Mr. Ms. Fake - एपिसोड 34 kajal jha द्वारा हास्य कथाएं में हिंदी पीडीएफ

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Mr. Ms. Fake - एपिसोड 34

Mr. & Ms. Fake

Episode 34 – The Name Behind “R”

रात के करीब ग्यारह बज चुके थे।

सिंह हाउस के स्टडी रूम में सिर्फ एक टेबल लैंप जल रहा था।

टेबल पर कई पुरानी फाइलें फैली थीं।

सान्वी एक फाइल के आखिरी पन्ने को लगातार देख रही थी।

उस पन्ने पर सिर्फ एक अक्षर बचा था—

R

बाकी नाम काले रंग से मिटा दिया गया था।

सान्वी ने धीरे से पूछा—

"क्या तुम्हें लगता है ये सिर्फ एक अक्षर है?"

आर्यवीर ने पन्ने को ध्यान से देखा।

"नहीं।"

"मुझे लगता है..."

वह रुका।

"यही वो नाम है जिसे इतने सालों से छुपाया गया है।"

सान्वी ने बेचैनी से पूछा—

"लेकिन R किसका हो सकता है?"

आर्यवीर ने कहा—

"अभी पता नहीं।"

सान्वी ने लंबी साँस ली।

"मेरी जिंदगी में हर दूसरा आदमी रहस्य क्यों है?"

आर्यवीर हँस पड़ा।

"क्योंकि तुम्हारी जिंदगी साधारण नहीं है।"

सान्वी ने उसे घूरा।

"और तुम्हारी?"

"मेरी जिंदगी तो तुम्हारे आने के बाद बिल्कुल भी साधारण नहीं रही।"

सान्वी के चेहरे पर हल्की मुस्कान आ गई।

"अच्छा?"

"हाँ।"

"पहले क्या करते थे?"

"सुबह उठता था। ऑफिस जाता था। काम करता था। वापस आता था। सो जाता था।"

सान्वी ने कहा—

"और अब?"

आर्यवीर ने उसे देखते हुए कहा—

"अब सुबह उठते ही देखना पड़ता है कि मेरी नकली गर्लफ्रेंड ने आज कौन-सी मुसीबत खड़ी की है।"

सान्वी ने तुरंत पास रखा कुशन उठाकर उसे मार दिया।

"मैं मुसीबत हूँ?"

आर्यवीर ने कुशन पकड़ लिया।

"बहुत बड़ी।"

सान्वी ने दूसरा कुशन उठाया।

"अब बताओ!"

आर्यवीर पीछे हट गया।

"अरे! फाइलें हैं!"

"मुझे नहीं पता।"

"सान्वी!"

वह हँसते हुए उसे मारने लगी।

कुछ ही सेकंड में पूरा स्टडी रूम बिखर गया।

फाइलें नीचे गिर गईं।

एक पुरानी फोटो भी फर्श पर आ गिरी।

दोनों अचानक रुक गए।

आर्यवीर ने फोटो उठाई।

उसमें चार लोग थे—

अमन शर्मा।

माधवी।

आर्यवीर के पिता।

और...

एक छोटा बच्चा।

सान्वी ने फोटो देखते ही कहा—

"ये बच्चा कौन है?"

आर्यवीर ने फोटो पलटी।

पीछे लिखा था—

"R – 1998"

दोनों की नजरें एक-दूसरे से मिलीं।

"R..."

सान्वी की आवाज़ धीमी हो गई।

"क्या ये वही R है?"

अगली सुबह

दादी ने फोटो देखते ही उसे अपने हाथ से लगभग गिरा दिया।

उनका चेहरा अचानक बदल गया।

आर्यवीर ने तुरंत पूछा—

"दादी, आप इस बच्चे को जानती हैं?"

दादी चुप रहीं।

सान्वी उनके सामने बैठ गई।

"दादी, प्लीज़।"

"अब और कुछ मत छुपाइए।"

दादी ने तस्वीर को देखा।

फिर धीरे से कहा—

"इस बच्चे का नाम..."

वह रुक गईं।

"राघव।"

आर्यवीर ने पूछा—

"राघव कौन?"

दादी की आँखों में पुरानी यादें उतर आईं।

"तुम्हारे पिता का सबसे करीबी दोस्त।"

"अमन का भी।"

सान्वी ने पूछा—

"और समर?"

दादी ने सिर हिलाया।

"राघव और समर एक-दूसरे के दुश्मन थे।"

आर्यवीर ने तस्वीर की तरफ देखा।

"तो ये राघव कहाँ है?"

दादी ने बहुत धीमे कहा—

"मर चुका है।"

सान्वी चौंक गई।

"कब?"

"उसी साल..."

"जिस साल तुम्हारा जन्म हुआ था।"

कमरे में सन्नाटा छा गया।

आर्यवीर ने पूछा—

"और उसका सान्वी से क्या रिश्ता था?"

दादी ने उसकी तरफ देखा।

"यही तो मैं नहीं जानती।"

सान्वी ने कहा—

"लेकिन मेरी माँ और पापा उसे जानते थे।"

"और मेरे जन्म रिकॉर्ड में R क्यों है?"

दादी ने कोई जवाब नहीं दिया।

तभी माधवी कमरे में आईं।

उन्होंने आखिरी बात सुन ली थी।

"क्योंकि..."

सबकी नजर उनकी तरफ गई।

माधवी ने कहा—

"राघव तुम्हारे पिता का दोस्त नहीं था।"

आर्यवीर चौंका।

"तो?"

माधवी ने सान्वी की तरफ देखा।

"वो तुम्हारी माँ का भाई था।"

सान्वी की आँखें फैल गईं।

"मेरी माँ का... भाई?"

माधवी ने सिर हिलाया।

"हाँ।"

"राघव तुम्हारा मामा था।"

सान्वी की आँखों में आँसू आ गए।

"फिर वो कैसे मरा?"

माधवी चुप हो गईं।

कुछ पल बाद बोलीं—

"उसने मुझे बचाते हुए अपनी जान गंवाई थी।"

आर्यवीर ने पूछा—

"किससे?"

माधवी ने सिर्फ एक नाम लिया—

"समर।"

दोपहर

आर्यवीर ऑफिस जाने के लिए तैयार था।

सान्वी उसके पीछे-पीछे घूम रही थी।

"मैं भी चलूँगी।"

आर्यवी ने कहा—

"नहीं।"

"क्यों?"

"क्योंकि तुम्हें आराम चाहिए।"

"मैं ठीक हूँ।"

"तुम कल पूरी रात नहीं सोई।"

"तुम भी नहीं सोए।"

"मैं मजबूत हूँ।"

सान्वी ने भौंह उठाई।

"ओह!"

"तो मैं कमजोर हूँ?"

आर्यवी मुस्कुराया।

"नहीं।"

"तुम खतरनाक हो।"

सान्वी ने उसकी टाई खींच दी।

"और तुम बहुत बोलते हो।"

आर्यवी ने उसकी कलाई पकड़ ली।

दोनों अचानक बहुत करीब आ गए।

कुछ पल के लिए दोनों चुप हो गए।

सान्वी ने धीमे से कहा—

"छोड़ो..."

आर्यवी ने उसकी आँखों में देखते हुए पूछा—

"सच में?"

सान्वी ने नजरें झुका लीं।

"नहीं..."

आर्यवी मुस्कुराया।

"क्या?"

सान्वी ने धीरे से कहा—

"बस ऐसे ही पकड़े रहो।"

दोनों के चेहरे पर मुस्कान आ गई।

तभी दरवाज़ा खुला।

कबीर अंदर आ गया।

"ओह!"

दोनों तुरंत अलग हो गए।

कबीर ने हाथ उठाया।

"सॉरी।"

"मुझे लगा यहाँ मीटिंग चल रही है।"

आर्यवीर ने घूरा।

"बाहर जाओ।"

कबीर हँसते हुए बोला—

"मीटिंग जारी रखो।"

सान्वी का चेहरा लाल हो गया।

शाम

देवेंद्र एक पुरानी अलमारी खोल रहे थे।

उन्हें एक छोटा लकड़ी का बॉक्स मिला।

बॉक्स के ऊपर लिखा था—

R.S.

उन्होंने उसे खोला।

अंदर एक पुरानी चाबी थी।

और एक छोटा कागज़।

उस पर लिखा था—

"अगर सान्वी कभी अपने पिता की सच्चाई तक पहुँच जाए, तो उसे ये चाबी देना।"

देवेंद्र का चेहरा बदल गया।

"सान्वी..."

उन्होंने तुरंत आर्यवीर को फोन किया।

लेकिन फोन नहीं उठा।

उन्होंने दोबारा कोशिश की।

फिर भी नहीं।

देवेंद्र ने बॉक्स बंद किया और सीधे सान्वी के कमरे की तरफ बढ़े।

लेकिन रास्ते में...

रिया उनसे टकरा गई।

बॉक्स उनके हाथ से लगभग गिर गया।

रिया ने उसे पकड़ लिया।

"ताऊजी, ये क्या है?"

देवेंद्र ने तुरंत बॉक्स वापस ले लिया।

"कुछ नहीं।"

रिया ने मुस्कुराकर कहा—

"आप मुझसे कुछ छुपा रहे हैं।"

देवेंद्र ने उसकी आँखों में देखा।

"तुम्हें जितना पता है..."

"उससे ज्यादा जानने की कोशिश मत करो।"

रिया के चेहरे पर हल्की मुस्कान आई।

"क्यों?"

"कहीं ऐसा न हो कि सच आपको भी डरा दे।"

देवेंद्र वहाँ से चले गए।

रिया की नजर बॉक्स पर टिक गई।

उसने मन में कहा—

"अब तो मुझे ये जानना ही होगा कि इसमें क्या है।"

रात

सान्वी अपने कमरे में थी।

अचानक खिड़की पर हल्की दस्तक हुई।

टक... टक...

सान्वी घबरा गई।

उसने पर्दा हटाया।

बाहर कोई नहीं था।

नीचे फर्श पर एक लिफाफा पड़ा था।

उसने लिफाफा खोला।

अंदर एक पुरानी तस्वीर थी।

तस्वीर में माधवी...

राघव...

और एक नवजात बच्ची थी।

पीछे लिखा था—

"तुम्हें तुम्हारे पिता से दूर किया गया था..."

"लेकिन तुम्हारी माँ से भी एक सच छुपाया गया था।"

नीचे सिर्फ एक लाइन थी—

"तुम्हारे पिता अमन शर्मा नहीं थे।"

सान्वी के हाथ से तस्वीर गिर गई।

उसकी साँस रुक गई।

"नहीं..."

"ये झूठ है।"

तभी पीछे से आवाज़ आई—

"सान्वी?"

आर्यवीर कमरे में आया।

उसने उसे देखा।

सान्वी की आँखों से आँसू बह रहे थे।

"क्या हुआ?"

सान्वी ने तस्वीर उसकी तरफ बढ़ा दी।

आर्यवीर ने उसे पढ़ा।

उसका चेहरा भी बदल गया।

"ये किसने भेजा?"

सान्वी ने सिर हिलाया।

"मुझे नहीं पता।"

आर्यवीर ने उसे अपने पास खींच लिया।

"हम पता लगाएंगे।"

सान्वी ने उसका सीना पकड़ लिया।

"अगर पापा मेरे पिता नहीं थे तो?"

"अगर मेरी पूरी जिंदगी झूठ थी तो?"

आर्यवीर ने उसके सिर पर हाथ रखा।

"तो हम सच ढूँढ़ेंगे।"

"लेकिन एक बात कभी मत भूलना।"

सान्वी ने उसकी तरफ देखा।

"क्या?"

"तुम्हारी पहचान किसी कागज़ से तय नहीं होती।"

"तुम सान्वी हो।"

"मेरे लिए बस इतना ही काफी है।"

सान्वी उसकी बाँहों में सिमट गई।

लेकिन उसी समय...

सिंह हाउस के बाहर एक काली कार खड़ी थी।

कार के अंदर समर बैठा था।

उसके हाथ में वही तस्वीर थी जो सान्वी को भेजी गई थी।

उसने फोन पर किसी से कहा—

"पहला सच उसे पता चल गया।"

दूसरी तरफ से पूछा गया—

"और अगला?"

समर मुस्कुराया।

"अगला सच..."

"उसे आर्यवीर से दूर कर देगा।"

फोन कट गया।

समर ने तस्वीर को देखा।

फिर धीरे से बोला—

"अमन शर्मा तुम्हारे पिता नहीं थे, सान्वी..."

"लेकिन अगर तुमने अपने असली पिता का नाम जान लिया..."

उसकी मुस्कान गायब हो गई।

"तो तुम खुद आर्यवीर से नफरत करने लगोगी।"

और उसी वक्त...

सिंह हाउस के अंदर रिया ने देवेंद्र के कमरे का दरवाज़ा खोल लिया।

उसकी नजर लकड़ी के बॉक्स पर पड़ी।

रिया ने धीरे से बॉक्स उठाया।

ढक्कन खोला।

अंदर वही चाबी थी।

और चाबी के नीचे एक छोटी-सी पर्ची।

उस पर सिर्फ़ लिखा था—

"Room 17 – The Royal Hotel."

रिया की आँखों में चमक आ गई।

"तो असली राज़ वहाँ छिपा है..."

लेकिन वह नहीं जानती थी...

कि कमरे के बाहर सान्वी खड़ी थी।

और उसने रिया के हाथ में वह चाबी देख ली थी।

सान्वी ने चुपचाप फोन निकाला।

उसने आर्यवीर को सिर्फ़ एक मैसेज भेजा—

"मुझे लगता है, हमें रिया का पीछा करना चाहिए।"

कुछ सेकंड बाद जवाब आया—

"मैं तुम्हारे साथ हूँ। हमेशा।"

सान्वी के चेहरे पर हल्की मुस्कान आई।

लेकिन अगले ही पल...

उसने रिया को बॉक्स लेकर घर से बाहर जाते देख लिया।

और दोनों ने तय किया—

आज रात वे रिया का पीछा करेंगे।

क्योंकि Room 17 में शायद सान्वी के जन्म का वो सच छिपा था...

जो अब तक हर किसी से छुपाया गया था।

क्रमशः...