होनी थी हो गई Vandna Sharma द्वारा लघुकथा में हिंदी पीडीएफ

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होनी थी हो गई



होनी थी हो गई

सुबह से बारिश हो रही है। बिजली कड़क रही है।  
रीना सुबह अपने बेटे को स्कूल भेज बालकनी में बैठी बारिश को देख रही है। उसने बालकनी में सुंदर सदाबहार, अपराजिता, गेंदा और तुलसी के पौधे लगाए हैं। रीना अपने बच्चों की तरह प्यार करती है अपने पौधों से।  
बारिश रुक ही नहीं रही थी। सागर को ऑफिस जाना था। सागर बारिश को देख चिड़चिड़ा हो रहा था जबकि रीना बारिश का आनंद ले रही थी। रीना ने अपने पति सागर से कहा - "इतना अच्छा मौसम है, कुछ देर बैठो यहाँ देखो आसमान में काले बादल इतनी गति से कहाँ जा रहे हैं। वो देखो सामने पेड़ के पत्ते सर-सर कोई गीत सुना रहे हैं।"  
सागर ने चिड़ते हुए कहा - "कि अपने सपनों की दुनिया से बाहर निकलो, यथार्थ में जीना सीखो। ऑफिस में देर हो गई तो बॉस का व्याख्यान सुनना पड़ेगा।"

सागर ऐसा कहकर बारिश में ही ऑफिस के लिए निकल जाता है। पीछे से रीना कहती रह जाती है - "अरे रेनकोट तो ले जाओ, कार निकालने में ही भीग जाओगे।"

रीना फिर से बारिश का आनंद लेने लगती है। एक तूफान उसके अंदर भी चल रहा था। वो जितनी फिल्मी थी, सागर उतना ही बोरिंग। रीना जितनी आदर्शवादी और पारंपरिक थी, सागर उतना ही शांत और बेफिक्र। दोनों एक-दूसरे के बिल्कुल उल्टे थे।

कभी-कभी दोनों में बहस भी हो जाती, दोनों ही अड़े रहते अपनी बात पर। ससुराल वाले भी हैरान थे दोनों इतना लड़ते हैं फिर भी अभी तक साथ हैं। कैसे एक हो जाते हैं लड़ने के बाद दोनों।

अब उन्हें कौन समझाए कि बेगम बगैर बादशाह किस काम का और बादशाह बगैर बेगम किस काम की। सब उन्हें लड़ते हुए देखना चाहते हैं तो बिल्कुल शांत आदर्श जोड़े की तरह दिखाई देते हैं। और जब उनसे परिपक्वता की आस की जाती है तो झगड़ा कर लेते हैं।

रीना और सागर की विवाह की कहानी भी उनकी तरह विचित्र है। अरेंज मैरिज थी, लव मैरिज हो गई। काली के मंदिर में लड़का-लड़की देखने का कार्यक्रम तय हुआ। दोनों ने एक-दूसरे को पहली नजर में ही पसंद कर लिया। सागर को भोली, मासूम सी लड़की चाहिए थी बस पढ़ी-लिखी हो, और रीना को सुंदर कद-काठी वाला हीरो चाहिए था। दोनों ने काली माँ के सामने एक-दूसरे को जीवन साथी स्वीकार कर लिया। दोनों के परिवार वालों ने रोका की रस्म एक नारियल और एक रुपए से पूरी कर दी। मार्च में रोका हुआ था, जुलाई में शादी तय हुई। रीना उस समय डिग्री कॉलेज में प्रवक्ता थी। और सागर दिल्ली में एक एमएनसी कंपनी में मैनेजर। रिश्ते के दो महीने अप्रैल और मई तो एक-दूसरे को समझने में बीत गए। फोन पर अक्सर बात होती थी। सागर को लगता था कि रीना उसके लिए ईश्वर का वरदान है। उधर रीना सोचती सागर कितना सज्जन और सुशील गुणवान है। शादी से पहले ही उसकी इतनी देखभाल करता है तो बाद में भी करेगा। रीना सच में उसके लिए किस्मत बदलने वाली चाबी थी। रीना से रोका होते ही उसका प्रमोशन हो गया, उसकी सैलरी बढ़ गई। उसकी बहन के लिए लड़का नहीं मिल रहा था। लड़का भी मिल गया।

जैसे-जैसे मई में गर्मी बढ़ती है, वैसे ही दोनों परिवार वालों में अनबन बढ़ने लगी। सागर के पिता दहेज लोभी थे। अकड़ू भी थे। उनकी सोच थी कि वो लड़के वाले हैं तो खुदा है। लड़की वालों को झुककर सलाम करना चाहिए। सागर के पिता ने कार और कैश की मांग रख दी और रीना के माता-पिता का अपमान किया जैसे पुराने जमाने की फिल्मों में होता था। रीना के पिता अमीर थे, गाड़ी दे सकते थे लेकिन उन्हें सागर के पिता का मांगना, उनका अकड़ू व्यवहार समझ नहीं आया। उन्होंने रीना से मना कर दिया इस शादी को करने के लिए। कहा कि - "लड़के वाले लालची हैं, अच्छा परिवार नहीं है, कहीं और कर देंगे लेकिन इस घर में नहीं करेंगे।" रीना तो सुनकर जाम ही हो गई यह खबर सुनकर। उसने सोचा लड़का तो अच्छा है, कितने सलीके से बात करता है। अभी से मेरी हर जरूरत का ध्यान रखता है। अब मैंने उसे दिल से अपना पति मान लिया है तो किसी दूसरे के साथ कैसे कर सकती हूं। यह तो बेईमानी होगी। वह अपने पिता के सम्मुख जा बेधड़क बोल देती है कि उसे सिर्फ सागर से ही शादी करनी है और किसी से नहीं। सागर अच्छा लड़का है। रीना के पिता ने पूछा - "तुझे कैसे पता अच्छा लड़का है?" रीना ने शरमाते हुए कहा "अरे मेरी बात होती है रोज उससे"। और अपने कमरे में चली गई। रीना के पिता ने उसकी हां को मंजूरी दे दी।

उधर सागर के अकड़ू माँ बाप भी  
सागर के कान भर रहे थे कि कहीं और करवा देंगे उसकी शादी। सागर ने भी अपने पिता को बोल दिया कि मैं उस लड़की को अपनी धर्मपत्नी मान चुका हूं। और ऐसे सगाई होने के बाद किसी लड़की का रिश्ता तोड़ना गलत है। आपके भी एक लड़की है, आप ऐसे नहीं कर सकते।

कहते हैं किसी ने क्या खूब कहा है- मुद्दई लाख बुरा चाहे क्या होता है, वही होता है जो मंजूरे खुदा होता है। भले ही दोनों परिवारों में अनबन हो गई लेकिन जोड़ी तो ऊपर वाले ने बनाई थी। काली माँ ने खुद अपने आंगन में गठबंधन कराया था। तो कोई कैसे तोड़ सकता है। शादी तो उनकी होनी ही थी हो गई। भले ही अरेंज से लव हो गई।

रीना को सब बातें याद कर हंसी आ रही थी। वो सोचने लगी अलग करने वालों ने सब जोड़ लगा दिए पर कोई अलग न कर पाया रीना-सागर को। दोनों एक-दूसरे के लिए ही बने थे। वैचारिक मतभेद रहता लेकिन दोनों फिर एक हो जाते। पल में झगड़ते दिखाई देते, पल में एक-दूसरे की चिंता करते, हंसते हुए दिखाई देते। सभी रिश्तेदार जब पूछते उनसे कि तुम दोनों के गुण तो विरोधाभासी हैं, दोनों परिवारों में भी नहीं बनती तो कैसे हो गई शादी। दोनों हंसते हुए यही कहते - *होनी थी हो गई। सब महाकाल की इच्छा है। जय महाकाल।*

डॉ वंदना शर्मा पांडव नगर नई दिल्ली