एपिसोड 50 — पुराने मंदिर का सच
अर्जुन के हाथ में फोन था और स्क्रीन पर सिर्फ एक शब्द चमक रहा था—
RUDRA
उसकी आंखें उस मैसेज पर टिकी थीं।
“अगर सच जानना है, तो आज रात पुराने मंदिर में अकेले आना।”
अर्जुन के दिमाग में कल रात की सारी बातें एक साथ घूमने लगीं।
दादाजी की डायरी...
A-27...
नासिर खान...
राघव मेहरा...
रघुवीर...
और अब—
रुद्रा।
उसने फोन की स्क्रीन बंद कर दी।
लेकिन तभी उसके पीछे किसी के कदमों की आहट हुई।
अर्जुन ने पलटकर देखा।
आयत थी।
उसकी आंखें अभी भी नम थीं।
वह कुछ पल अर्जुन को देखती रही।
“तुम अभी तक यहीं हो?”
अर्जुन ने नजरें झुका लीं।
“हां।”
“तुमने मुझसे जो पूछा था... उसका जवाब शायद मैं दे सकती हूं।”
अर्जुन ने तुरंत उसकी तरफ देखा।
आयत ने अपना फोन निकाला।
“आज सुबह मैं हॉस्टल में थी। मेरे कमरे की रूममेट ने मुझे जगाया था। मेरे फोन में उसका मैसेज भी है।”
अर्जुन ने फोन लिया।
वास्तव में सुबह 6:39 का मैसेज था।
अर्जुन की नजर कुछ सेकंड उस स्क्रीन पर टिकी रही।
फिर उसने फोन वापस कर दिया।
“ठीक है।”
आयत ने हैरानी से पूछा—
“बस?”
“हां।”
“तुम्हें मुझ पर विश्वास हो गया?”
अर्जुन चुप रहा।
आयत ने उसकी आंखों में देखा।
“अर्जुन, तुम्हारे चेहरे पर अभी भी वही शक है।”
“मैं बस सच जानना चाहता हूं।”
“तो मुझसे पूछो। किसी और के दिखाए हुए सबूत पर भरोसा मत करो।”
अर्जुन के दिल में जैसे किसी ने चोट कर दी।
वह जानता था कि आयत सही कह रही थी।
लेकिन A-27 का मामला इतना उलझ चुका था कि अब किसी पर पूरी तरह भरोसा करना आसान नहीं था।
आयत वहां से जाने लगी।
अर्जुन ने उसे रोकना चाहा।
लेकिन उसके होंठों तक आवाज नहीं आई।
दूसरी तरफ अस्पताल के कैंटीन में Sanaya और Karan बैठे थे।
Sanaya लगातार अर्जुन की तरफ देख रही थी, जो कुछ दूरी पर अकेला बैठा था।
Karan ने चाय का कप रखते हुए कहा—
“अगर तुम उसे ऐसे ही घूरती रही ना, तो बेचारा डर जाएगा।”
Sanaya ने उसे घूरा।
“तुम्हें किसने कहा कि मैं उसे देख रही हूं?”
“तुम्हारी आंखों ने।”
“तुम अपनी आंखों की चिंता करो।”
Karan मुस्कुराया।
“मैं तो कर ही रहा हूं।”
Sanaya ने उसकी तरफ देखा।
कुछ पल के लिए दोनों चुप हो गए।
Karan ने तुरंत नजरें दूसरी तरफ कर लीं।
Sanaya को समझ नहीं आया कि वह अचानक इतना शांत क्यों हो गया।
“तुम ठीक हो?”
“मैं?”
“हां।”
“मैं बिल्कुल ठीक हूं।”
“झूठ बोल रहे हो।”
Karan हल्का-सा मुस्कुराया।
“तुम्हें मेरे बारे में इतनी चिंता कब से होने लगी?”
Sanaya कुछ बोल नहीं पाई।
वह तुरंत उठ गई।
“मुझे क्लास में जाना है।”
Karan उसे जाते हुए देखता रहा।
उसके चेहरे पर हल्की मुस्कान थी।
शाम के करीब सात बजे।
Arjun को पूरे दिन एक ही बात परेशान करती रही—
“आज रात पुराने मंदिर में अकेले आना।”
वह जानता था कि वहां जाना खतरे से खाली नहीं था।
लेकिन अगर रुद्रा सच में वही व्यक्ति था, जिसका नाम उसके दादाजी की डायरी में बार-बार छिपे संकेतों के रूप में आया था, तो यह मौका वह छोड़ नहीं सकता था।
उसने अपनी बाइक निकाली।
तभी फोन बजा।
Rohan था।
“कहां हो?”
“एक जरूरी काम है।”
“कहां जा रहे हो?”
अर्जुन कुछ सेकंड चुप रहा।
फिर बोला—
“पुराने मंदिर।”
दूसरी तरफ अचानक खामोशी छा गई।
“अर्जुन, अकेले मत जाना।”
“क्यों?”
“क्योंकि मुझे आज फिर एक मैसेज मिला है।”
“क्या?”
Rohan ने तुरंत स्क्रीनशॉट भेजा।
अर्जुन ने मैसेज पढ़ा।
“जिस सच की तलाश तुम कर रहे हो, वह तुम्हारे अपने घर से शुरू होता है।”
अर्जुन का चेहरा गंभीर हो गया।
“तुम्हारे पास ये किसने भेजा?”
“पता नहीं।”
“मैं मंदिर जा रहा हूं।”
“मैं भी आ रहा हूं।”
“नहीं।”
“अर्जुन—”
“तुम अस्पताल के पास रहो। अगर मैं दो घंटे में वापस नहीं आया तो पुलिस को बताना।”
“तुम पागल हो?”
अर्जुन ने फोन काट दिया।
रात के करीब दस बजे पुराने मंदिर के आसपास पूरा इलाका सुनसान था।
अर्जुन ने बाइक कुछ दूर खड़ी की और पैदल मंदिर की तरफ बढ़ा।
हवा में पेड़ों की पत्तियां सरसराती थीं।
मंदिर के अंदर एक भी दीपक नहीं जल रहा था।
अर्जुन ने चारों तरफ देखा।
“रुद्रा!”
उसकी आवाज पूरे मंदिर में गूंज गई।
कोई जवाब नहीं आया।
अर्जुन कुछ कदम आगे बढ़ा।
तभी मंदिर के अंदर से एक धीमी आवाज आई—
“तुम आखिर आ ही गए।”
अर्जुन तुरंत मुड़ा।
लेकिन वहां कोई नहीं था।
“सामने आओ!”
हंसी की हल्की आवाज गूंजी।
“तुम्हें हमेशा से जवाब जल्दी चाहिए थे, अर्जुन।”
अर्जुन के चेहरे पर गुस्सा आ गया।
“मेरा नाम जानने से तुम मुझे डरा नहीं सकते।”
“डराना नहीं चाहता।”
“तो सामने आओ।”
कुछ सेकंड बाद मंदिर के पीछे से एक आदमी बाहर आया।
चेहरा आधा कपड़े से ढका हुआ था।
अर्जुन ने उसे ध्यान से देखा।
“तुम कौन हो?”
उस आदमी ने धीरे से कपड़ा हटाया।
अर्जुन की आंखें फैल गईं।
वह आदमी—
इमरान था।
वही इमरान, जिसने कुछ समय पहले आयत को उसके पिता के बारे में बताया था और फिर अचानक गायब हो गया था।
“तुम?”
इमरान ने कहा—
“हां।”
“तुमने मुझे यहां क्यों बुलाया?”
“क्योंकि अब तुम्हारे पास समय बहुत कम है।”
“रुद्रा कौन है?”
इमरान ने सीधा जवाब नहीं दिया।
उसने जेब से एक पुरानी चाबी निकाली।
“इसे पहचानते हो?”
अर्जुन ने चाबी देखते ही उसे पहचान लिया।
“ये तो मेरे दादाजी के बॉक्स की चाबी है।”
“तुम्हारे दादाजी ने एक चीज छिपाई थी।”
“क्या?”
“सच।”
अर्जुन ने उसका हाथ पकड़ लिया।
“मुझे पहेलियां पसंद नहीं हैं। साफ-साफ बताओ।”
इमरान ने उसकी आंखों में देखा।
“रुद्रा कोई बाहर का दुश्मन नहीं है।”
अर्जुन का चेहरा सख्त हो गया।
“तो?”
इमरान ने धीमी आवाज में कहा—
“रुद्रा तुम्हारे अपने परिवार से जुड़ा हुआ है।”
अर्जुन जैसे जम गया।
“मेरे परिवार से?”
“हां।”
“कौन?”
इमरान कुछ बोलता, उससे पहले मंदिर के बाहर गाड़ी के ब्रेक की आवाज आई।
इमरान का चेहरा अचानक बदल गया।
“वे लोग आ गए।”
“कौन लोग?”
“तुम्हें यहां नहीं होना चाहिए था।”
इमरान पीछे हटने लगा।
अर्जुन ने उसका हाथ पकड़ लिया।
“तुम कहीं नहीं जाओगे।”
इमरान ने झटके से अपना हाथ छुड़ाया।
“अगर मैं पकड़ा गया, तो आयत कभी सुरक्षित नहीं रहेगी।”
“आयत को क्या होगा?”
लेकिन इमरान तब तक मंदिर के पीछे अंधेरे में गायब हो चुका था।
अर्जुन ने बाहर देखा।
एक काली कार मंदिर के सामने आकर रुकी।
उसके अंदर से दो आदमी उतरे।
अर्जुन तुरंत खंभे के पीछे छिप गया।
दोनों आदमी मंदिर के अंदर आए।
एक ने कहा—
“वह लड़का यहां पहुंच चुका है।”
दूसरे ने जवाब दिया—
“उसे जाने मत देना।”
अर्जुन की मुट्ठियां भींच गईं।
तभी उसके फोन पर मैसेज आया।
उसने स्क्रीन देखी।
“अर्जुन, मंदिर से तुरंत निकलो।”
मैसेज भेजने वाला था—
आयत।
अर्जुन चौंक गया।
उसने तुरंत आयत को कॉल किया।
फोन नहीं उठा।
दूसरी बार किया।
फिर भी नहीं।
अर्जुन का दिल तेजी से धड़कने लगा।
उसी समय मंदिर के बाहर से एक तीसरी आवाज आई—
“उसे पकड़ो!”
अर्जुन ने खिड़की से छलांग लगाई और पीछे की तरफ भागा।
लेकिन तभी किसी ने उसका रास्ता रोक लिया।
अर्जुन ने बिना समय गंवाए उस आदमी को धक्का दिया और अंधेरे में भाग निकला।
कुछ दूर जाकर उसने बाइक स्टार्ट की।
उसका दिमाग सिर्फ एक बात सोच रहा था—
आयत ने उसे मंदिर से निकलने के लिए क्यों कहा?
क्या उसे खतरे का पता था?
क्या वह पहले से इस पूरी साजिश के बारे में जानती थी?
या—
क्या किसी ने उसके फोन का इस्तेमाल किया था?
उधर उसी समय आयत अपने हॉस्टल के कमरे में बैठी थी।
उसका फोन उसके हाथ में था।
वह बेचैनी से अर्जुन को कॉल कर रही थी।
“अर्जुन फोन क्यों नहीं उठा रहे?”
उसने फिर कॉल किया।
तभी उसकी नजर अपने फोन की स्क्रीन पर पड़ी।
उसने अभी कुछ देर पहले जो मैसेज अर्जुन को भेजा था—
वह उसके फोन से भेजा ही नहीं गया था।
आयत के चेहरे से रंग उड़ गया।
“ये कैसे...?”
उसने Sent Messages खोले।
मैसेज वहां था।
लेकिन उसने वह मैसेज लिखा ही नहीं था।
तभी उसके कमरे का दरवाजा धीरे-धीरे खुला।
आयत ने डरकर पीछे देखा।
दरवाजे पर कोई नहीं था।
लेकिन जमीन पर एक छोटा-सा लिफाफा पड़ा था।
उसने कांपते हाथों से उसे उठाया।
अंदर एक पुरानी तस्वीर थी।
तस्वीर में छोटी-सी आयत खड़ी थी।
उसके बगल में नासिर खान थे।
और दूसरी तरफ—
रुद्रा।
तस्वीर के पीछे सिर्फ चार शब्द लिखे थे—
“तुम्हारे पिता ने झूठ बोला।”
आयत की सांस रुक गई।
उसी वक्त अर्जुन का फोन आया।
आयत ने तुरंत उठाया।
“अर्जुन!”
दूसरी तरफ अर्जुन की आवाज आई—
“आयत... मुझे तुमसे कुछ पूछना है।”
“क्या?”
कुछ सेकंड की खामोशी।
फिर अर्जुन ने पूछा—
“क्या तुम रुद्रा को जानती हो?”
आयत के हाथ से तस्वीर जमीन पर गिर गई।
उसकी आंखों में डर उतर आया।
“नहीं... अर्जुन। मैं उसे नहीं जानती।”
लेकिन वह नहीं जानती थी कि—
अंधेरे में खड़ा कोई व्यक्ति उसकी सारी बातचीत सुन रहा था।
और उसके चेहरे पर एक खतरनाक मुस्कान थी।
क्योंकि अर्जुन और आयत के बीच शक की पहली दरार अब एक बड़े तूफान में बदलने वाली थी।
जारी रहेगा...