अध्याय-२४
शोभाबहन एकदम गुस्से में घर के गेट से बाहर निकल गईं और बहुत तेज़ी से चलने लगीं। घर के बाकी सदस्य शोभाबहन के इस कदम को समझ पाते, उससे पहले ही वह गुस्से में काफी दूर निकल चुकी थीं।
शोभाबहन के इस अप्रत्याशित रवैये से सब असमंजस में थे कि क्या बोलें या क्या करें, सिवाय अमृता के... अमृता ने हनी को राजेश के हाथों में सौंपा और खुद भी अपनी सास के पीछे दौड़ लगा दी। "मम्मी... मम्मी..." करती हुई अमृता उनके पास पहुँच गई और उनसे ढेरों सवाल पूछने लगी, "कहाँ जाना है मम्मी आपको? क्यों ऐसे अचानक बाहर निकल आईं? इतनी देर हो चुकी है और ठंड भी बहुत है, तो ऐसे में आपको बाहर क्यों जाना है? कुछ तो बोलिए मम्मी?"
अमृता चलते-चलते बोलती जा रही थी और शोभाबहन अपनी ही धुन में गुस्से से चली जा रही थीं। अमृता ने उनका हाथ पकड़कर अपने सिर पर रखा और कहा, "मम्मी आपको मेरी कसम... आप नहीं रुकेंगी तो मैं भी आपके साथ ही आऊँगी, लेकिन आपको अकेला नहीं छोड़ूँगी..."
शोभाबहन अमृता की बात सुनकर चलते-चलते ठिठक गईं। अमृता का हर एक शब्द आज उन्हें झकझोर गया था। अमृता अभी बोल ही रही थी कि शोभाबहन को अचानक एक गहरा धक्का लगा। उनका गला रूँध गया कि 'जिस अमृता से मैं इतनी नफ़रत करती हूँ, वही अमृता आज नंगे पैर मेरे पीछे बदहवास होकर दौड़ रही है? मेरे दोनों बेटे, मेरी बेटी और मेरे पति भी मुझसे तंग आ चुके हैं, लेकिन जिसे मैंने पराया समझा, वह मेरे लिए अपनी ज़िंदगी के सबसे कीमती पलों को छोड़कर मेरे पीछे आ रही है? अमृता इस घर में आई और घर के हर सदस्य के लिए अमृत समान ही साबित हुई, लेकिन मैं शोभा! क्या मैं इस घर की शोभा बन सकी?'
एक पराई बेटी आज बन गई है सहेली!
रिश्तों की यह बाज़ी ही कैसी है अनोखी!
जो घर की होकर भी उस घर से ही अलग थी!
फिर भी अपने मन से बिल्कुल साफ़ थी!
अचानक मानो अनगिनत सवाल उनके मन में गूँजने लगे। उन्हें बेहद अफ़सोस हो रहा था। अफ़सोस का घूँट ऐसा था कि शोभाबहन के गले से उतर ही नहीं रहा था। उनका गला रूँध गया और शरीर पसीने-पसीने होने लगा। अमृता अभी भी उन्हें मनाने की कोशिश कर रही थी, लेकिन उसकी आवाज़ धीरे-धीरे अस्पष्ट होती जा रही थी। उन्होंने पीछे मुड़कर देखा तो अमृता के अलावा उनके पास कोई नहीं था।
अनगिनत लोगों के बीच भी है अकेली!
उसके जीवन का यह अधूरापन है कैसा!
पूरा करने उसे अब निकल पड़ी है!
कमी पूरी न हो, यह अधूरापन है ऐसा!
उन्हें आज एक साथ अमृता के साथ किए गए अपने सारे अन्याय आँखों के सामने तैरते हुए दिखाई देने लगे। शोभाबहन अपना संतुलन खो बैठीं। उनका शरीर ज़मीन पर गिरता, उससे पहले ही अमृता ने उन्हें अपनी बाहों में संभाल लिया। शोभाबहन को अब कुछ सुनाई नहीं दे रहा था। उन्हें घबराई हुई अमृता आँसू बहाती और कुछ बोलती हुई धुँधली-सी दिखाई दे रही थी।
विनय की गाड़ी में बाकी सब भी वहाँ पहुँच गए। उन्हें तुरंत अंदाज़ा हो गया कि मम्मी की तबियत ठीक नहीं है। अमृता की बाहों में ही शोभाबहन को लेकर सब तुरंत अस्पताल पहुँचे। अस्पताल के अंदर प्रवेश करने से पहले ही शोभाबहन ने अमृता के आगे हाथ जोड़ लिए। मानो वह अपने सभी कर्मों की माफ़ियाँ माँग रही हों। मानो आज उन्हें अमृता में देवी माँ के दर्शन हो गए हों। उन्होंने परिवार की तरफ नज़र घुमाई, हनी के सिर पर हाथ रखा और उनका देह आत्मा से विहीन हो गया।
राजेश और अमृता के जीवन में अभी-अभी तो अनमोल खुशी ने कदम रखा था कि यह दुखद हादसा घट गया।
एक ही पल में मिली खुशी जहाँ मनाने जाता हूँ,
वहीं बरसों-बरस के साथ को खोकर दुःख का घूँट पीता हूँ।
अपूर्व ने गायत्री को फ़ोन करके अस्पताल बुला लिया था। वह भी पहुँच चुकी थी। रमेशभाई एकदम भावुक हो गए। उन्हें लगा कि मैंने किस मनहूस घड़ी में कह दिया था कि 'अब तू ऐसे ही ऊल-जुलूल बोलेगी तो तुझे इस घर में रहने का हक नहीं रहेगा।' पापा के मुँह से ऐसा सुनकर गायत्री बोली, "पापा, आप मेहरबानी करके ऐसा मत बोलिए, इसमें आपकी कोई ग़लती नहीं है। जिसका सृजन होता है, उसका विनाश उसी क्षण तय हो जाता है। मम्मी को आपने सुधरने के कई मौक़े दिए थे, इसलिए आपका ऐसा कहना स्वाभाविक ही है... मम्मी की कमी हमेशा हर किसी को खलेगी..." इतना बोलते-बोलते गायत्री का गला भी भर आया और आँसू अनजाने में ही आँखों से छलक पड़े। फिर भी वह दृढ़ बनी रही। वह कमज़ोर पड़कर अपनी मम्मी की आत्मा को दुःख नहीं पहुँचाना चाहती थी। परिवार के हर सदस्य के लिए अचानक मिले इस दुःख को सहन करना बेहद कठिन था। लेकिन कहते हैं न कि ईश्वर हर किसी को दुःख सहने की शक्ति दे ही देता है।
**३ महीने बाद.....**
अमृता रोज़ की तरह घर के मंदिर में आरती उतार रही थी और भार्गवी भगवान का भोग बनाकर उसके पास ही खड़ी थी।
उनके साथ ही रमेशभाई, राजेश की गोद में बैठी हनी, अपूर्व की गोद में बैठी भव्या... सब एक साथ मिलकर भगवान की प्रार्थना कर रहे थे। हनी और भव्या मानो प्रसाद का ही इंतज़ार कर रही थीं। राजेश और अपूर्व दोनों इशारों में उन्हें पूजा में ध्यान लगाने को कह रहे थे। पूजा संपन्न होने के बाद मंदिर के पास रखी शोभाबहन की तस्वीर को नमन करके अमृता ने सबको प्रसाद दिया और नाश्ते के लिए डाइनिंग टेबल पर आने को कहा।
परिवार में आज शोभाबहन की कमी तो थी, लेकिन पूरा परिवार एक साथ था। परिवार में माँ की कमी होने के बावजूद आज किसी के मन में कोई अधूरापन नहीं था। और इस बात का अहसास मंदिर में रखी शोभाबहन की तस्वीर में उनके चेहरे पर तैरती हँसी करा रही थी। अधूरापन होने के बावजूद सब मानो पूरे थे।
जीवन तो है पूर्ण और अपूर्ण के किनारे,
नफ़े और नुक़सान के हिसाबों के सहारे!
उतार-चढ़ाव का खेल है यह भारी!
अधूरेपन की तड़प को तो ईश्वर ही सँभाले!