रिश्तों का बाजार Vandna Sharma द्वारा लघुकथा में हिंदी पीडीएफ

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रिश्तों का बाजार

रिश्तों का बाज़ार

सुमन मुंबई से दो दिन के थका देने वाले सफर के बाद अपने मायके चांदपुर पहुंची थी। पूरा रास्ता उसके दिल में एक ही अरमान था। भाभी के लिए चूड़ियों का सुंदर सेट, भतीजी के लिए नए कपड़े, कंगन और फ्रॉक। सोच रही थी, भाभी देखकर खुश हो जाएगी, गले लगाएगी, कहेगी - दीदी तुम कितना याद रखती हो।

पर दरवाजा खुलते ही सपना टूट गया।

भाभी प्रिया ने उसे देखते ही माथा पकड़ लिया। पति से बोली, "अब दीदी आ गई हैं, वही खिलाएंगी बना के सबको। मैं चली अपने कमरे में, सुबह से वीडियो नहीं बनाई, मुझे वीडियो बनानी है।"

सुमन का उत्साह वहीं ठंडा पड़ गया, फिर भी उसने मुस्कुराते हुए बैग से उपहार निकाले। "भाभी, ये आपके लिए..."

प्रिया ने बिना देखे ही ठंडे स्वर में कहा, "अरे दीदी, क्या जरूरत थी लाने की। अब लाई हो तो लाओ, रख देती हूँ।" और उपहार लेकर अपने कमरे में चली गई।

सुमन बेचारा सा मुँह लिए रसोई में चली गई। उसने ही सबके लिए खाना बनाया, सबको खिलाया। रात में सब एक साथ बैठे तो प्रिया ने कहा, "दीदी, सुबह जल्दी राखी बांध देना, मुझे भी अपने मायके जाना है राखी बांधने।"

"जी भाभी, मैं जल्दी उठ जाऊंगी," सुमन ने धीरे से कहा।

अगली सुबह सुमन सबसे पहले उठी। नाश्ता बनाया, भैया-भाभी दोनों को राखी बांधी, आरती की। प्रिया जाने के लिए बैग उठा ही रही थी कि फोन बज उठा - प्रिया के भाई का फोन था। "शाम तक आना प्रिया, मैं तेरी भाभी के साथ उसके मायके जा रहा हूँ। शाम तक आएंगे हम दोनों।"

बस, प्रिया का मूड बिगड़ गया। वह गुस्से में पैर पटकते हुए सीधे अपने कमरे में चली गई। बाहर हॉल में सन्नाटा छा गया।

तभी सुमन ने धीरे से माहौल संभाला, "कोई बात नहीं भैया, आप भी आराम कर लो। भाभी आप भी आराम करो, मैं सबके लिए खाना बना देती हूँ।"

सुमन ने फिर सबके लिए खाना बनाया, सबको हँसी-खुशी खिलाया। प्रिया फिर से ज़िद करने लगी जाने की तो सुमन ने अपने भाई से कहा भैया आप जाओ मैं हूँ न यहां मम्मी पापा के पास मैं संभाल लूंगी यहां। उनको विदा कर सुस्ताने के लिए अपनी मम्मी के पास बैठी ही थी। इसी बीच सुमन की बुआ जी भी आ गईं। सुमन ने उनका भी बड़े प्यार से स्वागत किया, उनके लिए चाय-नाश्ता बनाया। पूरा दिन वह रसोई और घर संभालती रही, पर किसी ने ये नहीं पूछा कि दीदी तुम थक गई हो, दो दिन के सफर से आई हो।

रात में सुमन अपने पिताजी के पास बैठी और बोली, "पिताजी, अब मैं कल चली जाऊंगी। बेटी की परीक्षा चल रही है, उसकी तैयारी करवानी है।"

पिताजी ने उसकी आँखों में थकान देख ली थी, बोले, "ठीक है बेटा, जैसा तुझे ठीक लगे।"

अगले दिन सुबह सुमन ट्रेन में बैठी खिड़की से बाहर देख रही थी। आँखों में आंसू थे, पर दिल में एक सच्चाई उतर आई थी।

वह सोच रही थी - त्योहार अब त्योहार नहीं रहे। रिश्ते अब रिश्ते नहीं रहे। सब कुछ एक बाज़ार बन गया है। जरूरत के हिसाब से रिश्तों का मान होता है। जो दिल से निभाता है, वही आखिर में अकेला रह जाता है। मायका भी अब वो मायका नहीं रहा जहाँ बेटी रानी बनकर आती थी।

ट्रेन चल पड़ी थी, चांदपुर पीछे छूट रहा था, पर सुमन ने मन में तय कर लिया था - वह रिश्ते निभाना नहीं छोड़ेगी, पर अब उम्मीद रखना छोड़ देगी।
डॉ वंदना शर्मा नई दिल्ली