मुर्दो से प्यार Vandna Sharma द्वारा लघुकथा में हिंदी पीडीएफ

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मुर्दो से प्यार



मीना बहुत दिनों बाद अपने मायके जा रही थी। ट्रेन से उतर कर उसने रिक्शा किया। 
"भैया, नई बस्ती जाना है।"
"20 रुपये लगेंगे।" रिक्शा वाला बोला।

घर पहुँचकर जैसे ही मीना सामान उतार कर पैसे देने लगी, रिक्शा वाला अपनी बात से मुकर गया। "मैंने तो तीस रुपये बोले थे।"
मीना ने दोबारा कहा, "नहीं भैया, आपने बीस रुपये बोले थे।" रिक्शा वाला चिल्लाने लगा, "तुमने गलत सुना, मैंने तीस रुपये बोले थे।"

मीना ने सोचा, इन लोगों से क्या बहस करनी, दस रुपये और निकाल कर दे दिए।

मीना की माँ भी शोर सुनकर बाहर आ गई। उन्होंने मीना से कहा, "सभी रिक्शा वाले ऐसे ही झूठ बोलकर ठगने लगे हैं आजकल। तू परेशान मत हो। अंदर आ, देख कौन आया है! तेरे मामा का लड़का आया है, शानू!"

शानू बचपन से ही बहुत बातूनी था। बात तो बड़े ज्ञान की करता था। मीना को देख खुशी से उछल पड़ा, "अरे वाह! मीना दी आ गई।"

मीना ने अपना सामान रखा ही था, शानू की कहानी शुरू हो गई।
"पता है मीना दी, पिता जी की तबीयत खराब हो रही है पंद्रह दिन से। वो मुहल्ले में एक दादी मरी थी। उनकी किसी से बोल-चाल नहीं थी। तो अर्थी देने के चार कंधे भी नहीं मिल रहे थे। पिताजी को समाज सेवा का भूत चढ़ा रहता है। खुद चले गए कंधा देने। जबकि सवाईकल का दर्द रहता है। जब तक चिता की राख ठंडी नहीं हुई, आए नहीं वहां से। तब से ही बीमार पड़े हैं। पांच हजार की दवाई खा ली, लेकिन दर्द अभी तक नहीं गया। पता नहीं मुर्दों से कितना प्यार है। मुहल्ले में, आस-पड़ोस में कोई भी मरता है तो बिना कहे निकल जाते हैं अर्थी को कंधा देने। जिनका कोई नहीं होता, उनके लिए भी। कुछ ऐसे करोड़पति भी हैं जिनके बच्चे बाहर रहते हैं, अंतिम संस्कार को नहीं आते। पिताजी उनका भी फ्री में अंतिम संस्कार करा आते हैं।"

"कोरोना के समय उनके पड़ोस के वर्मा जी के बेटे की बॉडी कफन में लिपटी आई थी। सगे रिश्तेदार ने हाथ लगाने से मना कर दिया था। लेकिन पिताजी से वर्मा जी का दुख देखा नहीं गया। घर पर बिना बताए चले गए उसका अंतिम संस्कार करने और तो और चिता की लकड़ी भी खुद मांग-मांग कर इकट्ठा की। ये नहीं सोचा उन्हें कुछ हो गया तो उनके पीछे जो परिवार है, उन्हें कौन देखेगा।"

"इतना समझाते हैं उन्हें - पिताजी, अब तुम्हारा स्वास्थ्य ठीक नहीं रहता। इतनी समाज सेवा मत किया करो। तुम्हारे मरने के बाद सब भूल जाएंगे तुम्हें। कोई नहीं आएगा हमारी सहायता करने। पर सुनते ही नहीं हैं। बिरादरी का कोई दूर गांव में भी होगा तो उसके अंतिम संस्कार में जरूर जाएंगे।"

"भला मुर्दों से इतना प्यार कौन करता है? हम तो समझाकर थक गए। अब इतनी भलाई का जमाना नहीं है। एक बार माँ ने बस हजार रुपये देकर बाजार भेजा घर का राशन लाने के लिए। सड़क पर किसी का बाइक से एक्सीडेंट हो गया था। भीड़ इकट्ठा थी, सब वीडियो बना रहे थे लेकिन किसी की हिम्मत नहीं हुई अस्पताल पहुंचाने की। पिताजी ने देखा तो राशन छोड़ उस व्यक्ति को सहारा दे अस्पताल पहुंचाया। उसका इलाज करवाया। और घर जब खाली हाथ आए तो माँ से डांट भी खाई।"

मीना इतनी देर से सब सुन रही थी, उसे हंसी भी आ रही थी। अपनी हंसी पर काबू करते हुए मीना ने कहा, "भैया, मामा जी तो बड़ा नेक काम करते हैं। मुर्दों से भला कौन प्यार करेगा, लेकिन ये उनकी उदारता है। उनसे किसी का दुख देखा नहीं जाता। परोपकार ही तो बाद में काम आता है। मामा जी तो सबसे बड़ी सहायता करते हैं। बड़ा पुण्य मिलता है मुर्दों की सेवा से।"

शानू को भी हंसी आ गई इस बात पर। शानू ने कहा, "सब देख रहा है ऊपरवाला। उसकी कुदरत, खेल निराला।"
डॉ वंदना शर्मा नई दिल्ली