औपचारिकता भरे रिश्ते Vandna Sharma द्वारा लघुकथा में हिंदी पीडीएफ

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औपचारिकता भरे रिश्ते



औपचारिकता भरे रिश्ते

सोहन ऑफिस जाते हुए उदास लग रहा था। उसकी आँखों में वो उदासी साफ झलक रही थी जिसे वो छिपाने की कोशिश कर रहा था। उसकी धर्मपत्नी मीना एक अध्यापिका थी। पति-पत्नी का रिश्ता इतना गहरा था कि मीना से सोहन के भाव छिपे न रह सके। 

मीना ने सोहन का धीरे से हाथ पकड़ा और बड़े प्यार से पूछा - "क्या हुआ जी, कहीं खोए-खोए हुए लग रहे हो। कुछ ठीक नहीं लग रहा।"

सोहन ने धीरे से मुस्कुराते हुए कहा- "मीना, तुम कैसे मेरा मन पढ़ लेती हो, बिना बताए समझ जाती हो मेरी परेशानी। कोई खास बात नहीं, बस ये सोचकर परेशान हूं। कल रविवार था। मैंने बड़े भाई, मम्मी-पापा, सबको फोन किया। सोचा सब से हाल-चाल ले लूं। पर किसी ने भी फोन रिसीव नहीं किया और न ही पुन: कॉल बैक किया।"

वो थोड़ा रुका और फिर बोला, "पहले तो हर रविवार को सारे दिन घरवालों के फोन आते रहते थे। पूछते थे - खाना खाया? तबियत कैसी है? अब कोई बात ही नहीं करना चाहता। मुझे ऐसा क्यों लगता है कि जैसे सारे घरवाले मुझसे किनारा करने लगे हैं क्योंकि मैं अभी आर्थिक रूप से सशक्त नहीं हूं। ना घर है मेरे पास, ना गाड़ी, ना स्थाई नौकरी।"

मीना से अपने पतिदेव का दुख देखा नहीं गया। उसने सोहन के बाल सहलाते हुए कहा - "दिल छोटा मत करो। होता है ऐसा। अक्सर होता है। एक उम्र के बाद बचपन के खून के रिश्ते भी बस औपचारिक रह जाते हैं। बिना जरूरत के कोई किसी को याद नहीं करता यहां।"

मीना ने आगे कहा, "मैं यह नहीं कह रही कि तुम्हारे घर वाले गलत हैं। लेकिन एक उम्र के बाद सभी भाई-बहन अपनी गृहस्थी में व्यस्त हो जाते हैं। नए रिश्ते जुड़ते हैं तो पुरानों की अनदेखी हो जाती है। बचपन में एक साथ खेलने वाले भाई-बहन बड़े होकर एक-दूजे के लिए मेहमान बन जाते हैं। रिश्तों को महत्व उनके आर्थिक स्तर को देखकर दिया जाता है। बिना जरूरत के कोई नहीं पहचानता किसी को।"

सोहन चुपचाप सुनता रहा। मीना ने उसे हिम्मत देते हुए कहा, "अपने कैरियर पर फोकस करो। सब सही हो जाएगा।"

सोहन मुस्कराकर मीना को बाहों में भर लेता है और उसके माथे पर एक पप्पी देता है। "अच्छा अध्यापिका जी चलता हूँ, देर हो रही है ऑफिस को।"

मीना सोहन के जाने के बाद देर तक सोचती रही। सच में कितने स्वार्थी हो गए हैं रिश्ते। 

समय तेजी से बदलता है । कहते हैं ना मेहनत कभी बेकार नहीं जाती। सोहन की मेहनत दो साल बाद रंग लाई। उसने नौकरी छोड़कर खुद का छोटा सा व्यापार शुरू किया। पहले बहुत दिक्कतें आईं। रात-रात भर जागना पड़ा। पर उसने हार नहीं मानी। 

आज दो साल बाद सोहन के पास गाड़ी है, बंगला है, सब कुछ है। अब वो खुद औरों को नौकरी पर रखने लायक बन गया है। अब सोहन बहुत व्यस्त रहने लगा है। 

और सबसे अजीब बात क्या हुई पता है? वही रिश्तेदार जिनके फोन नहीं आते थे, अब खुद फोन करने लगे हैं। "बेटा सोहन कैसा है? बहुत दिन हो गए मिले हुए।" मम्मी-पापा भी अब हर हफ्ते हाल पूछते हैं। बड़े भाई साहब तो अब बिजनेस में सलाह भी मांगते हैं। 

यहां तक कि अनजान लोग भी अब सोहन से परिचय बढ़ाने लगे हैं। शादियों में, फंक्शन में सब उसे आगे की सीट देते हैं। 

लेकिन सोहन को अब समझ आ गया है। मीना ने सही कहा था। ये दुनिया कामयाबी को सलाम करती है। पैसे वाले की कद्र करती है। 

एक दिन सोहन ने मीना से कहा, "तुम ठीक कहती थी। पैसा हो तो रिश्ते खुद चलकर आ जाते हैं। पर मुझे अब समझ आ गया है कि असली रिश्ता कौन है। जब मेरे पास कुछ नहीं था तब तुमने मेरा हाथ नहीं छोड़ा। तुमने कहा था - फोकस करो। आज मैं जहाँ हूँ, वो तुम्हारी वजह से हूँ।"

मीना बस मुस्कुरा दी। 

आज सोहन के पास सब कुछ है। पर उसने एक बात सीख ली - रिश्तों की कीमत पैसों से नहीं, वक्त से तय होती है। जो तुम्हारे बुरे वक्त में साथ दे, वही अपना है। बाकी सब औपचारिकता है।

*समाप्त*

डॉ वंदना शर्मा पांडव नगर नई दिल्ली