लघु कथा- रक्षा-सूत्र
लेखिका डॉ वंदना शर्मा
आरव के स्कूल में आज "राखी बनाओ" गतिविधि हुई। रंग-बिरंगे धागों, मोतियों और कागज से उसने एक बहुत सुंदर राखी बनाई। अध्यापिका ने तारीफ भी की।
छुट्टी होते ही आरव दौड़कर घर पहुंचा। उसकी आंखों में उदासी थी। उसने अपनी मम्मी रीना से पूछा - "मम्मी, मेरे तो कोई बहन नहीं है। इस राखी का मैं क्या करूं? किसकी कलाई पर बांधूं?"
रीना बेटे की उदासी समझ गई। उसने आरव को गोद में बिठाया और माथा चूमा। "बेटा, आओ आज मैं तुम्हें रक्षा-सूत्र की कहानी सुनाती हूं।"
रीना ने कहना शुरू किया - "प्राचीन समय में जब देवता धरती पर निवास करते थे, उनके अक्सर राक्षसों से युद्ध होते रहते थे। युद्ध में अपनी जीत सुनिश्चित करने के लिए वे ब्राह्मण और ऋषि-मुनियों के पास जाते थे। वो मुनि अपनी तपस्या की शक्ति से धागे में मंत्र फूंकते और उसे देवताओं की कलाई पर बांध देते थे। इसे ही रक्षा-सूत्र कहते थे।
मंत्रों में बहुत शक्ति होती है बेटा। दैवीय ऊर्जा कभी नष्ट नहीं होती। रक्षा सूत्र बांधते हुए तीन बार गांठ लगाई जाती थी और मंत्रोच्चार से उसे ऊर्जा दी जाती थी। इसी ऊर्जा के बल पर देवता हर युद्ध में विजयी होते थे। तभी से श्रावण पूर्णिमा के दिन रक्षा-सूत्र बांधने की परंपरा चली। और सबसे खास बात ये कि इसे कोई भी बांध सकता था।"
आरव ध्यान से सुन रहा था।
रीना आगे बोली - "फिर समय के साथ इस परंपरा का रूप बदला। लोगों ने देखा कि बहनें हमेशा भाई के लिए दुआ करती हैं। बहनें मां के समान दुलार करती हैं अपने भाई-भतीजों को। इसलिए भाई अपनी बहन से रक्षा-सूत्र बंधवाने लगे। आदि काल से ही बहन भाई के लिए पूजनीय मानी गई। पहले समय में भाई बहन के घर जाते थे राखी बंधवाने और उनका आशीर्वाद लेने।"
"पर मम्मी, अब तो बहनें भाई के घर जाती हैं ना?" आरव ने बीच में पूछा।
"हां बेटा, बिल्कुल सही।" रीना मुस्कुराई। "वर्तमान समय में इस त्योहार का रूप फिर बदल गया है। अब बहनें जाती हैं भाई के घर। पर मूल भाव वही है - प्यार और रक्षा का वादा।"
आरव थोड़ा सोचकर बोला - "तो मम्मी, क्या राखी सिर्फ बहन ही बांध सकती है?"
रीना ने आरव का हाथ अपने हाथ में लिया और कहा - "सुनो बेटा, परिवर्तन संसार का नियम है। समय के साथ परंपराएं बदलती रहती हैं। और आधुनिक समय में तो हम जिसे भी प्यार करते हैं, जिसकी रक्षा करना चाहते हैं, उसे राखी बांध सकते हैं। यह जरूरी नहीं कि बहन ही राखी बांधे।"
आरव की आंखें चमक गईं - "सच मम्मी?"
"हां बिल्कुल सच। मम्मी भी अपने बेटे को राखी बांध सकती है। दोस्त दोस्त को बांध सकता है। अध्यापिका छात्र को बांध सकती है। क्योंकि रक्षा का धागा रिश्ते का नाम नहीं, भावना देखता है।"
रीना ने आरव के हाथ से राखी ली और संभाल कर रख दी। "तो तुम चिंता ना करो। ये राखी मुझे दे दो। मैं इसे संभाल कर रखती हूं। रक्षाबंधन वाले दिन मैं तुम्हें बांधूंगी। और वादा करती हूं, हमेशा तुम्हारी रक्षा करूंगी।"
आरव खुश होकर मम्मी से लिपट गया।
शाम को रीना ने कहा - "ठीक है बेटा अब आप खाना खाकर आराम करो। कल हम पार्क चलेंगे और एक पौधा आपके नाम का लगाएंगे। जैसे ये पौधा बड़ा होगा, वैसे ही हमारा प्यार और रक्षा का बंधन भी।"
आरव सोने से पहले बोला - "मम्मी, आज मुझे समझ आया। रक्षा-सूत्र धागा नहीं है। वो एक वादा है। एक दूसरे का ख्याल रखने का वादा।"
रीना ने बेटे के सिर पर हाथ फेरा। बाहर चांदनी फैली थी और घर में रक्षाबंधन का त्योहार पहले ही मन गया था।
*सीख:* रिश्ते खून से नहीं, भावना से बनते हैं। रक्षा-सूत्र हमें यही सिखाता है कि हम सब एक-दूसरे के रक्षक हैं।
*समाप्त*
डॉ वंदना शर्मा नई दिल्ली