उम्र एक नंबर है Vandna Sharma द्वारा प्रेरक कथा में हिंदी पीडीएफ

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उम्र एक नंबर है


कहानी - उम्र एक नंबर है 

अगस्त माह का एक दिन था। आसमान में सुबह से बादल छाए थे, बरस भी नहीं रहे थे। अजीब सी उमस भरा वातावरण था। कुसुम को राखी पर मायके जाना था। पैकिंग के लिए उसने अपनी अलमारी खोली तो उसे कुछ समझ नहीं आया कि क्या लेकर जाए।

उसके सारे कपड़े छोटे हो गए थे। थायराइड की वजह से उसे कम उम्र में ही मेनोपोज हो गया था, जिससे उसका वजन अचानक से बढ़ गया। दिनभर थकान रहती, मूड चिड़चिड़ा रहता। रात भर नींद भी नहीं आती, दिमाग में न जाने कैसे-कैसे विचार चलते रहते।

उस दिन उसने खुद को पहली बार गौर से आईने में देखा। आंखें थकी-थकी, चेहरा उतरा हुआ। वो बुदबुदाई, "क्या थी मैं और क्या हो गई। सभी कपड़े छोटे हो गए। नए भी कहां तक खरीदूं?"

तभी उसकी नजर आईने में अपनी आंखों पर पड़ी। कहीं अंदर से एक आवाज आई। उसने अपने आप से संकल्प लिया, "नहीं, मैं हार नहीं मान सकती। बीमार बनकर नहीं जीना है मुझे।"

दोपहर दो बजे कुसुम जब अपने बेटे को स्कूल से लेने गई, तो गेट पर खड़ी दो-तीन और महिलाओं को देखा। सब उसी की तरह अपने बढ़े हुए वजन और थकान से परेशान थीं। किसी के घुटनों में दर्द था तो कोई कह रही थी कि रात में नींद ही नहीं आती। कुसुम को लगा जैसे उसे अपनी ही जैसी सखियां मिल गई हों।

हिम्मत करके उसने दो महिलाओं से बात की। कहा, "दीदी, क्यों न हम तीनों मिलकर कुछ करें? कल से हम रोज सुबह दस बजे ऑनलाइन ही योगा किया करेंगे। एक साथ करेंगे तो मन भी लगेगा और एक-दूसरे का सहारा भी रहेगा। जिसके पास जो भी जानकारी होगी, हम समूह में बांट लिया करेंगे।"

अगले दिन से कुसुम ने अपनी दो सखियों के साथ योग करना शुरू किया। पहले दिन शरीर बहुत दुखा, सांस फूली। पर उन्होंने हिम्मत नहीं हारी। धीरे-धीरे उनके साथ अन्य महिलाएं भी जुड़ने लगीं। तीन से पांच, पांच से दस हो गईं।

अब उन्होंने तय किया कि सिर्फ ऑनलाइन नहीं, हफ्ते में दो दिन पार्क के पास वाले बड़े हॉल में जाकर सामूहिक योग करेंगे। वहां सब अपनी समस्याएं खुलकर बतातीं। कोई बताती कि भूख बहुत लगती है, तो कोई कहती मूड बहुत खराब रहता है। सब मिलकर एक-दूसरे का समाधान बतातीं। कोई हेल्दी खाने की रेसिपी लाती, तो कोई डॉक्टर से पूछी हुई जानकारी। धीरे-धीरे समूह बड़ा हो रहा था।

कुसुम ने सभी सखियों के जीवन में उत्साह भर दिया था। उसने एक दिन सभी से कहा कि, "चालीस के बाद उम्र ढलने लगती है। लेकिन हम उम्र को तो नहीं रोक सकते। हम अपनी दिनचर्या और भोजन में बदलाव कर अपनी जिंदगी को खूबसूरत बना सकते हैं।"

कुसुम के इस प्रयास से सभी सखियों के जीवन को नई दिशा मिली।

छह महीने बीत गए। कुसुम ने अब मायके जाने के लिए फिर से अलमारी खोली। इस बार उसके पुराने कपड़े फिर से आने लगे थे। चेहरे पर चमक लौट आई थी। रात में नींद भी अच्छी आने लगी थी और दिनभर की चिड़चिड़ाहट भी गायब थी। सबसे बड़ी बात, अब वो अकेली नहीं थी। उसकी बीस सखियों की टोली थी।

राखी पर जब वो मायके गई, तो उसकी मां ने देखते ही कहा, "कुसुम, तू तो पहले से भी ज्यादा सुंदर लग रही है।" कुसुम मुस्कुराई, "मां, मैंने खुद को फिर से जीना सीख लिया है।"

आज कुसुम का योग समूह पूरे मोहल्ले में जाना जाता है। उन्होंने नाम रखा है - 'उमंग'। हर नई महिला जो इस समूह में आती है, उसे कुसुम यही कहती है - बीमारी को अपना तकदीर मत बनाओ। खुद से प्यार करो और एक नई शुरुआत करो। 

क्योंकि उम्र तो सिर्फ एक नंबर है, हौसला ही असली खूबसूरती है।

समाप्त
डॉ वंदना शर्मा नई दिल्ली