Her Silent Secret - 13 Sonam Brijwasi द्वारा महिला विशेष में हिंदी पीडीएफ

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Her Silent Secret - 13

संयोगिता अपने cabin में अकेली बैठी थी। सामने laptop खुला था…लेकिन उसकी नजरें screen पर नहीं थीं। वो कहीं और खोई हुई थी। उसके दिमाग में बार-बार वही रात घूम रही थी संपूर्णा…उसकी बाँहों में खून से लथपथ पड़ी हुई। उसकी टूटती साँसें।

और फिर—
मेरे पति और मेरे बच्चे का ख्याल रखना…

संयोगिता ने आँखें बंद कर लीं। उसकी उंगलियाँ धीरे-धीरे काँप गईं। वो जितना उस वादे से दूर भागना चाहती थी…उतना ही वो उसके करीब आती जा रही थी। Virat की टूटी आँखें। विवान की मासूम आवाज़। सब उसके अंदर जगह बनाते जा रहे थे।
और यही चीज़ उसे सबसे ज्यादा डराती थी।

तभी उसका phone vibrate हुआ। Screen पर एक unknown secure number flash हो रहा था। संयोगिता का चेहरा तुरंत बदल गया। उसने call receive की।

दूसरी तरफ उसके आदमी की घबराई आवाज़ थी—
मैडम… target मिल गया है।
वही आदमी… जिसने orphan kids trafficking शुरू की थी।

बस इतना सुनते ही संयोगिता की आँखों में फिर वही अंधेरा उतर आया। वही ठंडी खामोशी।वही खतरनाक चमक। कुछ सेकंड पहले जो लड़की यादों में खोई थी…अब गायब हो चुकी थी। अब वहाँ सिर्फ Psycho Killer Sanyogita Singh थी। उसने बिना कुछ कहे phone काट दिया। फिर धीरे से drawer खोला। अंदर उसकी black gun रखी थी। संयोगिता ने उसे उठाया। उसकी उंगलियाँ हथियार पकड़ते ही जैसे फिर शांत हो गईं। जैसे यही उसका असली रूप हो।

वो तेजी से cabin से बाहर निकली। Employees ने उसे जाते हुए देखा। उसके चेहरे पर फिर वही सख्त ठंडापन था जिसे देखकर लोग खुद रास्ता छोड़ देते थे। लेकिन किसी को नहीं पता था इस elegant businesswoman के अंदर
एक खूंखार अंधेरा भी रहता है।

संयोगिता parking में पहुँची। काली car पहले से तैयार खड़ी थी। उसने gun अपनी coat के अंदर छुपाई। फिर car में बैठते हुए उसकी आँखों में वही जानलेवा सन्नाटा उतर आया। आज रात…फिर किसी दीवार पर खून से एक नया मुहावरा लिखा जाने वाला था।

पुराने industrial area के बीचोंबीच एक जर्जर godown खड़ा था। बाहर से वीरान। अंदर से नरक। कमरे के कोनों में डरे हुए बच्चे बैठे थे। कुछ रो रहे थे… कुछ इतने सहमे थेकि आवाज़ तक नहीं निकल रही थी। और बीच में वो आदमी बैठा था । जिसे पुलिस हर बार सबूतों के अभाव में छोड़ देती थी।

तभी—
धड़ाम!
Godown का बड़ा दरवाज़ा जोर से खुला। सबकी नजर उधर गई। काले कपड़ों में संयोगिता अंदर चली आ रही थी। उसकी आँखों में वही खतरनाक पागलपन था। वो धीरे-धीरे चलते हुए उस आदमी के सामने रुकी। संयोगिता हल्का सा मुस्कुराई।
लेकिन वो मुस्कान इंसानी नहीं लग रही थी।

संयोगिता बोली - 
Oh… तो तुम हो वो दरिंदे।

वो थोड़ा झुकी।

संयोगिता बोली - 
हाँ… याद आया मुझे।

उसकी आँखों में नफरत उतर आई।

संयोगिता बोली - 
तुम वही हो ना… जिसे police बार-बार छोड़ देती है?

आदमी घबराकर पीछे हटने लगा। संयोगिता धीरे-धीरे उसके करीब आई।

संयोगिता बोली - 
जिसे कभी अपने गुनाहों की सजा नहीं मिली…

फिर उसने gun सीधी उसकी तरफ कर दी।

संयोगिता बोली - 
पर मैं हूँ ना…

उसकी आवाज़ अब बेहद धीमी और डरावनी थी।

संयोगिता बोली - 
क्यों फिक्र करते हो?

उस आदमी ने भागने की कोशिश की। लेकिन अगले ही पल—
धाँय! धाँय!
गोलियों की आवाज़ पूरे godown में गूंज उठी। आदमी वहीं गिर पड़ा। उसकी आँखों में डर जम चुका था। और कुछ सेकंड बाद सब खत्म हो गया। संयोगिता तुरंत मुड़ी। उसकी आँखों का पागलपन अचानक नरम पड़ा जब उसने उन बच्चों को देखा। वो धीरे-धीरे उनके पास गई। एक छोटी बच्ची डरकर पीछे हट गई। संयोगिता नीचे बैठ गई।

फिर बहुत शांत आवाज़ में बोली—
डरो मत… अब कोई तुम्हें छुएगा नहीं।

उसने अपने आदमी को इशारा किया। सारे बच्चों की रस्सियाँ खोल दी गईं। कुछ बच्चे रोते हुए उससे लिपट गए। संयोगिता कुछ पल के लिए बिल्कुल चुप रह गई। जाने से पहले वो दीवार के पास गई। उसने खून में उंगलियाँ डुबोईं।

और धीरे-धीरे लिख दिया—
जो मासूमों का बचपन छीनते हैं…उनकी साँसें भी उधार की होती हैं।

लाल शब्द दीवार पर चमक रहे थे। संयोगिता godown से बाहर निकली। रात की ठंडी हवा उसके चेहरे से टकराई। लेकिन उसके अंदर अब भी तूफान था। क्योंकि हर बार किसी बच्चे को बचाते हुए…उसे विवान याद आ जाता था। और शायद इसी वजह से वो अब सिर्फ killer नहीं रह गई थी। उसके अंदर धीरे-धीरे एक अधूरी माँ भी जाग रही थी।


चौहान हवेली में रात का सन्नाटा पसरा हुआ था। विराट अपने कमरे में अकेला बैठा था। सामने संपूर्णा की तस्वीर रखी थी।
उसकी उंगलियाँ तस्वीर के फ्रेम पर ठहर गईं।

विराट बोला - 
संपूर्णा… अगर तुम आज होतीं ना, तो विवान को देखकर कितना खुश होतीं।

तभी दरवाज़े पर हल्की दस्तक हुई। विवान अपनी छोटी सी तकिया लेकर अंदर आया।

विवान बोला - 
पापा… मैं आपके पास सो जाऊँ?

विराट ने तुरंत उसे अपनी बाँहों में उठा लिया।

विराट बोला - 
आओ बेटा।

विवान उसके सीने से लग गया।

कुछ पल बाद उसने मासूमियत से पूछा—
पापा… मम्मा कल वापस आएंगी?

विराट की आँखें भर आईं। वो जवाब नहीं दे पाया। उसी समय संयोगिता अपनी कार में बैठी थी। गोदाम से लौटने के बाद उसने कपड़े बदल लिए थे। लेकिन उसके चेहरे पर थकान साफ दिखाई दे रही थी। उसने फोन उठाया।

संयोगिता बोली - 
सारे बच्चों को सुरक्षित जगह पहुँचा दिया?

फोन पर उसके आदमी ने जवाब दिया—
जी मैडम। सभी बच्चे सुरक्षित हैं।

संयोगिता ने आँखें बंद कर लीं।

फिर अचानक उसके दिमाग में विवान की आवाज़ गूँजी—
I love you so much, Mumma…

उसकी आँखों में नमी आ गई।

अगली सुबह
चौहान ऑफिस में संयोगिता अपने केबिन में बैठी थी। टेबल पर कई business files रखी थीं। तभी दरवाज़ा खुला।विराट अंदर आया।

विराट बोला - 
संयोगिता…

संयोगिता ने laptop से नजर उठाई।

संयोगिता बोली - 
जी?

विराट कुछ पल चुप रहा।

फिर बोला—
क्या आज शाम आप हमारे घर आ सकती हैं?

संयोगिता के हाथ रुक गए।

संयोगिता बोली - 
आपके घर?

विराट बोला - 
हाँ।

उसने थोड़ी झिझक के साथ कहा—
विवान… आपको बहुत याद कर रहा है।

संयोगिता के चेहरे पर हल्की मुस्कान आई। लेकिन उसके भीतर जैसे कोई दरवाज़ा खुल गया। वो अब पहली बार अपनी इच्छा से चौहान हवेली जाने वाली थी। शाम होते ही संयोगिता चौहान हवेली पहुँची। दरवाज़ा खुलते ही विवान की नजर उस पर पड़ी।

वो खुशी से चिल्लाया—
मम्मा!

वो दौड़कर संयोगिता से लिपट गया। संयोगिता कुछ पल के लिए बिल्कुल स्थिर रह गई। फिर उसने धीरे से उसे अपनी बाँहों में भर लिया।

संयोगिता बोली - 
कैसे हो?

विवान बोला - 
अब ठीक हूँ… क्योंकि मम्मा आ गईं।

संयोगिता की आँखें नम हो गईं। दूर खड़ा विराट ये सब देख रहा था। उसके चेहरे पर पहली बार कई दिनों बाद हल्की सी शांति दिखाई दी। विवान संयोगिता का हाथ पकड़कर अंदर ले गया।

विवान बोला - 
मम्मा, आज मेरे साथ कहानी सुनाओगी?

संयोगिता ने उसकी तरफ देखा।

संयोगिता बोली - 
हाँ।

विवान खुशी से मुस्कुरा दिया। लेकिन तभी उसकी नजर संयोगिता की बाँह पर पड़े हल्के निशान पर गई।

विवान बोला - 
मम्मा… आपको चोट लगी?

संयोगिता एक पल के लिए चुप हो गई। विराट ने भी तुरंत उसकी तरफ देखा।

संयोगिता ने मुस्कुराकर कहा—
थोड़ी सी। अब ठीक है।

विवान ने तुरंत उसकी बाँह पर बहुत हल्के से फूँक मारी।

विवान बोला - 
अब ठीक हो जाएगी।

संयोगिता उसे देखती रह गई। उसे समझ नहीं आ रहा था कि चार साल का ये बच्चा उसके अंदर की दुनिया को इतना क्यों बदल रहा था।

कुछ देर बाद विवान खेलने चला गया। संयोगिता की नजर दीवार पर लगी संपूर्णा की तस्वीर पर पड़ी। वो धीरे-धीरे उसके पास गई। तस्वीर को देखते हुए उसके दिमाग में वही आखिरी रात लौट आई।

संपूर्णा की कमजोर आवाज़—
मेरे पति और मेरे बच्चे का ख्याल रखना…

संयोगिता ने आँखें बंद कर लीं।

उसने बहुत धीमे से कहा—
मैं अपना वादा निभा रही हूँ, संपूर्णा।

लेकिन दरवाज़े के बाहर खड़ा विराट उसकी बात सुन चुका था।
वो चौंककर उसे देखने लगा। उसे समझ नहीं आया संयोगिता ने संपूर्णा का नाम इतने अपनत्व से क्यों लिया?

और पहली बार उसके मन में एक नया सवाल उठा—
आखिर तुम हो कौन, संयोगिता?

संयोगिता सोफे पर बैठी थी। उसके सामने कुछ फाइलें रखी थीं, लेकिन उसका ध्यान उन पर नहीं था। तभी छोटे-छोटे कदमों की आवाज़ आई। विवान दौड़ता हुआ उसके पास आया और उसकी गोद में चढ़ गया।

विवान बोला - 
मम्मा…

संयोगिता मुस्कुराई।

संयोगिता बोली - 
क्या हुआ?

विवान ने बड़े गर्व से कहा—
मैंने पापा को सब बता दिया!

संयोगिता के चेहरे की मुस्कान अचानक रुक गई।

संयोगिता बोली - 
क्या… सब?

विवान खुशी-खुशी बताने लगा—
कि आप सुपरहीरो की तरह आई थीं!

संयोगिता की आँखें फैल गईं। विवान ने हाथों से बंदूक चलाने की नकल की।

विवान बोला -
और आपने उन badmans को ऐसे डराया था!

संयोगिता के चेहरे पर घबराहट साफ दिखाई देने लगी। क्योंकि उसे पता था विवान ने जो देखा था, वो किसी सुपरहीरो की कहानी नहीं थी।वो उसका दूसरा चेहरा था। एक ऐसा चेहरा जिसे दुनिया साइको किलर के नाम से जानती थी।

संयोगिता ने धीरे से विराट की तरफ देखा। विराट कुछ दूरी पर खड़ा था। वो चुपचाप दोनों को देख रहा था। संयोगिता की धड़कन तेज हो गई। लेकिन विराट के चेहरे पर शक नहीं था।
बस अपने बेटे को देखकर हल्की मुस्कान थी।

विवान बोला - 
पापा, मैंने कहा था ना… मेरी मम्मा बहुत बहादुर हैं!

विराट ने हल्की मुस्कान के साथ कहा—
हाँ बेटा… बहुत बहादुर हैं।

संयोगिता कुछ बोल नहीं पाई। विवान ने अचानक संयोगिता का चेहरा दोनों हाथों से पकड़ लिया।

विवान बोला - 
मम्मा, आप हमेशा मुझे बचाओगी ना?

संयोगिता की आँखें नम हो गईं। उसने धीरे से उसके सिर पर हाथ फेरा।

संयोगिता बोली - 
हाँ… हमेशा।

विवान खुश होकर उससे लिपट गया।

विवान बोला - 
मुझे पता था!

संयोगिता ने उसे कसकर पकड़ लिया।

लेकिन उसके दिमाग में सिर्फ एक बात घूम रही थी—
अगर इसे कभी पता चला कि उसकी सुपरहीरो ही वो साइको किलर है, जिससे पूरा शहर डरता है… तो?

विवान कुछ देर बाद खेलने चला गया। विराट धीरे-धीरे संयोगिता के पास आया। संयोगिता ने खुद को सामान्य रखने की कोशिश की।

विराट बोला - 
आपने उसे बचाया… इसके लिए मैं आपका जितना शुक्रिया करूँ, कम है।

संयोगिता चुप रही।

विराट ने गंभीर होकर कहा—
लेकिन आपने ये सब किया कैसे?

संयोगिता ने उसकी आँखों में देखा। एक पल के लिए उसके चेहरे पर वही ठंडापन आया। फिर उसने नजरें हटा लीं।

संयोगिता बोली - 
बस… सही समय पर सही जगह थी।

विराट उसे ध्यान से देखता रहा। उसे जवाब तो मिल गया था…
लेकिन उसके मन में सवाल और बढ़ गए थे। विराट के चले जाने के बाद संयोगिता अकेली बैठी रही। उसने अपनी हथेली को देखा। उसे वही रात याद आ गई। बंदूक…खून…चीखें…और फिर विवान का मासूम चेहरा। उसने आँखें बंद कर लीं।

संयोगिता (मन में) बोली - 
मैं तुम्हारी मम्मा जैसी दिखती हूँ, इसलिए तुम मुझे मम्मा कहते हो… लेकिन मैं वो नहीं हूँ।

उसकी आँखों से एक आँसू गिर पड़ा।

संयोगिता (मन में) बोली - 
तुम्हें कभी मेरे उस रूप के बारे में पता नहीं चलना चाहिए, विवान।

दूर कमरे में विवान की हँसी सुनाई दे रही थी। और उस हँसी के सामने एक साइको किलर पहली बार अपने ही राज़ से डर रही थी।