिन हनी और भव्या की चहल-पहल से घर खुशियों से गूँजता रहता था। सभी के मन में एक-दूसरे के लिए अटूट प्रेम और अपार स्नेह उमड़ता रहता था। घर का माहौल बहुत आनंदित था। दिन कैसे बीत रहे थे, कुछ समझ ही नहीं आ रहा था। छुट्टियों के दिनों में जब गायत्री बहन और मानस कुमार भी सोनाली को लेकर आते, तब विनय और नीला को भी राजेश भाई ज़रूर बुलाते थे। परिवार इतना करीब आ गया था कि बाहर से जो भी देखता, वह यही कहता, "आप बहुत भाग्यशाली हैं! अमेरिका जैसे देश में रहकर भी आपने भारतीय संस्कृति को मिटने नहीं दिया!"

परिवार के सदस्य सभी त्योहारों पर बहुत सुंदर आयोजन करते और धार्मिक माहौल में सभी भक्ति का आनंद भी लेते थे।

           **५ साल बाद...**

एक शाम रमेशभाई मोबाइल में कुछ देख रहे थे, तभी हनी और भव्या स्कूल से आईं और दादाजी से ऐसे लिपट गईं जैसे दोनों उन्हीं की पोतियाँ हों! राजेश और अमृता की परवरिश में कोई कमी नहीं थी। वे प्यार के साथ-साथ अच्छे संस्कार भी कूट-कूटकर भर रहे थे।

खून का रिश्ता हमारा न हो तो भी क्या हुआ?
प्यार की नमी से तरबतर है यह रिश्ता।
सगे हम नस-नस से न हों तो भी क्या?
रहेगा प्यार का यह ॠणानुबंध हमेशा बरकरार।
ज़िंदगी में शायद कोई दर्द आए तो भी क्या?
"प्रीत" से फैलाएगा, "दोस्त!" वह नई सुगंध।

रमेशभाई भावुक विचारों में खोए ही थे कि तभी हनी बोली, "दादा, कल सुबह हमें मंदिर जाना है न! जल्दी उठ जाना... कल दादी की तिथि है ना!.." रमेशभाई पहले से ही भावविभोर थे, हनी के इन शब्दों ने उनके दिल को छू लिया। रमेशभाई बोले, "तुझे याद है बेटा?" हनी और भव्या दोनों एक साथ बोलीं, "हाँ दादा, दादी की तिथि मम्मी रोज़ याद दिलाती हैं।"

रमेशभाई मन ही मन बहुत खुश हो रहे थे। वे सोचने लगे, 'काश! शोभा ने अपनी ज़िंदगी में अहंकार के बजाय परिवार का साथ दिया होता, तो आज इस परिवार के आनंद की खुशी मेरे साथ वह भी उठा रही होती!!' रमेशभाई के सीने से एक गहरी आह निकल गई! ज़िंदगी के आखिरी पड़ाव पर ही जीवनसाथी की असली ज़रूरत महसूस होती है। क्योंकि उम्र के कारण ज़्यादातर समय बाहर के बजाय घर पर ही बिताना पड़ता है, इसलिए अकेलापन बहुत व्याकुलता पैदा करता है। रमेशभाई आज शोभाबहन को बहुत याद कर रहे थे। वे आसमान की तरफ देखते हुए बोले, "शोभा, तेरे तानों भरे शब्द रहते थे फिर भी तेरी कमी आज बहुत सताती है।"

ज़िंदगी है आज अब मेरी हरी-भरी,
फिर भी आज महसूस होती है तेरी कमी।
मेरी ज़िंदगी का आधा अंग छूट गया है,
भरे-पूरे जीवन में भी लगता है अधूरापन।'

हनी और भव्या की आवाज़ सुनकर अमृता बाहर आई। ससुरजी की तरफ देखते ही वह उनकी हालत समझ गई और तुरंत बोली, "पापा, आप कमज़ोर पड़ जाएँगे तो हमें हिम्मत कौन देगा?"

रमेशभाई बोले, "बेटा! मेरी सच्ची हिम्मत तो तुम लोग ही हो, वरना अकेलापन कब का इस शरीर को निगल गया होता। मैंने अपनी ज़िंदगी में जो शांति और प्यार कभी नहीं पाया था, वह आज महसूस कर रहा हूँ; लेकिन यह मानव शरीर हमेशा लालची ही रहा न! इसलिए सोच रहा था कि आज शोभा साथ होती तो कितनी मज़ा आती? बस यही विचार मन में कुलबुला रहा था। वैसे तो मैं जानता ही हूँ कि वह अपने कर्मों का फल भुगत कर गई, लेकिन मेरे लिए तो वह मेरी जीवनसंगिनी थी न! इसलिए कभी-कभी भावुक हो जाता हूँ।" रमेशभाई ने अमृता को अपनी बेटी से भी ऊँचा दर्जा दिया था, इसलिए वे भावुक होकर अपनी भावनाएँ अमृता से बाँट रहे थे। अमृता शायद महसूस कर पाई कि पापा अकेले पड़ गए हैं, लेकिन उन्हें सांत्वना देने के लिए क्या कहे, आज उसके पास शब्द नहीं थे। उसने पापा को पानी का गिलास दिया और उनका ध्यान दूसरी तरफ भटकाने के लिए बोली, "अभी खाने में उपमा खाएँगे या खिचड़ी?"

रमेशभाई ने जवाब दिया, "बेटा, उपमा बना ले न! हनी और भव्या को भी पसंद है न!"

अमृता दोनों बेटियों को गार्डन से घर के अंदर ले जाते हुए पापा को "ओके" कहती हुई चली गई।

देख न! चारों तरफ खुशहाली ही है,
तेरे बिना हर जगह अधूरापन ही है!

अमृता अंदर तो चली गई, लेकिन उसका मन पापा के पास ही रह गया। पापा का अकेलापन उसे बहुत बेचैन कर गया। उसने भार्गवी को सारी बात बताई और कहने लगी, "पापा की इस स्थिति में हम क्या कर सकते हैं?"

भार्गवी ने थोड़ी देर सोचा और फिर बोली, "अगर हम पापा के यहाँ के और इंडिया के जितने भी दोस्त हैं, उनका एक ग्रुप बना दें, तो दिन का कुछ हिस्सा पूजा-पाठ में और बाकी दोस्तों से बातचीत में निकल जाएगा। और फिर बच्चे आ जाते हैं, तो समय बीतते कहाँ देर लगती है!"

अमृता बोली, "हाँ! सही बात है। पापा ने परिवार में ही अपनी पूरी ज़िंदगी व्यस्त कर दी। दोस्त उनके जीवन से कब दूर हो गए, पता ही नहीं चला। मैं आज ही राजेश से कहती हूँ कि पापा के कौन-कौन से दोस्त थे, उनके कॉन्टैक्ट ढूँढते हैं।"

अमृता घर का सारा काम निपटाकर कमरे में गई। राजेश धीमी आवाज़ में लोरी गाकर हनी को सुला रहा था। अमृता उसके पास जाकर बैठ गई और हनी के सोने का इंतज़ार करने लगी। थोड़ी देर में हनी गहरी नींद में सो गई। अमृता ने अब राजेश को पापा की सारी बात बताई और भार्गवी का सुझाव भी दिया। राजेश, अमृता को पापा की चिंता करते देख अमृता पर और भी खुश हो गया और बोला, "कल यह काम ज़रूर हो जाएगा।" इतना बोलते ही वह उससे लिपट गया और अमृता पर अपार प्रेम बरसाने लगा। अमृता भी उस पल का आनंद लेती हुई पूरी तरह से राजेशमय हो गई।