Mr. Ms. Fake - एपिसोड 36 kajal jha द्वारा हास्य कथाएं में हिंदी पीडीएफ

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Mr. Ms. Fake - एपिसोड 36

Mr. & Ms. Fake

Episode 36 – The Man in the Mansion

सुबह के करीब छह बजे...

आर्यवीर की कार सिंह हाउस के बाहर आकर रुकी।

पूरी रात दोनों ने ठीक से नींद नहीं ली थी।

सान्वी पिछली सीट पर बैठी खिड़की से बाहर देख रही थी।

उसके हाथ में वही पुरानी तस्वीर थी।

तस्वीर में एक छोटी-सी बच्ची थी।

और पीछे लिखा था—

"मेरी बेटी, मेरी सान्वी।"

लेकिन अब एक सवाल सबकुछ बदल चुका था।

क्या उस बच्ची का पिता अमन शर्मा नहीं था?

क्या उसका असली पिता...

राजवीर मल्होत्रा था?

आर्यवीर ने शीशे में उसे देखा।

"डर लग रहा है?"

सान्वी ने कुछ पल बाद जवाब दिया—

"हाँ।"

"बहुत?"

"इतना कि अगर मैं ज्यादा सोचूँ तो शायद कार से उतर ही न पाऊँ।"

आर्यवीर ने हल्की मुस्कान के साथ कहा—

"तो मत सोचो।"

"क्या?"

"बस मेरे साथ रहो।"

सान्वी ने उसकी तरफ देखा।

"तुम हर बार इतनी आसानी से बातें कैसे कह देते हो?"

"क्योंकि अगर मैं भी डरने लगा..."

वह उसकी तरफ देखकर बोला—

"तो तुम्हें कौन संभालेगा?"

सान्वी मुस्कुरा दी।

"तुम बहुत अच्छे boyfriend बनने लगे हो।"

आर्यवीर ने तुरंत कहा—

"Fake boyfriend."

सान्वी ने मुस्कुराकर कहा—

"अभी तक।"

आर्यवीर ने ब्रेक हल्का दबाया।

"क्या मतलब?"

सान्वी ने खिड़की की तरफ देखते हुए कहा—

"कुछ नहीं।"

आर्यवीर मुस्कुराया।

"ठीक है।"

पुरानी मल्होत्रा हवेली

करीब एक घंटे बाद कार एक सुनसान इलाके में पहुँची।

सड़क के दोनों तरफ ऊँचे पेड़ थे।

सामने एक बहुत पुरानी हवेली खड़ी थी।

लोहे का गेट जंग खा चुका था।

ऊपर पत्थर पर लिखा था—

MALHOTRA ESTATE

सान्वी ने हवेली को देखते ही कहा—

"यहाँ कोई रहता है?"

आर्यवीर ने कहा—

"पता नहीं।"

"और हम अंदर जा रहे हैं?"

"हाँ।"

"बिना बुलाए?"

"हाँ।"

"तुम्हें कानून का डर नहीं?"

आर्यवीर ने मुस्कुराकर कहा—

"तुम साथ हो।"

सान्वी ने उसे घूरा।

"मेरे साथ होने से कानून तुम्हें माफ कर देगा?"

"नहीं।"

"फिर?"

"कम से कम जेल में तुम मेरे साथ रहोगी।"

सान्वी ने उसे कुशन मारने के लिए पीछे देखा।

"कुशन है ही नहीं!"

आर्यवीर हँस पड़ा।

तनाव के बीच भी उसकी हँसी सुनकर सान्वी मुस्कुरा दी।

दोनों हवेली के अंदर पहुँचे।

अंदर धूल जमी थी।

दीवारों पर पुरानी तस्वीरें लगी थीं।

सान्वी धीरे-धीरे आगे बढ़ रही थी।

तभी उसकी नजर एक तस्वीर पर पड़ी।

उस तस्वीर में एक जवान आदमी खड़ा था।

उसके साथ माधवी थी।

और बीच में एक छोटी बच्ची।

सान्वी की साँस अटक गई।

"ये मैं हूँ।"

आर्यवीर ने तस्वीर देखी।

नीचे तारीख लिखी थी—

15 July, 1998

सान्वी ने तस्वीर को छुआ।

"माँ ने ये तस्वीर कभी मुझे नहीं दिखाई।"

आर्यवीर ने कहा—

"क्योंकि शायद वो चाहती थीं कि तुम इसे कभी देखो ही नहीं।"

तभी...

ऊपर से किसी चीज़ के गिरने की आवाज़ आई।

धड़ाम!

सान्वी चौंक गई।

उसने तुरंत आर्यवीर का हाथ पकड़ लिया।

"कोई है।"

आर्यवीर ने कहा—

"हाँ।"

"तुम्हें कैसे पता?"

"क्योंकि अगर कोई नहीं होता..."

वह ऊपर देखने लगा।

"...तो चीज़ खुद नहीं गिरती।"

सान्वी ने धीरे से कहा—

"बहुत मजाकिया हो।"

"डर कम हो रहा है?"

"नहीं।"

"कोशिश तो की।"

ऊपर का कमरा

दोनों धीरे-धीरे सीढ़ियाँ चढ़े।

ऊपर एक दरवाज़ा आधा खुला था।

आर्यवीर ने दरवाज़ा धक्का देकर खोला।

कमरे के अंदर...

एक आदमी खिड़की के पास खड़ा था।

उसकी पीठ उनकी तरफ थी।

सान्वी की धड़कन रुक गई।

आदमी धीरे-धीरे पलटा।

सफेद होते बाल...

चेहरे पर पुराने घाव का निशान...

और आँखों में अजीब-सी गहराई।

सान्वी के हाथ काँपने लगे।

उस आदमी ने उसे देखा।

उसकी आँखें भर आईं।

उसके होंठ काँपे।

"सान्वी..."

सान्वी जैसे पत्थर बन गई।

आर्यवीर ने उसकी तरफ देखा।

आदमी धीरे-धीरे आगे बढ़ा।

"तुम सच में बड़ी हो गई हो।"

सान्वी के होंठ काँप रहे थे।

"आप..."

उसकी आवाज़ नहीं निकली।

आदमी ने कहा—

"मैं तुम्हारा इंतजार कर रहा था।"

सान्वी की आँखों से आँसू बहने लगे।

"आप... राजवीर हैं?"

आदमी ने सिर हिलाया।

"हाँ।"

सान्वी एक कदम पीछे हट गई।

"तो आप मेरे पिता हैं?"

राजवीर ने आँखें बंद कर लीं।

"हाँ।"

बस एक शब्द...

और सान्वी की पूरी दुनिया जैसे बदल गई।

सान्वी की आँखों में आँसू थे।

"आपने मुझे इतने सालों तक क्यों नहीं ढूँढ़ा?"

राजवीर चुप रहा।

"आपको पता था मैं जिंदा हूँ?"

"हाँ।"

"तो फिर?"

राजवीर की आवाज़ टूट गई।

"क्योंकि मुझे डर था कि मेरे पास आने से तुम मर जाओगी।"

सान्वी ने गुस्से में कहा—

"और मेरे बिना रहने से?"

राजवीर के पास कोई जवाब नहीं था।

सान्वी रोते हुए बोली—

"मुझे पापा चाहिए थे।"

"हर जन्मदिन पर।"

"हर स्कूल फंक्शन में।"

"हर बार जब मैं बाकी बच्चों को उनके पिता के साथ देखती थी..."

वह रो पड़ी।

"तब भी चाहिए थे।"

राजवीर की आँखों से भी आँसू बहने लगे।

वह उसके पास आया।

"मुझे माफ कर दो।"

सान्वी पीछे हट गई।

"मुझे नहीं पता मैं आपको माफ कर पाऊँगी या नहीं।"

राजवीर ने सिर झुका लिया।

आर्यवीर अब तक चुप था।

लेकिन उसने सान्वी के कंधे पर हाथ रख दिया।

राजवीर ने आर्यवीर की तरफ देखा।

"तुम..."

आर्यवीर ने कहा—

"आर्यवीर सिंह।"

राजवीर कुछ सेकंड उसे देखता रहा।

फिर अचानक उसके चेहरे पर अजीब-सी मुस्कान आई।

"तो तुम हो..."

आर्यवीर ने पूछा—

"क्या?"

राजवीर ने कहा—

"जिस लड़के के बारे में अमन मुझे बताया करता था।"

आर्यवीर चौंका।

"आप अमन को जानते थे?"

"वो मेरा दोस्त था।"

"और तुम्हारे पिता भी।"

आर्यवीर ने पूछा—

"फिर मेरे पिता ने आपको मरा हुआ क्यों बताया?"

राजवीर की मुस्कान गायब हो गई।

"क्योंकि उन्हें भी यही बताया गया था।"

"क्या?"

"कि मैं मर चुका हूँ।"

सच्चाई का पहला टुकड़ा

राजवीर ने एक पुराना बॉक्स खोला।

अंदर कई कागज़ थे।

उसने एक फाइल आर्यवीर को दी।

"ये देखो।"

आर्यवीर ने फाइल खोली।

अंदर उसके पिता के सिग्नेचर थे।

लेकिन नीचे किसी और की लिखावट थी।

"Operation R – Keep Rajveer Missing."

आर्यवीर का चेहरा कठोर हो गया।

"ऑपरेशन R?"

राजवीर ने कहा—

"मुझे गायब रखने की योजना।"

सान्वी ने पूछा—

"किसने बनाई थी?"

राजवीर ने उसकी तरफ देखा।

"तुम्हारे पिता अमन और मेरे भाई समर ने नहीं।"

"तो?"

राजवीर ने धीरे से कहा—

"तुम्हारे पिता की मौत के पीछे जो आदमी है..."

"वही इसके पीछे भी है।"

सान्वी ने पूछा—

"कौन?"

राजवीर कुछ कहने ही वाला था कि अचानक हवेली की बिजली चली गई।

अंधेरा छा गया।

आर्यवीर ने तुरंत सान्वी को अपने पीछे कर लिया।

"कोई यहाँ आया है।"

राजवीर ने कहा—

"वो हमें ढूँढ़ते हुए यहाँ पहुँच गया।"

अचानक नीचे से काँच टूटने की आवाज़ आई।

छन्न्न!

सान्वी डर गई।

"कौन है?"

राजवीर ने कहा—

"समर।"

आर्यवीर ने कहा—

"वो यहाँ कैसे पहुँचा?"

राजवीर ने गंभीर आवाज़ में कहा—

"क्योंकि हमारे बीच कोई ऐसा है..."

"...जो हर कदम की खबर उसे देता है।"

आर्यवीर की आँखें सिकुड़ गईं।

"रिया?"

राजवीर ने कहा—

"शायद।"

नीचे

कदमों की आवाज़ तेज होती जा रही थी।

आर्यवीर ने सान्वी का हाथ पकड़ा।

"मेरे साथ रहना।"

सान्वी ने सिर हिलाया।

लेकिन तभी...

नीचे से रिया की आवाज़ आई—

"सान्वी!"

सान्वी स्तब्ध रह गई।

"रिया?"

आर्यवीर ने उसे रोक दिया।

"नीचे मत जाना।"

रिया चिल्लाई—

"सान्वी, मेरी बात सुनो!"

"समर तुम्हें मारने नहीं आया है।"

"वो राजवीर को लेने आया है।"

राजवीर ने खिड़की की तरफ देखा।

"वो अकेला नहीं है।"

अचानक गोली चलने की आवाज़ आई।

धाँय!

सान्वी चीख पड़ी।

आर्यवीर ने उसे अपने सीने से लगा लिया।

"कुछ नहीं हुआ।"

लेकिन गोली दीवार में लगी थी।

राजवीर ने तुरंत कहा—

"हमें पीछे वाले रास्ते से निकलना होगा।"

तीनों कमरे से बाहर निकलने लगे।

लेकिन सीढ़ियों के पास पहुँचते ही...

समर सामने खड़ा था।

उसके हाथ में बंदूक थी।

उसकी नजर सीधे राजवीर पर थी।

"आखिर मिल ही गए।"

राजवीर ने कहा—

"तुमने बहुत देर कर दी, समर।"

समर हँसा।

"देर हुई है..."

"लेकिन खेल अभी खत्म नहीं हुआ।"

सान्वी आर्यवीर के पीछे खड़ी थी।

समर की नजर उस पर गई।

"तुम्हें सच पता चल गया?"

सान्वी ने काँपते हुए कहा—

"हाँ।"

"तुम मेरे पिता को मारना चाहते थे?"

समर ने कहा—

"नहीं।"

"मैं सिर्फ़ उन्हें चुप रखना चाहता था।"

सान्वी का चेहरा बदल गया।

"किस बात पर?"

समर मुस्कुराया।

"तुम्हारे असली पिता के बारे में।"

राजवीर ने गुस्से से कहा—

"बस!"

समर ने उसकी तरफ देखा।

"अब छुपाने का कोई फायदा नहीं।"

फिर उसने सान्वी की तरफ देखा।

"राजवीर तुम्हारे पिता हैं..."

"लेकिन तुम्हारी माँ ने तुम्हें जन्म देने से पहले..."

वह रुका।

"एक और बच्ची को जन्म दिया था।"

सान्वी की आँखें फैल गईं।

"क्या?"

आर्यवीर ने कहा—

"समर, चुप रहो।"

समर हँसा।

"क्यों?"

"अब उसे सब पता चलना चाहिए।"

उसने आखिरी बात कही—

"सान्वी की एक जुड़वाँ बहन भी है।"

सान्वी की आँखें फैल गईं।

"मेरी... बहन?"

समर ने कहा—

"हाँ।"

"और वो..."

वह मुस्कुराया।

"आज भी जिंदा है।"

सान्वी की साँस जैसे रुक गई।

राजवीर ने आँखें बंद कर लीं।

आर्यवीर ने सान्वी का हाथ कसकर पकड़ लिया।

और तभी...

सीढ़ियों के पीछे से एक लड़की बाहर आई।

वही चेहरा...

वही आँखें...

वही मुस्कान...

जिसे सान्वी ने अपनी बचपन की तस्वीरों में देखा था।

लड़की ने सान्वी को देखा और कहा—

"हैलो, दीदी।"

सान्वी के हाथ से आर्यवीर का हाथ छूट गया।

क्रमशः...