कर्म फल Vandna Sharma द्वारा लघुकथा में हिंदी पीडीएफ

Featured Books
श्रेणी
शेयर करे

कर्म फल



कर्म फल

आसमान में रूई जैसे बादल जगह-जगह बिखरे हुए थे। सूरज ढलने को था। पेड़ का पत्ता भी नहीं हिल रहा था। जुलाई महीने की उमस भरी शाम थी। 

सरोज अपनी बालकनी में बैठी ढलते हुए सूरज को देख रही थी। सोच रही थी - "इस समय सूरज भी निस्तेज हो गया है अपने ढलान पर। उसी तरह मेरी उम्र भी ढल रही है। बुढ़ापा दस्तक दे रहा है।"

सुबह की बात याद आते ही उसकी आंखें भर आईं। उसकी बहू सीमा उसे बासी रोटी और चाय का कप पकड़ाकर ऑफिस चली गई थी। न पूछा कि रात कैसी कटी, न दवाई का समय याद दिलाया। 

सरोज को अपने कर्म याद आने लगे। जब वो जवान थी तब उसने भी अपनी सास की कभी सेवा नहीं की थी। बचा खुचा खाना दे देती थी, बात-बात पर ताने कसती थी। आज उसी का फल उसे मिल रहा था। पश्चाताप में उसकी आंखों से आंसू बह निकले। उसने हाथ जोड़कर ईश्वर से प्रार्थना की - "हे प्रभु मुझे क्षमा कर दो। जब मैंने अपनी सास की सेवा नहीं की तो मेरी बहू मेरी कैसे करेगी। ये मेरे कर्मों का फल है।"

रात के आठ बजे बहू-बेटा ऑफिस से लौटे। उनका सोलह वर्षीय बेटा राहुल भी कोचिंग से आ गया। डाइनिंग टेबल पर खाना लगा था। राहुल ने देखा दादी वहां नहीं हैं। उसने अपनी मां से मासूमियत से पूछा, "मां, दादी हमारे साथ क्यों नहीं खा रही? वो भी सुबह से अकेली बोर हो गई होंगी ना?"

सीमा झल्ला उठी। "तुमसे मतलब? अपना खाना खाओ और जाकर पढ़ाई करो।" 

यह सब रोहन चुपचाप देख रहा था। खाना खत्म होने के बाद उसने सीमा को कमरे में बुलाया। 

"सीमा, तुम अपना जीवन क्यों खराब कर रही हो?" रोहन ने धीरे से कहा। "बच्चे बड़ों का ही अनुसरण करते हैं। आज तुम राहुल के सामने उसकी दादी की बुराई करोगी, कल यही राहुल तुम्हारे साथ करेगा। यह तो कर्म फल है। जैसा बीज बोओगी वैसा ही फल मिलेगा। बड़ों की सेवा और देखभाल किताबें पढ़कर नहीं सीखी जाती। बच्चे वही सीखते हैं जो वो घर में रोज देखते हैं। वही उनके कोरे मन में अमिट छप जाता है।"

रोहन की बातें सीमा के दिल में उतर गईं। उसे अपनी गलती का एहसास हुआ। उसकी आंखें नम हो गईं। वो रोहन के गले लगकर फूट-फूट कर रोई और अपने किए के लिए माफी मांगी।

उसी रात सीमा ने सरोज के कमरे का दरवाजा खटखटाया। "मां जी, माफ कर दीजिए।" कहते हुए उसने सास के पैर छुए और उन्हें सहारा देकर डाइनिंग टेबल पर लाई। सरोज भी अपने गलत व्यवहार के लिए अपनी बहु सीमा से माफी मांगती है और उसे अपनी बेटी की तरह रहने के लिए कहती है। घर दीवारों से नहीं बनता है। घर बनता है उसमें रहने वाले सदस्यों के आपसी प्यार से।

उस दिन के बाद घर का नजारा बदल गया। अब तीनों - सास, बहू और पोता - एक साथ बैठकर खाना खाते, बातें करते। सरोज के चेहरे पर फिर से सुकून लौट आया।

सच है, अगर हम रिश्तों में प्रेम का बीज बोएंगे तो सम्मान का फल ही मिलेगा। अपने कर्मों का फल जरूर मिलता है इसलिए सोच समझ कर अच्छे कर्म ही करें।
डॉ वंदना शर्मा नई दिल्ली