बाजार की एक दुकान के शीशे में रंग-बिरंगे फ्रेंडशिप बैंड चमक रहे थे। सीमा ठिठक गई। उसने दो सुंदर ब्रेसलेट खरीदे और बैग में रख लिए। घर जाने का मन नहीं था तो पास के पार्क में एक खाली बेंच पर बैठ गई।
सामने बच्चे अपने दोस्तों के साथ खेल रहे थे। माएं बच्चों को झुला रही थीं। कुछ महिलाएं एक साथ बैठी हंस-हंस कर बातें कर रही थीं। ये सब देखकर सीमा का दिल भर आया। उसने बैग से ब्रेसलेट निकाले और सोचने लगी "इन्हें दूंगी किसे? मेरी तो कोई दोस्त ही नहीं।"
सीमा की आंखों के सामने बचपन तैर गया।
सीमा पढ़ने में तेज थी। सबकी हर संभव मदद करती। किसी की कविता लिख देती, किसी का निबंध। उसे दूसरों की मदद करके खुशी मिलती थी। लेकिन सब मतलब की दोस्ती थी। काम निकलते ही कोई नहीं पूछता था। इसीलिए उसे अकेला ही रहना पड़ा।
जब वो छोटी थी तो मम्मी का सख्त हुक्म था - "स्कूल सिर्फ पढ़ने जाते हैं। दोस्ती के चक्कर में मत पड़ना, पढ़ाई खराब हो जाएगी।" इसलिए दसवीं तक सीमा की कोई दोस्त नहीं बनी। क्लास में सबसे शांत बैठी रहती। अध्यापिका के जाने के बाद भी डायरी में लिखती रहती या खिड़की से बाहर खेलते बच्चों को देखकर खुद ही मुस्कुरा देती। समय मिलता तो अध्यापिका का काम कर देती।
बाहरवीं में एक लड़की उसकी दोस्त बनी, पर वो सिर्फ गणित के सवाल पूछने आती थी। सवाल समझते ही "धन्यवाद" कहकर चली जाती।
बी.एस.सी के लिए जब वो कॉलेज गई तो मां ने फिर मना कर दिया - "किसी से दोस्ती नहीं करनी। सीधा क्लास से घर आना है।"
शादी के बाद सीमा दूसरे शहर आई। यहां तो पड़ोसी भी एक-दूसरे से नहीं बोलते थे। एक बिल्डिंग में रहने वाले भी अनजान थे। एक साल तक वो बिल्कुल अकेली रही।
एक साल बाद उसकी दोस्ती सामने रहने वाली रूबी से हुई। रूबी की शादी को दो महीने ही हुए थे। रूबी रोज उसके साथ बाजार जाती, पार्क जाती। दोनों एक-दूसरे को अपनी सारी बातें बतातीं। सीमा को लगा चलो अब सच्ची दोस्त मिल गई।
लेकिन धीरे-धीरे सीमा को लगने लगा रूबी उसकी सादगी का मजाक बनाती है। पार्क में भी वो दूसरी महिलाओं से घुलने-मिलने लगी। सीमा शहर में भी बहुत साधारण रहती थी - जूड़ा बनाकर ढीले-ढाले सूट। तो रूबी कभी-कभी ताने कस देती - "सीमा तू शहर में देहाती की तरह रहती है।"
सीमा बुरा ना मानती क्योंकि उसे अपनी सादगी अच्छी लगती थी।
सीमा को रूबी की चालाकी समझ आने लगी। रूबी को जब जरूरत होती तभी सीमा से बात करती। सीमा फिर भी उसकी सहायता करने से मना नहीं करती थी। पर एक दिन रूबी का घर किसी और शहर में शिफ्ट हो गया और वो बिना बताए चली गई। सीमा फिर अकेली रह गई।
सीमा बहुत धार्मिक थी। वो यही सोचकर खुद को समझाती कि "चलो जरूरत पड़ने पर ही सही, मेरी याद तो आती है।"
सीमा ने फोन में समय देखा। शाम के सात बज गए थे। वो बैग उठाकर घर वापस आ गई। रात को नौ बजे जब पति रोहन घर आए तो सीमा ने उदास होकर कहा - "मेरी तो कोई दोस्त ही नहीं है। मैं किसे बांधू ब्रेसलेट? तुम्हें बांध दूं। तुम भी तो मेरे दोस्त हो।"
रोहन ने सीमा का हाथ अपने हाथ में लिया और कहा - "हां क्यों नहीं। तुम्हारे दो दोस्त हैं - एक मैं और एक हमारा बेटा आर्यन। तुम हम दोनों के साथ फ्रेंडशिप डे मनाओ। हम तुम्हें कभी अकेला नहीं छोड़ेंगे।"
सीमा की आंखें भर आईं। अगले दिन उसने एक ब्रेसलेट रोहन को और दूसरा सोते हुए आर्यन के हाथ में बांध दिया।
उस दिन तीनों ने साथ बैठकर खाना खाया, बातें कीं, हंसे। सीमा को समझ आया कि दोस्ती सिर्फ बाहर नहीं मिलती। परिवार में भी मिलती है।
पार्क में उसे अनाया नाम की छोटी बच्ची भी मिल गई थी। अनाया रोज उससे कहानियां सुनती। फ्रेंडशिप डे पर सीमा ने तीसरा ब्रेसलेट खरीदकर अनाया को भी बांधा।
आज सीमा के पास रोहन है, आर्यन है और अनाया है। छोटी-छोटी खुशियां हैं। जिसे वो अकेलापन समझ रही थी वो असल में उसका सबसे बड़ा साथ था।
*सीख:* दोस्ती गिनती से नहीं, दिल से होती है। और परिवार सबसे पहला दोस्त होता है।
*समाप्त*
डॉ वंदना शर्मा नई दिल्ली