अधूरापन - 19 Falguni Dost द्वारा प्रेरक कथा में हिंदी पीडीएफ

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अधूरापन - 19

अध्याय-१९

राजेश औपचारिकताएँ पूरी करने के बाद सीधा अमृता के पास गया था। अमृता का हाथ पकड़कर बोला, "मुझे तुम्हारा साथ चाहिए इसीलिए मैंने तुम्हारा हाथ पकड़ा है, बाकी तुम सक्षम ही हो इन सभी कसौटियों से बाहर निकलने के लिए... लेकिन अब तुम्हारे बिना मैं नहीं जी पाऊँगा। मुझे मेरे उठने से लेकर सोने तक तुम्हारा चेहरा मेरी आँखों के सामने चाहिए... तुम..."

राजेश अभी बोल ही रहा था, लेकिन अमृता ने अपना हाथ राजेश के होठों पर रखकर उसकी बात अधूरी छोड़ते हुए खुद बोलने लगी, "किसने कहा कि मैं आपके साथ के बिना रह पाऊँगी अब??" इतना बोलकर असहनीय पीड़ा में भी अमृता के चेहरे पर राजेश के प्रति प्रेम का भाव छलक आया और उसने राजेश को एक हल्की सी मंद मुस्कान देकर उसकी चिंता भी दूर कर दी। इतने दुःख में भी अमृता के चेहरे पर मुस्कान थी और उसका एकमात्र कारण था राजेश का उसके प्रति प्यार। प्यार में कितनी ताकत होती है न! यह बात आज इतने दुःख में भी अमृता के चेहरे की मुस्कान साबित कर रही थी।

राजेश ने अमृता के माथे पर एक प्यार भरा हल्का सा चूमा और धीमी आवाज़ में कहा, "बेस्ट ऑफ लक... एंड आई लव यू। जल्दी ऑपरेशन थिएटर से बाहर आओ ताकि मैं फिर से तुम्हारा ऐसा ही हँसता हुआ चेहरा जल्द से जल्द देख सकूँ..."

अमृता ने सिर्फ पलकें झुकाकर राजेश की बात का सहमति में जवाब दिया।

अस्पताल का स्टाफ अमृता को ऑपरेशन रूम की तरफ ले गया और राजेश तथा बाकी सभी बाहर रहकर अमृता के लिए प्रार्थना करने लगे कि अमृता जल्दी इस बीमारी से लड़कर ठीक हो जाए।

कुछ ही घंटों में ऑपरेशन पूरा हो गया... डॉक्टर ने बाहर आकर कहा कि ऑपरेशन तो हो गया है, लेकिन अमृता की वास्तविक स्थिति का पता उसके होश में आने के बाद ही चलेगा... पूरे परिवार की जान में जान आई, लेकिन शोभाबहन ने अपने स्वभाव के मुताबिक ही आज अपना सारा गुस्सा निकालने का मौका पाते ही तीखे तंज कसते हुए कहा, "जो बहू अपनी माँ समान सास के खिलाफ जाती है, उसे कुदरत कभी नहीं छोड़ती... देखा न भगवान ने उसे कैसा चमत्कार दिखाया! हूँ... सब अपने किए कर्मों का फल यहीं भुगतते हैं, स्वर्ग और नरक तो यहीं है बेटा..."

रमेशभाई ने आज शोभाबहन कुछ और बोलें, उससे पहले ही उन्हें अपनी कसम दे दी। और कहा, "आज के बाद अगर तूने परिवार के किसी भी सदस्य के लिए उल्टी-सीधी बातें कीं, तो मैं तेरी ज़िंदगी से दूर चला जाऊँगा... समझी! तुझे अच्छा लगे तो यहाँ रह, नहीं तो तू हम सबको छोड़कर इंडिया जा सकती है। हममें से कोई तुझे नहीं रोकेगा। लेकिन अब मैं तेरा यह स्वभाव तो बिल्कुल बर्दाश्त नहीं करूँगा। तुझे घर में रहना है तो प्यार से रह, और अगर किसी के भी मन में कोई भी गलत बात भरने की कोशिश की, तो मेरे कदम यह घर छोड़कर जाने में बिल्कुल नहीं झिझकेंगे, इतना तू अच्छी तरह समझ ले।"

रमेशभाई एक ही सांस में सब कुछ शांति से लेकिन कड़ाई से कह गए। आज उन्होंने शोभाबहन को थप्पड़ तो नहीं मारा, फिर भी केवल गाल ही नहीं, बल्कि वे पूरे गुस्से के आवेग में लाल हो गए।

शोभाबहन पलटकर जवाब देने के लिए मुँह खोल ही रही थीं कि तभी आज अपूर्व भी बोल पड़ा, "माँ! कल मैं चुप रहा, लेकिन आज आपसे कहूँगा कि ऐसे काम बंद कीजिए जिससे हमें माँ शब्द बोलते हुए भी शर्म आए।"

राजेश भी बोला, "माँ! यह अमृता की परिवार के प्रति निस्वार्थ भाव से की गई सेवा ही है कि ऑपरेशन कराने जाते समय भी वह हमारी भव्या और गायत्रीबहन की चिंता कर रही थी। यह तो शरीर है, बीमारी किसी को भी हो सकती है... मैं तो खुद को ही जिम्मेदार मानता हूँ अमृता की इस हालत के लिए। अगर मैंने समय पर उसका चेकअप करवाया होता तो अमृता को शायद बच्चेदानी (गर्भाशय) न निकलवानी पड़ती। अगर अमृता को यह भगवान का फल मिला है, तो सोचिए भगवान मुझे और हाँ आपको कैसा फल देंगे?" राजेश ने अपनी माँ के सामने दोनों हाथ जोड़कर कहा, "माँ, मेहरबानी करके इस घर की शांति भंग मत कीजिए..."

शोभाबहन तो पूरी तरह से शर्मिंदा हो गईं। उन्हें लगा कि मेरा पति और दोनों बेटे भी मेरे ही खिलाफ बोल रहे हैं। वे बस इतना ही बोलीं, "मैं वचन देती हूँ कि अब से ऐसा कुछ नहीं कहूँगी जिससे तुम लोगों को कोई तकलीफ हो।" इतना बोलते-बोलते शोभाबहन की आँखों से आँसू छलक पड़े।

रमेशभाई बोले, "आज तेरे आँसू सच्चे हैं या दिखावे के, यह तो भगवान ही जाने... लेकिन इतना ज़रूर कहूँगा कि अमृता और भार्गवी हमें सच्चे गृहलक्ष्मी के रूप में मिली हैं, उनकी कद्र कर। हमने उन पर न जाने अनजाने में पुत्रमोह में आकर कितने अत्याचार किए हैं। अपनी बिना किसी मर्जी के भी वे बड़ों की इच्छा का ही पालन करती आईं। अमृता ने अगर उस समय हमारी गलती का आइना हमें न दिखाया होता, तो आज भी हम ऐसे ही पापों में अपनी ज़िंदगी बर्बाद कर रहे होते। तू अपने अहम् को दूर करके शांति से सोचना, या फिर अपने मायके की हर बहू तेरी बहन और भाभी को कैसे रखती है यह देखना, तो सब समझ में आ जाएगा।"

हे मानव! स्वयं के मोह से तू परे हट,
दोस्त! प्रभु के कर्म से तू वंचित मत हो।

"अब इन थर्ड क्लास बातों को विराम दो और अमृता के लिए प्रार्थना करो कि वह जल्दी होश में आए। सुबह होने ही वाली है, मैं भार्गवी और गायत्री को यहाँ के समाचार दे देता हूँ।" इतना कहकर रमेशभाई दोनों को फोन करने के लिए मोबाइल निकालते हैं, और दोनों बेटे सोफे पर बैठकर अमृता के लिए प्रार्थना करते हैं।

शोभाबहन बहुत दुःखी होती हैं, उन्हें अभी भी अपनी गलती समझ नहीं आई तो नहीं ही आई! परिवार में अगर कोई ऐसी सोच वाला हो, तो सचमुच उस परिवार के लोग सब कुछ होते हुए भी सुख-शांति का आनंद नहीं ले पाते।