अपना घर Alok Mishra द्वारा महिला विशेष में हिंदी पीडीएफ

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अपना घर

      ट्रेन की सीटी ने रात की खामोशी को चीर दिया।गाड़ी एक हल्के झटके के साथ सरकी और फिर धीरे-धीरे प्लेटफॉर्म पीछे छूटने लगा। उमा खिड़की के पास बैठी थी। कुछ देर पहले तक वह अपने भीतर उठ रहे ज्वार को किसी तरह थामे हुए थी। उसने स्वयं को बार-बार समझाया था—रोना नहीं है। स्टेशन पर नहीं। लोगों के सामने नहीं लेकिन मन की भी अपनी एक सीमा होती है। ट्रेन ने गति पकड़ी और उमा के भीतर कुछ टूट गया। उसने दोनों हाथों से चेहरा ढँक लिया।आँसू हथेलियों के बीच से रिसने लगे। सामने बैठे एक यात्री ने उसकी ओर देखा। फिर नजरें फेर लीं। शायद उसने सोचा होगा—किसी अपने से बिछड़ने का दुख है। वे गलत भी नहीं थे लेकिन उमा जिस बिछोह से गुजर रही थी, उसका कोई एक नाम नहीं था। वह एक व्यक्ति से बिछड़ रही थी, लेकिन उसके साथ-साथ उस संभावना से भी बिछड़ रही थी जिसमें उसे लगा था कि जिंदगी ने आखिरकार उसे भी अपना एक कोना दे दिया है।       

      ट्रेन आगे बढ़ती रही। शहर की रोशनियाँ एक-एक करके पीछे छूटती गईं। उमा को लगा, जैसे उसके जीवन के बीते हुए वर्ष भी इसी तरह पीछे छूटते जा रहे हैं—एक-एक करके। वह उन वर्षों में लौट गई।       

      उमा ने भी कभी एक सामान्य लड़की की तरह सपने देखे थे। उसके सपनों में बहुत बड़ी चीजें नहीं थीं।   एक छोटा-सा घर।

सुबह की चाय।

शाम को लौटता हुआ पति।

दो लोगों की बातचीत।

कभी किसी त्योहार पर नए कपड़े। इतना भर विश्वास कि कोई है जिसके साथ वह अपने दुख बाँट सकती है।उसने विवाह को इसी भरोसे से स्वीकार किया था। उसका विवाह रोमेश के साथ हुआ लेकिन विवाह के बाद ही उसे पता चला कि रोमेश किसी और से प्रेम करता है।

उमा उसके जीवन में पत्नी थी, लेकिन प्रेम नहीं।

वह घर में थी, लेकिन उसके मन में नहीं।

 यह एक अजीब स्थिति थी—कागज पर पत्नी और जिंदगी में पराई।

     कुछ समय तक रोमेश ने औपचारिकता निभाई। फिर वह औपचारिकता भी खत्म हो गई। वह अपनी प्रेमिका के साथ रहने लगा।उमा अकेली रह गई। 

  उसके सामने सबसे बड़ा प्रश्न यह नहीं था कि

उसका पति उसे छोड़कर क्यों चला गया? 

प्रश्न यह था कि उसके चले जाने के बाद समाज उमा से क्या अपेक्षा करता है?

 क्या वह उम्र भर उसकी प्रतीक्षा करे?

 क्या अपने जीवन पर ताला लगा दे?

क्या अपनी इच्छाओं को यह कहकर मार दे कि वह एक विवाहित स्त्री है?

     लेकिन दूसरी ओर उसके लिए कोई रास्ता भी नहीं था। ससुराल में उसके लिए जगह नहीं थी। मायका भी उसके लिए स्थायी आश्रय नहीं बन सका। विवाह टूटने पर पुरुष अक्सर उतना अकेला नहीं होता है। स्त्री को अकेलेपन के साथ-साथ समाज की निगाहों का भी सामना करना पड़ता है। उमा ने यह सब चुपचाप सहा।कभी रोती।

कभी खुद को समझाती।

कभी गुस्सा आता।

फिर गुस्सा भी थककर बैठ जाता।

आखिर जीवन को आगे तो बढ़ाना ही था।

    उसने एक एन.जी.ओ. में नौकरी कर ली। परिचारिका की नौकरी। ऐसे परिवार, जिनके घर में वृद्ध, नि:शक्त या बीमार व्यक्ति होते और उनकी देखभाल के लिए पर्याप्त समय नहीं होता, वे एन.जी.ओ. से संपर्क करते। संस्था परिचारिका उपलब्ध कराती। उमा एक घर से दूसरे घर जाने लगी।

किसी घर में बूढ़ी माँ।

किसी घर में लकवाग्रस्त पिता।

कहीं बिस्तर पर पड़ा कोई मरीज।

     वह उनकी सेवा करती ।दवा देती। खाना खिलाती।रात में उठकर पानी पिलाती। उनकी पीड़ा सुनती और कई बार उनकी ऐसी बातें सुनती, जिन्हें उनके अपने परिवार के पास सुनने का समय नहीं था।  उमा दूसरों के घरों में अपनापन बाँटती रही लेकिन उसका अपना घर कहाँ था? यह प्रश्न धीरे-धीरे उसके भीतर स्थायी हो गया। किसी परिवार में महीनों रहने के बाद जब उसे वहाँ से जाना पड़ता, तो वह सिर्फ नौकरी नहीं छोड़ती थी। वह एक संबंध छोड़ती थी।

एक बूढ़ी माँ की आँखें पीछे छूट जातीं।

किसी बीमार व्यक्ति की आवाज कानों में रह जाती।

किसी बच्चे का “उमा दीदी” पुकारना उसके साथ चलता।         फिर वह खुद को समझाती— यह तुम्हारा घर नहीं था। तुम यहाँ काम करने आई थीं। धीरे-धीरे उसने भावनाओं को पेशे से अलग करना सीख लिया।सीखना ही पड़ा क्योंकि अकेली स्त्री के पास भावुक होने की भी कीमत होती है। 

       समय बीतता गया। उमा की उम्र बढ़ती गई लेकिन उसके जीवन में कोई पुरुष नहीं आया। शायद उसने पुरुषों से दूरी नहीं बनाई थी। उसने अपने टूटने से दूरी बनाई थी।       

     अब उसे अपने भविष्य की चिंता होने लगी थी। उम्र के इस पड़ाव पर उसे किसी रोमांच की तलाश नहीं थी।उसे स्थिरता चाहिए थी। एक ऐसा घर जहाँ रात को सोते समय उसे यह न सोचना पड़े कि कल उसे कहाँ जाना है। एक ऐसा व्यक्ति जिसके सामने उसे हर बार अपनी उपयोगिता सिद्ध न करनी पड़े। इसी बीच एन.जी.ओ. ने उसे एक छोटे शहर में तीन महीने के लिए भेजा। घर बड़ा था। पर उसमें रहने वाले केवल दो लोग थे।

महेश गुप्ता—एक शासकीय अधिकारी। अभी-अभी विधुर हुए थे।

उनके दो बेटे मुंबई में रहते थे।

घर में उनकी वृद्ध माँ थीं, जो काफी बीमार थीं। 

     उमा को उनकी देखभाल के लिए भेजा गया था। घर में खाना बनाने और दूसरे कामों के लिए एक महिला रोज आती थी। उमा का अधिकांश समय गुप्ताजी की माँ की सेवा में बीतता। उमा ने अपना काम उसी निष्ठा से शुरू किया, जैसी वह हर घर में करती थी। दिन बीतने लगे।     रात को जब माँ सो जातीं तो घर अचानक बहुत बड़ा और बहुत शांत हो जाता। उन्हीं रातों में उमा और गुप्ताजी के बीच बातें शुरू हुईं। पहले सामान्य बातें होतीं।फिर परिवार की। फिर अकेलेपन की।

एक रात गुप्ताजी ने कहा, “उमा, कभी-कभी लगता है, आदमी भीड़ में रहकर भी कितना अकेला हो सकता है।”

उमा हल्का-सा मुस्कराई। “अकेलापन जगह से नहीं होता, गुप्ताजी।”

“तो?”

“जिसे अपना समझकर मन की बात कह सकें, वह न हो तो आदमी अकेला ही होता है।”

गुप्ताजी चुप रहे। फिर उन्होंने धीरे से पूछा,“तुम्हें कभी अपना घर याद आता है?”

उमा कुछ क्षण उन्हें देखती रही।

“घर?”

वह हल्के से हँसी।

“मेरा घर तो कभी बना ही नहीं।”

  उस हँसी में बहुत कुछ था। एक टूटा हुआ विवाह। एक छोड़ी हुई स्त्री। दूसरों के घरों में बीता जीवन और एक ऐसा भविष्य जिसकी कोई निश्चित दिशा नहीं थी।        धीरे-धीरे दोनों के बीच की दूरी कम होने लगी।

एक रात गुप्ताजी ने बहुत संकोच से कहा,“मैं तुमसे एक बात कहना चाहता हूँ।”

“कहिए।”

“अगर कभी… हम साथ रहें तो…”वे रुक गए।

उमा ने उनकी ओर देखा।

“तो?”

“मुझे किसी शारीरिक संबंध की जरूरत नहीं है। मुझे सिर्फ साथ चाहिए।”

उमा देर तक चुप रही। फिर उसने कहा,“मुझे भी।”

“तुम्हें भी?”

“हाँ।”

उसकी आवाज में वर्षों की थकान थी।

“मैंने अपने जीवन में बहुत कुछ खोया है। अब मुझे किसी के शरीर की नहीं, किसी की मौजूदगी की जरूरत है।”

फिर उसने कुछ रुककर कहा,“और मैं किसी की रखैल बनकर नहीं रहना चाहती।”

गुप्ताजी चौंके। उमा ने उनकी आँखों में देखते हुए कहा,“माफ कीजिएगा  लेकिन यह बात पहले ही साफ कर देना चाहती हूँ। अगर कभी मैं किसी के साथ रहूँगी तो बराबरी से। मुझे किसी की दया नहीं चाहिए।”

गुप्ताजी ने सिर हिला दिया। “मैं तुम्हें दया से नहीं देखता, उमा।”

शायद इसी विश्वास ने दोनों को एक-दूसरे के और करीब कर दिया। गुप्ताजी साठ वर्ष के थे। उमा बयालीस की।समाज की नजर में शायद यह प्रेम का समय नहीं था लेकिन क्या प्रेम कभी उम्र देखकर आता है? दोनों को लगा, उनके बीच प्रेम जन्म ले चुका है। यह प्रेम देह से अधिक मन का था,अधिकार से अधिक अपनत्व काऔर शायद सबसे अधिक—अकेलेपन से मुक्ति का।     

      कुछ समय बाद गुप्ताजी की माँ की तबीयत ठीक हो गई। गुप्ताजी के भाई ने उन्हें अपने घर ले जाने का प्रस्ताव रखा।

माँ चली गईं।

उमा की नौकरी समाप्त हो गई।

   वह दूसरे काम पर चली गई।      लेकिन...गुप्ताजी से उसका संबंध समाप्त नहीं हुआ। अब दोनों अक्सर मिलते और फोन पर बातें करते। धीरे-धीरे दोनों को महसूस हुआ कि वे एक-दूसरे के बिना रहने की कल्पना नहीं कर पा रहे हैं। उन्होंने साथ रहने का निर्णय लिया। उमा ने नौकरी छोड़ दी। वह गुप्ताजी के घर आ गई। पहली बार उसके पास अपना कोई ठिकाना था। कोई ऐसा स्थान जहाँ वह किसी की परिचारिका नहीं थी। वह केवल उमा थी।         लेकिन...यह सुख बहुत दिनों तक अकेला नहीं रह सका। समाज को दो अकेले लोगों की खुशी अक्सर खटकती है।

परिवार सक्रिय हो गया।

कुटुंब सक्रिय हो गया।

बेटे सक्रिय हो गए।     

    वे लोग भी सक्रिय हो गए जो वर्षों से गुप्ताजी की जिंदगी में नहीं थे, लेकिन अब उन्हें यह बताने लगे कि जिंदगी कैसे जीनी चाहिए।

सबने गुप्ताजी से कहा,“इस उम्र में अगर आपको यही करना है, तो फिर हमसे कोई संबंध मत रखिए।”

गुप्ताजी चुप रहे। उनके सामने वही पुराना सवाल था— परिवार या अपना जीवन? उन्होंने उमा की ओर देखा। उमा ने उनकी आँखों में संघर्ष पढ़ लिया। वह चाहती तो कह सकती थी— “आपने मुझे चुना है, अब अपने परिवार का सामना कीजिए।” लेकिन उसने ऐसा नहीं कहा। क्योंकि वह जानती थी कि प्रेम किसी को उसकी जड़ों से काटकर नहीं बनाया जा सकता।

गुप्ताजी ने एक दिन उससे कहा,“उमा, मैं तुम्हारे साथ रहना चाहता हूँ। लेकिन मैं अपने बच्चों से रिश्ता नहीं तोड़ सकता।

”उमा चुप रही।“

मैं मजबूर हूँ।”

उमा ने धीरे से कहा, “मैं समझती हूँ।”

“तुम मुझसे नाराज तो नहीं हो?”

वह मुस्कराई।

“नाराज हूँ।”

गुप्ताजी ने उसकी ओर देखा।

“लेकिन तुमसे नहीं।”

“फिर?”

“उस सोच से जिसने हमें यह तय करने की आजादी भी नहीं दी कि हमें अपना जीवन किसके साथ बिताना है।”

गुप्ताजी की आँखें भर आईं।

उमा ने आगे कहा,“आप पुरुष हैं। फिर भी अपने परिवार के सामने मजबूर हैं। मैं स्त्री हूँ। मेरी मजबूरी तो समाज ने जन्म से तय कर रखी थी।”

     कुछ देर दोनों के बीच खामोशी रही। फिर उमा ने अपना सामान बाँध लिया। वह वापस जाने के लिए तैयार हो गई। गुप्ताजी उसे स्टेशन तक छोड़ने आए। प्लेटफॉर्म पर दोनों बहुत देर तक खड़े रहे। इतने समय में उनके बीच जितनी बातें हुई थीं, उनमें से शायद कोई भी इस समय कहने के लिए नहीं बची थी।

ट्रेन आई।

उमा चढ़ गई।

गुप्ताजी खिड़की के पास खड़े रहे।उनकी आँखों में आँसू रूके थे।ट्रेन की सीटी बजी।गाड़ी धीरे-धीरे चलने लगी। उमा ने खिड़की से बाहर देखा।

गुप्ताजी पीछे छूटते जा रहे थे।

फिर प्लेटफॉर्म पीछे छूट गया।

फिर स्टेशन।

फिर शहर।

     उमा ने दोनों हाथों से चेहरा ढँक लिया। वह रो पड़ी। आस-पास बैठे यात्रियों को लगा—किसी प्रिय से बिछड़ने का दुख है। वे सही थे लेकिन उमा के आँसू केवल प्रेम के नहीं थे। उन आँसुओं में एक स्त्री का पूरा जीवन बह रहा था।वह स्त्री जिसे विवाह में पति नहीं मिला। ससुराल में घर नहीं मिला। मायके में स्थायी आश्रय नहीं मिला।नौकरी में दूसरों के घर मिले, लेकिन अपना घर नहीं मिला।       जब जीवन के एक मोड़ पर उसे एक ऐसा व्यक्ति मिला जिसके साथ वह बिना किसी स्वार्थ के जीना चाहती थी, तब समाज ने उसके रिश्ते को नाम और स्वीकृति की कसौटी पर रख दिया। उमा खिड़की से बाहर देखती रही। अँधेरा गहरा होता जा रहा था लेकिन उसी अँधेरे में उसे अपने भीतर कुछ साफ दिखाई दे रहा था।

वह किसी की छोड़ी हुई पत्नी भर नहीं थी।

वह किसी की परिचारिका भर नहीं थी।

वह किसी पुरुष के साथ होने से ही पूरी होने वाली स्त्री भी नहीं थी।

वह एक मनुष्य थी।

उसकी अपनी इच्छाएँ थीं।

अपनी आकांक्षाएँ थीं।

अपने निर्णय थे।

उसे प्रेम करने का अधिकार था।उसे अकेले रहने का अधिकार था।उसे साथ चुनने का अधिकार था। उसे किसी रिश्ते से बाहर निकलने का अधिकार भी था। ट्रेन रात के अँधेरे में आगे बढ़ती रही। उमा रोती रही। लेकिन धीरे-धीरे उसके आँसू थमने लगे। उसने आँखें पोंछीं। खिड़की के शीशे में अपना चेहरा देखा। थका हुआ चेहरा। आँखों में नमी लेकिन उस चेहरे पर पहली बार उसे अपना चेहरा दिखाई दिया।

किसी की पत्नी का नहीं।

किसी की परिचारिका का नहीं।

किसी की प्रेमिका का नहीं।

सिर्फ उमा का।

    शायद इतने वर्षों की पूरी यात्रा के बाद यही उसकी सबसे बड़ी उपलब्धि थी। उसे अपना नाम वापस मिल गया था।


आलोक मिश्रा " मनमौजी "