अधूरापन - 13 Falguni Dost द्वारा प्रेरक कथा में हिंदी पीडीएफ

Featured Books
श्रेणी
शेयर करे

अधूरापन - 13

अध्याय - १३

अमृता को यह समझने में देर न लगी कि रिपोर्ट अच्छी नहीं आई है, क्योंकि इस तरह सरेआम राजेश अमृता से लिपट गया, यह इतने सालों में आज पहली बार ही हुआ था। राजेश के इस व्यवहार के कारण उसके मन में अनजाना डर बैठ ही गया था।

राजेश के पास शब्द ही नहीं थे कि वह अमृता से क्या कहे?

अमृता ने खुद ही फाइल लेकर रिपोर्ट पढ़ ली। रिपोर्ट पढ़ते ही एक पल के लिए उसका दिल एक धड़कन भूल गया। आंखों की पलकों तक आंसू आकर रुक गए। उसका गला भर आया, लेकिन कुछ ही क्षणों में उसने खुद को संभाला और मन ही मन बोली, "हर समस्या उत्पन्न होने के साथ ही अपना समाधान भी लेकर आती है।" ऐसा सोचते ही उसे अपनी पीड़ा से लड़ने की ताकत मिल गई।

राजेश जैसे ही अमृता की तरफ नजरें मिलाते हुए मुंह फेरता है, उसे गजब का आश्चर्य होता है। वह मन ही मन सोचता है, "अमृता में कितनी सहनशक्ति है, मैं इतने साल उसके साथ रहा फिर भी उसे पहचान नहीं पाया! अमृता, तुम्हें डर नहीं लगा?"

अमृता बोली, "इतने सालों तक अकेले दम पर मैंने हर समस्या का सामना किया है और अब तो मुझे आपका साथ भी हासिल है, फिर मुझे चिंता करने की क्या जरूरत? और वैसे भी ईश्वर जो करेंगे अच्छा ही करेंगे। जो होता है अच्छे के लिए ही होता है।"

अमृता और राजेश थोड़े गमगीन लेकिन एक-दूसरे के मिले साथ से उपजे एक अनोखे आत्मविश्वास के साथ घर की ओर प्रस्थान करते हैं कि जो किस्मत में होगा, उसे हंसते चेहरे से स्वीकार करेंगे।

घर पहुंचते ही रमेशभाई ने चिंताभरे स्वर में पूछा, "राजेश, अमृता की रिपोर्ट में क्या आया? सब ठीक तो है ना? डॉक्टर ने क्या कहा?" उन्होंने सब एक ही सांस में पूछ डाला...

राजेश कुछ बोले उससे पहले ही शोभाबहन रूखे स्वर में बोलीं, "कुछ नहीं हुआ होगा। आजकल की बहुओं में आलस भरा होता है। यहां कामवाली अपने देश की तरह थोड़ी मिलती है? यह सब तो उसका नाटक है... नाटक!"

राजेश एक तो पहले से ही चिंता में था और ऊपर से मां ने जो खेल खेला था उसका गुस्सा भी था। इसके अलावा बिना कुछ सुने अमृता पर फिर से उंगली उठाई जा रही थी, इसलिए राजेश से मां को पलटकर जवाब दे दिया गया, "कभी तो मम्मी, आप अपनी बहू को दिल से स्वीकार करने की कोशिश कीजिए।" इतना बोलकर वह गुस्से में फाइल टीपॉय पर रखकर अपने कमरे में चला गया। अमृता भी कुछ बोलना नहीं चाहती थी, इसलिए नजरें झुकाकर राजेश के पीछे-पीछे वह भी कमरे में चली गई।

भार्गवी ने फाइल उठाई और रिपोर्ट पढ़ी। पढ़ते ही वह अपना संतुलन खो बैठी, जिससे फाइल उसके हाथ से छूट गई और अपूर्व ने भार्गवी और फाइल दोनों को संभाल लिया। भार्गवी को सोफे पर बैठाकर अपूर्व ने फाइल खोली, उसकी आंखें फटी की फटी रह गईं और मुंह से सिर्फ इतना ही निकला, "राजेश कभी पिता नहीं बन पाएगा।"

शोभाबहन तो यह सुनकर आह भरते हुए बोलीं, "अरे रे..! हाय! मेरा बेटा!! बिचारा सालों से अपने दुख के घूंट पीता रहा। यह तो आज तूने फाइल देखी और हमें पता चला, वरना यह अमृता न जाने कितने पाप अपने पेट में दबाकर बैठी होगी!!" मन में जितना गुस्सा भरा था, वह आज जोर-जोर से चिल्लाकर निकाल दिया।

इन शब्दों ने पूरे परिवार को स्तब्ध कर दिया। राजेश को कमरे में भी सब सुनाई दे गया, जिससे आज वह खुद को संभाल नहीं सका। वह गुस्से में उठा कि तुरंत अमृता ने उसका हाथ पकड़कर रोका, लेकिन आज तो पानी सिर से ऊपर जा चुका था। राजेश आज अपनी मां की बात बर्दाश्त करने के मूड में बिल्कुल नहीं था।

राजेश कमरे से बाहर आया और मां से बोला, "मम्मी, आपको यह ख्याल नहीं आया कि अगर मैं पिता नहीं बन सकता तो अमृता मां कैसे बन सकती है? क्या कारण हो सकता है कि अमृता मां न बन सके? क्या एक बार भी आपको ऐसा नहीं लगा कि अमृता का दिल साफ है तो वह ऐसी बात कभी नहीं छिपाएगी?" इसके साथ ही उसने अपूर्व से भी कह दिया, "अपूर्व! तुम भी बात पूरी करने के बजाय ऐसे अधूरी क्यों बोलते हो? क्या कमी रखी अमृता ने इस घर को संभालने में?"

शोभाबहन इतना सुनने के बाद भी खुद को सही साबित करते हुए आगे बोलीं, "राजेश, तुम सच स्वीकार नहीं कर पा रहे हो इसलिए गुस्से में ऐसा बोल रहे हो, लेकिन मैं तुम्हारी मां हूं। तुम्हारा दर्द मैं न समझूं, ऐसा थोड़ी हो सकता है? बेटा, मैं तुम्हारे लिए दूसरी बहू ढूंढ दूंगी। यहां इस देश में बाहर रिश्ते रखने पर कहां कोई रोक-टोक है?"

यह शब्द सुनते ही भार्गवी और राजेश एक साथ बोल उठे, "क्या बोल रही हैं मम्मी? आप होश में तो हैं ना? आपकी उम्र के साथ-साथ आपके दिमाग ने भी साथ देना छोड़ दिया है क्या?"

आज रमेशभाई भी अपना गुस्सा रोक नहीं पाए और एक थप्पड़ शोभाबहन के गाल पर पड़ ही गया। रमेशभाई बोले, "मेरी खामोशी को तुम कभी समझ ही नहीं पाईं। शोभा! तुम्हारा नाम शोभा है, लेकिन तुमने घर की शोभा बढ़ाने के बजाय अपने ही घर में आग लगा दी है। तुम खुद को इन बच्चों की मां कहती हो? मां के नाम पर कलंक हो तुम..." रमेशभाई गुस्से से लाल-पीले हो गए। आज पहली बार शोभाबहन ने रमेशभाई की आंखों में इतना भयानक क्रोध देखा। उन्हें लगा कि यह उनके पति नहीं बल्कि अमृता का रोता हुआ दिल बोल रहा है। थोड़ी ही देर में पूरे घर में सन्नाटा छा गया। सब चुप थे, लेकिन हर किसी के उलझन भरे मन में उठ रहे सवाल और तकलीफें मानो एक भयानक भूचाल ला रही थीं।

उलझते सवालों से परेशान है हर किसी का मन,
दोस्त! रिश्तों के अधूरेपन से पीड़ित है हर किसी का मन।