चौहान कंपनी में दोपहर का समय था। संयोगिता अपने केबिन में बैठी काम कर रही थी। उसके सामने कई फाइलें खुली थीं।
लेकिन उसके चेहरे पर हमेशा की तरह वही शांति थी।
कोई कर्मचारी किसी काम के लिए उसके पास आता—
मैम, इस रिपोर्ट में एक बदलाव चाहिए।
संयोगिता तुरंत नरम आवाज़ में कहती—
ठीक है। आप परेशान मत होइए, मैं देख लेती हूँ।
वो किसी कर्मचारी पर बेवजह गुस्सा नहीं करती थी। हर किसी से बहुत सम्मान से बात करती। इसी वजह से धीरे-धीरे पूरे ऑफिस के लोग उसे पसंद करने लगे थे। एक दिन दो पुराने कर्मचारी आपस में बात कर रहे थे। एक ने संयोगिता को केबिन से बाहर आते देखा। वो कुछ पल उसे देखता रहा।
फिर धीमे से बोला—
पता है… जब भी मैम को देखता हूँ ना, संपूर्णा मैम की याद आ जाती है।
दूसरे कर्मचारी ने भी संयोगिता की तरफ देखा।
दूसरा कर्मचारी बोला -
चेहरा तो बिल्कुल वैसा ही है।
फिर उसने हल्की मुस्कान के साथ कहा—
लेकिन एक फर्क है।
संपूर्णा मैम हर वक्त हँसती रहती थीं।
कुछ पुराने कर्मचारी संपूर्णा को याद करने लगे। संपूर्णा ऑफिस में हमेशा खुश रहती थी। किसी कर्मचारी की परेशानी सुनना…छोटी-छोटी बातों पर हँसना…सबको motivate करना…और कभी-कभी तो काम के बीच पूरे ऑफिस का माहौल ही बदल देना। वो सिर्फ CEO नहीं थी। लोग उसे अपने परिवार जैसा मानते थे।
संयोगिता भी लोगों का ध्यान रखती थी। लेकिन उसका तरीका अलग था। वो शांत रहती। कम बोलती। बेवजह नहीं हँसती।
किसी की मदद करती तो बिना किसी दिखावे के।
एक कर्मचारी ने धीरे से कहा—
संपूर्णा मैम दिल से बहुत खुश रहने वाली थीं…
दूसरे ने संयोगिता की तरफ देखकर कहा—
और संयोगिता मैम… जैसे बहुत कुछ अपने अंदर छिपाकर रखती हैं।
दोनों कुछ पल चुप हो गए। उसी समय विराट वहाँ से गुजर रहा था। उसने कर्मचारियों की बात सुन ली। वो कुछ पल रुक गया। उसकी नजर संयोगिता के केबिन पर गई। अंदर संयोगिता एक कर्मचारी की समस्या ध्यान से सुन रही थी। उसके चेहरे पर हल्की गंभीरता थी। विराट के मन में अचानक संपूर्णा की तस्वीर आ गई। संपूर्णा भी इसी तरह कर्मचारियों की बातें सुना करती थी। बस अंतर इतना था संपूर्णा हर बात के बीच मुस्कुरा देती थी। और संयोगिता…हर बात को खामोशी से अपने अंदर रख लेती थी। तभी संयोगिता ने कर्मचारी की परेशानी का समाधान बताया। कर्मचारी ने राहत की साँस ली।
कर्मचारी बोला -
Thank you, मैम।
संयोगिता ने पहली बार हल्की सी मुस्कान दी।
संयोगिता बोली -
कोई बात नहीं। अगली बार ऐसी गलती मत करना।
कर्मचारी मुस्कुराता हुआ बाहर चला गया। विराट दूर से उसे देख रहा था। उसके चेहरे पर भी हल्की मुस्कान आ गई।
विराट (मन में) बोला -
संपूर्णा जैसी बिल्कुल नहीं हो…
वो कुछ पल उसे देखता रहा।
वो बोला -
लेकिन शायद… तुम्हारे अंदर भी उतनी ही अच्छाई है।
विराट आगे बढ़ गया। और संयोगिता को पता भी नहीं चला कि कोई उसे देखकर संपूर्णा को याद कर रहा था।
सुबह का समय था। चौहान हवेली में सब अपने-अपने काम में व्यस्त थे। लेकिन बैठक में विवान लगातार रोए जा रहा था।
उसकी आँखों से आँसू रुकने का नाम ही नहीं ले रहे थे।
विवान बोला -
मुझे मिल्कशेक चाहिए!
विराट उसके सामने बैठा था।
विराट बोला -
बेटा, सुबह-सुबह मिल्कशेक नहीं पीते। कुछ खा लो, फिर बना देंगे।
विवान ने रोते हुए सिर हिला दिया।
विवान बोला -
नहीं! मुझे अभी चाहिए!
विराट ने उसे गोद में उठा लिया।
विराट बोला -
अच्छा, रोओ मत। मैं तुम्हारे लिए कुछ और बनवा देता हूँ।
लेकिन विवान ने अपना चेहरा उसके कंधे में छिपा लिया।
विवान बोला -
मुझे मम्मा चाहिए…
विराट कुछ पल के लिए चुप हो गया। उसी समय विराट का फोन बजा। स्क्रीन पर नाम था—संयोगिता। विराट ने कॉल उठा ली।
विराट बोला -
हैलो, संयोगिता।
दूसरी तरफ से संयोगिता की शांत आवाज़ आई—
सुप्रभात, Mr. Chauhan। आज ऑफिस कब आ रहे हैं?
विराट कुछ कह पाता, उससे पहले ही फोन पर विवान के रोने की आवाज़ साफ सुनाई दी। संयोगिता तुरंत चुप हो गई।
संयोगिता बोली -
विवान रो रहा है?
उसकी आवाज़ में अचानक बेचैनी आ गई।
विराट ने विवान को देखते हुए कहा—
हाँ… सुबह से रो रहा है।
संयोगिता बोली -
क्या हुआ उसे?
विराट बोला -
इसे मिल्कशेक चाहिए था। किसी ने नहीं दिया, तो नाराज़ होकर रोने लगा। अब मिल्कशेक भी नहीं पी रहा।
दूसरी तरफ कुछ पल खामोशी रही।
फिर संयोगिता ने बिना किसी झिझक के कहा—
आप उसे फोन दीजिए।
विराट ने फोन विवान के पास कर दिया।
विराट बोला -
विवान, मम्मा से बात करो।
विवान ने रोते-रोते फोन पकड़ लिया।
विवान बोला -
मम्मा…
उसकी आवाज़ सुनते ही संयोगिता का दिल भर आया।
संयोगिता ने बहुत प्यार से कहा -
बस… अब रोना बंद करो।
विवान सुबकते हुए बोला—
मुझे मिल्कशेक चाहिए…
संयोगिता हल्का सा मुस्कुराई।
संयोगिता बोली -
अच्छा, मेरी बात मानोगे?
विवान ने तुरंत सिर हिलाया।
विवान बोला -
हाँ।
संयोगिता ने एक पल सोचा।
फिर बोली—
ठीक है। तुम पापा के पास रहो।
विराट ने फोन वापस अपने हाथ में ले लिया।
विराट बोला -
क्या हुआ?
संयोगिता की आवाज़ बिल्कुल स्पष्ट थी—
मैं अभी आई।
विराट थोड़ा चौंका।
विराट बोला -
अभी? लेकिन आपकी तो—
संयोगिता ने उसकी बात पूरी होने से पहले ही कहा—
विवान रो रहा है ना… मैं उसे ऐसे नहीं छोड़ सकती।
कॉल कट हो गई। विराट कुछ सेकंड फोन को देखता रहा। फिर उसने विवान की तरफ देखा। विवान अभी भी सुबक रहा था।
विराट ने उसके बालों पर हाथ फेरा।
विराट बोला -
तुम्हारी मम्मा सच में बहुत जल्दी आ रही हैं।
विवान के रोते हुए चेहरे पर हल्की मुस्कान आई।
विवान बोला -
मम्मा मिल्कशेक बनाएंगी?
विराट हँस पड़ा।
विराट बोला -
हाँ… शायद तुम्हारे लिए पूरा कैफ़े ही खोल देंगी।
विवान पहली बार थोड़ा हँसा। और विराट के मन में एक अजीब सा एहसास हुआ। संपूर्णा के जाने के बाद पहली बार किसी ने विवान की आवाज़ सुनते ही इतनी बेचैनी दिखाई थी।
वो सोचने लगा—
संयोगिता… तुम विवान के लिए इतनी जल्दी सब छोड़कर क्यों चली आती हो?